महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1939, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर बलरामजी तथा देवराज इन्द्रकी आज्ञासे महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरके मणिपर्वतपर बने हुए अन्तःपुरमें प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया। तत्र वैदूर्यवर्णानि ददर्श मधुसूदनः । सतोरणपताकानि द्वाराणि शरणानि च ॥ मधुसूदनने देखा; उस अन्तःपुरके द्वार और गृह वैदूर्यमणिके समान प्रकाशित हो रहे हैं। उनके फाटकोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। चित्रग्रथितमेघाभः प्रबभौ मणिपर्वतः । हेमचित्रपताकैश्च प्रासादैरुपशोभितः ॥ सुवर्णमय विचित्र पताकाओंवाले महलोंसे सुशोभित वह मणिपर्वत चित्रलिखित मेघोंके समान प्रतीत होता था। हर्म्याणि च विशालानि मणिसोपानवन्ति च । तत्रस्था वरवर्णाभा ददृशुर्मधुसूदनम् ॥ गन्धर्वसुरमुख्यानां प्रिया दुहितरस्तदा । त्रिविष्टपसमे देशे तिष्ठन्तमपराजितम् ॥ उन महलोंमें विशाल अट्टालिकाएँ बनी थीं, जिनपर चढ़नेके लिये मणिनिर्मित सीढ़ियाँ सुशोभित हो रही थीं। वहाँ रहनेवाली प्रधान-प्रधान गन्धर्वों और सुरोंकी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियोंने उस स्वर्गके समान प्रदेशमें खड़े हुए अपराजित वीर भगवान् मधुसूदनको देखा। परिवव्रुर्महाबाहुमेकवेणीधराः स्त्रियः । सर्वाः काषायवासिन्यः सर्वाश्च नियतेन्द्रियाः ॥ देखते-देखते ही उन सबने महाबाहु श्रीकृष्णको घेर लिया। वे सभी स्त्रियाँ एक वेणी धारण किये गेरुए वस्त्र पहने इन्द्रियसंयमपूर्वक वहाँ तपस्या करती थीं। व्रतसंतापजः शोको नात्र काश्चिदपीडयत् । अरजांसि च वासांसि बिभ्रत्यः कौशिकान्यपि ॥ समेत्य यदुसिंहस्य चक्रुरस्याञ्जलिं स्त्रियः । ऊचुश्चैनं हृषीकेशं सर्वास्ताः कमलेक्षणाः ॥ उस समय व्रत और संतापजनित शोक उनमेंसे किसीको पीड़ा नहीं दे सका। वे निर्मल रेशमी वस्त्र पहने हुए यदुवीर श्रीकृष्णके पास जा उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं। उन कमलनयनी कामिनियोंने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी श्रीहरिसे इस प्रकार कहा।