महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1927, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें[नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना]
भीष्म उवाच
शूरसेनपुरं त्यक्त्वा सर्वयादवनन्दनः । द्वारकां भगवान् कृष्णः प्रत्यपद्यत केशवः ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त यदुवंशियोंको आनन्दित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण शूरसेनपुरी मथुराको छोड़कर द्वारकामें चले गये।
प्रत्यपद्यत यानानि रत्नानि च बहूनि च । यथार्हं पुण्डरीकाक्षो नैर्ऋतान् प्रतिपालयन् ॥ कमलनयन श्रीकृष्णने असुरोंको पराजित करके जो बहुत-से रत्न और वाहन प्राप्त किये थे, उनका वे द्वारकामें यथोचितरूपसे संरक्षण करते थे।
तत्र विघ्नं चरन्ति स्म दैतेयाः सह दानवैः । ताञ्जघान महाबाहुः वरमत्तान् महासुरान् ॥ उनके इस कार्यमें दैत्य और दानव विघ्न डालने लगे। तब महाबाहु श्रीकृष्णने वरदानसे उन्मत्त हुए उन बड़े-बड़े असुरोंको मार डाला।
स विघ्नमकरोत् तत्र नरको नाम नैर्ऋतः । त्रासनः सुरसंघानां विदितो वः प्रभावतः ॥ तत्पश्चात् नरक नामक राक्षसने भगवान्के कार्यमें विघ्न डालना आरम्भ किया। वह समस्त देवताओंको भयभीत करनेवाला था। राजन्! तुम्हें तो उसका प्रभाव विदित ही है।
स भूम्यां मूर्तिलिङ्गस्थः सर्वदेवासुरान्तकः । मानुषाणामृषीणां च प्रतीपमकरोत् तदा ॥ समस्त देवताओंके लिये अन्तकरूप नरकासुर इस धरतीके भीतर मूर्तिलिंगमें* स्थित हो मनुष्यों और ऋषियोंके प्रतिकूल आचरण किया करता था।
त्वष्टुर्दुहितरं भौमः कशेरुमगमत् तदा । गजरूपेण जग्राह रुचिराङ्गीं चतुर्दशीम् ॥ भूमिका पुत्र होनेसे नरकको भौमासुर भी कहते हैं। उसने हाथीका रूप धारण करके प्रजापति त्वष्टाकी पुत्री कशेरुके पास जाकर उसे पकड़ लिया। कशेरु बड़ी सुन्दरी और चौदह वर्षकी अवस्थावाली थी।
प्रमथ्य च जहारैतां हृत्वा च नरकोऽब्रवीत् । नष्टशोकभयाबाधः प्राग्ज्योतिषपतिस्तदा ॥