भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1919, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1919

तज्जातिगुणयुक्ताभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम् ॥ वे दोनों देववन्दित देवता थे तो भी मानवी दीक्षा ग्रहण करनेके कारण मानव-जातिके अनुरूप गुणोंवाली क्रीड़ाएँ करते हुए वनमें विचरते थे।

ततः कृष्णो महातेजास्तदा गत्वा तु गोव्रजम् । गिरियज्ञं तमैवैष प्रकृतं गोपदारकैः ॥ बुभुजे पायसं शौरिरीश्वरः सर्वभूतकृत् । तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीकृष्ण गौओंके व्रजमें जाकर गोपबालकोंद्वारा किये जानेवाले गिरियज्ञमें सम्मिलित हो वहाँ सर्वभूतस्रष्टा ईश्वरके रूपमें अपनेको प्रकट करके (गिरिराजके लिये समर्पित) खीरको स्वयं ही खाने लगे।

तं दृष्ट्वा गोपकाः सर्वे कृष्णमेव समर्चयन् ॥ पूज्यमानस्ततो गोपैर्दिव्यं वपुर्धारयत् । उन्हें देखकर सब गोप भगवद्बुद्धिसे श्रीकृष्णके उस स्वरूपकी ही पूजा करने लगे। गोपालोंद्वारा पूजित श्रीकृष्णने दिव्य रूप धारण कर लिया।

धृतो गोवर्धनो नाम सप्ताहं पर्वतस्तदा ॥ शिशुना वासुदेवेन गवार्थमरिमर्दन । शत्रुमर्दन युधिष्ठिर! (जब इन्द्र वर्षा कर रहे थे, उस समय) बालक वासुदेवने गौओंकी रक्षाके लिये एक सप्ताहतक गोवर्धन पर्वतको अपने हाथपर उठा रखा था।

क्रीडमानस्तदा कृष्णः कृतवान् कर्म दुष्करम् ॥ तदद्भुतमिवात्रासीत् सर्वलोकस्य भारत । भरतनन्दन! उस समय श्रीकृष्णने खेल-खेलमें ही अत्यन्त दुष्कर कर्म कर डाला, जो सब लोगोंके लिये अत्यन्त अद्भुत-सा था।

देवदेवः क्षितिं गत्वा कृष्णं दृष्ट्वा मुदान्वितः ॥ गोविन्द इति तं ह्युक्त्वा ह्यभ्यषिञ्चत् पुरंदरः । इत्युक्त्वाऽऽश्लिष्य गोविन्दं पुरुहूतोऽभ्ययाद् दिवम् । देवाधिदेव इन्द्रने भूतलपर जाकर जब श्रीकृष्णको (गोवर्धन धारण किये) देखा, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीकृष्णको 'गोविन्द' नाम देकर उनका ('गवेन्द्र' पदपर) अभिषेक किया। देवराज इन्द्र गोविन्दको हृदयसे लगाकर उनकी अनुमति ले स्वर्गलोकको चले गये।

अथारिष्ट इति ख्यातं दैत्यं वृषभविग्रहम् । जघान तरसा कृष्णः पशूनां हितकाम्यया ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णने पशुओंके हितकी कामनासे वृषभरूपधारी अरिष्ट नामक दैत्यको वेगपूर्वक मार गिराया।

केशिनं नाम दैतेयं राजन् वै हयविग्रहम् ।

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