भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1929, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1929

प्राग्ज्योतिषपुरका राजा भौमासुर, मुरके दस पुत्र तथा प्रधान-प्रधान राक्षस उस अन्तःपुरकी रक्षा करते हुए सदा उसके समीप ही रहते थे।

स एव तपसां पारे वरदत्तो महीसुतः ।
अदितिं धर्षयामास कुण्डलार्थं युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! पृथ्वीपुत्र भौमासुर तपस्याके अन्तमें वरदान पाकर इतना गर्वोन्मत्त हो गया था कि इसने कुण्डलके लिये देवमाता अदितितकका तिरस्कार कर दिया।

न चासुरगणैः सर्वैः सहितैः कर्म तत् पुरा ।
कृतपूर्वं महाघोरं यदकार्षीन्महासुरः ॥
पूर्वकालमें समस्त महादैत्योंने एक साथ मिलकर भी वैसा अत्यन्त घोर पाप नहीं किया था, जैसा अकेले इस महान् असुरने कर डाला था।

यं मही सुषुवे देवी यस्य प्राग्ज्योतिषं पुरम् ।
विषयान्तपालाश्चत्वारो यस्यासन् युद्धदुर्मदाः ॥
पृथ्वीदेवीने उसे उत्पन्न किया था, प्राग्ज्योतिषपुर उसकी राजधानी थी तथा चार युद्धोन्मत्त दैत्य उसके राज्यकी सीमाकी रक्षा करनेवाले थे।

आदेवयानमावृत्य पन्थानं पर्यवस्थिताः ।
त्रासनाः सुरसङ्घानां विरूपै राक्षसैः सह ॥
वे पृथ्वीसे लेकर देवयानतकके मार्गको रोककर खड़े रहते थे। भयानक रूपवाले राक्षसोंके साथ रहकर वे देवसमुदायको भयभीत किया करते थे।

हयग्रीवो निशुम्भश्च घोरः पञ्चजनस्तथा ।
मुरः पुत्रसहस्रैश्च वरदत्तो महासुरः ॥
उन चारों दैत्योंके नाम इस प्रकार हैं—हयग्रीव, निशुम्भ, भयंकर पंचजन तथा सहस्र पुत्रोंसहित महान् असुर मुर, जो वरदान प्राप्त कर चुका था।

तद्वधार्थं महाबाहुरेष चक्रगदासिधृक् ।
जातो वृष्णिषु देवक्यां वासुदेवो जनार्दनः ॥
उसीके वधके लिये चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले ये महाबाहु श्रीकृष्ण वृष्णिकुलमें देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए हैं। वसुदेवजीके पुत्र होनेसे ये जनार्दन ‘वासुदेव’ कहलाते हैं।

तस्यास्य पुरुषेन्द्रस्य लोकप्रथिततेजसः ।
निवासो द्वारका तात विदितो वः प्रधानतः ॥
तात युधिष्ठिर! इनका तेज सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है। इन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका निवासस्थान प्रधानतः द्वारका ही है, यह तुम सब लोग जानते हो।

अतीव हि पुरी रम्या द्वारका वासवक्षयात् ।
अति वै राजते पृथ्व्यां प्रत्यक्षं ते युधिष्ठिर ॥

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