भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1900

राम रामेत्यभिक्रुष्टो ब्राह्मणैः क्षत्रियार्दितैः । न्यघ्नद् दशसहस्राणि रामः परशुनाभिभूः ॥ भृगुनन्दन परशुरामने चौदह हजार क्षत्रियोंको क्षणमात्रमें मार गिराया तथा शेष ब्रह्मद्रोहियोंका भी मूलोच्छेद करके स्नान किया। क्षत्रियोंसे पीड़ित होकर ब्राह्मणोंने ‘राम-राम’ कहकर आर्तनाद किया था; इसीलिये सर्वविजयी परशुरामने पुनः फरसेसे दस हजार क्षत्रियोंका अन्त किया।

न हृमृष्यत तां वाचमार्तैर्भृशमुदीरिताम् । भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजातयः ॥ जिस समय द्विजलोग ‘भृगुनन्दन परशुराम! दौड़ो, बचाओ’ इत्यादि बातें कहकर करुणक्रन्दन करते, उस समय उन पीड़ितोंद्वारा कही हुई वह आर्तवाणी परशुरामजी नहीं सहन कर सके।

काश्मीरान् दरदान् कुन्तीन् क्षुद्रकान् मालवाञ्छकान् । चेदिकाशिकरूषांश्च ऋषिकान् क्रथकैशिकान् ॥ अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश्च मागधान् काशिकोसलान् । रात्रायणान् वीतिहोत्रान् किरातान् मार्तिकावतान् ॥ एतानन्यांश्च राजेन्द्रान् देशे देशे सहस्रशः । निकृत्य निशितैर्बाणैः सम्प्रदाय विवस्वते ॥ उन्होंने काश्मीर, दरद, कुन्तिभोज, क्षुद्रक, मालव, शक, चेदि, काशि, करूष, ऋषिक, क्रथ, कैशिक, अंग, वंग, कलिंग, मागध, काशी, कोसल, रात्रायण, वीतिहोत्र, किरात तथा मार्तिकावत—इनको तथा अन्य सहस्रों राजेश्वरोंको प्रत्येक देशमें तीखे बाणोंसे मारकर यमराजके भेंट कर दिया।

कीर्णा क्षत्रियकोटीभिः मेरुमन्दरभूषणा । त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥ मेरु और मन्दर पर्वत जिसके आभूषण हैं, वह पृथिवी करोड़ों क्षत्रियोंकी लाशोंसे पट गयी। एक-दो बार नहीं, इक्कीस बार परशुरामने यह पृथिवी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी।

एवमिष्ट्वा महाबाहुः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । अन्यद् वर्षशतं रामः सौभे शाल्वमयोधयत् ॥ ततः स भृगुशार्दूलस्तं सौभं योधयन् प्रभुः । सुबन्धुरं रथं राजन्नास्थाय भरतर्षभ ॥ नग्निकानां कुमारीणां गायन्तीनामुपाशृणोत् । तदनन्तर महाबाहु परशुरामने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके सौ वर्षोंतक सौभ नामक विमानपर बैठे हुए राजा शाल्वके साथ युद्ध किया। भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर!