भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1928

नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका राजा था। उसके शोक, भय और बाधाएँ दूर हो गयी थीं। उसने कशेरुको मूर्च्छित करके हर लिया और अपने घर लाकर उससे इस प्रकार कहा।

नरक उवाच

यानि देवमनुष्येषु रत्नानि विविधानि च ।
बिभर्ति च मही कृत्स्ना सागरेषु च यद् वसु ॥
अद्यप्रभृति तद् देवि सहिताः सर्वनेर्ऋताः ।
तवैवोपहरिष्यन्ति दैत्याश्च सह दानवैः ॥
**नरकासुर बोला—**देवि! देवताओं और मनुष्योंके पास जो नाना प्रकारके रत्न हैं, सारी पृथ्वी जिन रत्नोंको धारण करती है तथा समुद्रोंमें जो रत्न संचित हैं, उन सबको आजसे सभी राक्षस ला-लाकर तुम्हें ही अर्पित किया करेंगे। दैत्य और दानव भी तुम्हें उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट देंगे।

भीष्म उवाच

एवमुत्तमरत्नानि बहूनि विविधानि च ।
स जहार तदा भौमः स्त्रीरत्नानि च भारत ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**भारत! इस प्रकार भौमासुरने नाना प्रकारके बहुत-से उत्तम रत्नों तथा स्त्री-रत्नोंका भी अपहरण किया।
गन्धर्वाणां च याः कन्या जहार नरको बलात् ।
याश्च देवमनुष्याणां सप्त चाप्सरसां गणाः ॥
गन्धर्वोंकी जो कन्याएँ थीं, उन्हें भी नरकासुर बलपूर्वक हर लाया। देवताओं और मनुष्योंकी कन्याओं तथा अप्सराओंके सात समुदायोंका भी उसने अपहरण कर लिया।
चतुर्दशसहस्राणां चैकविंशच्छतानि च ।
एकवेणीधराः सर्वाः सतां मार्गमनुव्रताः ॥
इस प्रकार सोलह हजार एक सौ सुन्दरी कुमारियाँ उसके घरमें एकत्र हो गयीं। वे सब-की-सब सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करके व्रत और नियमके पालनमें तत्पर हो एक वेणी धारण करती थीं।
तासामन्तःपुरं भौमोऽकारयन्मणिपर्वते ।
औदकायामदीनात्मा मुरस्य विषयं प्रति ॥
उत्साहयुक्त मनवाले भौमासुरने उनके रहनेके लिये मणिपर्वतपर अन्तःपुरका निर्माण कराया। उस स्थानका नाम था औदका (जलकी सुविधासे सम्पन्न भूमि)। वह अन्तःपुर मुर नामक दैत्यके अधिकृत प्रदेशमें बना था।
ताश्च प्राग्ज्योतिषो राजा मुरस्य दश चात्मजाः ।
नैर्ऋताश्च यथा मुख्याः पालयन्त उपासत ॥