महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1901, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर सुन्दर रथपर बैठकर सौभ विमानके साथ युद्ध करनेवाले शक्तिशाली वीर भृगुश्रेष्ठ परशुरामने गीत गाती हुई नग्निका* कुमारियोंके मुखसे यह सुना—
राम राम महाबाहो भृगूणां कीर्तिवर्धन ।
त्यज शस्त्राणि सर्वाणि न त्वं सौभं वधिष्यसि ॥
चक्रहस्तो गदापाणिर्भीतानामभयंकरः ।
युधि प्रद्युम्नसाम्बाभ्यां कृष्णः सौभं वधिष्यति ॥
‘राम! राम! महाबाहो! तुम भृगुवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाले हो; अपने सारे अस्त्र-शस्त्र नीचे डाल दो। तुम सौभ विमानका नाश नहीं कर सकोगे। भयभीतोंको अभय देनेवाले चक्रधारी गदापाणि भगवान् श्रीविष्णु प्रद्युम्न और साम्बको साथ लेकर युद्धमें सौभ विमानका नाश करेंगे’।
तच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रस्तत एव वनं ययौ ।
न्यस्य सर्वाणि शस्त्राणि कालकाङ्क्षी महायशाः ॥
रथं वर्मायुधं चैव शरान् परशुमेव च ।
धनूंष्यप्सु प्रतिष्ठाप्य राजंस्तेपे परं तपः ॥
यह सुनकर पुरुषसिंह परशुराम उसी समय वनको चल दिये। राजन्! वे महायशस्वी मुनि कृष्णावतारके समयकी प्रतीक्षा करते हुए अपने सारे अस्त्र-शस्त्र, रथ, कवच, आयुध बाण, परशु और धनुष जलमें डालकर बड़ी भारी तपस्यामें लग गये।
ह्रियं प्रज्ञां श्रियं कीर्तिं लक्ष्मीं चामित्रकर्शनः ।
पञ्चाधिष्ठाय धर्मात्मा तं रथं विससर्ज ह ॥
शत्रुओंका नाश करनेवाले धर्मात्मा परशुरामने लज्जा, प्रज्ञा, श्री, कीर्ति और लक्ष्मी— इन पाँचोंका आश्रय लेकर अपने पूर्वोक्त रथको त्याग दिया।
आदिकाले प्रवृत्तं हि विभजन् कालमीश्वरः ।
नाहनच्छ्रद्धया सौभं न ह्यशक्तो महायशाः ॥
जामदग्न्य इति ख्यातो यस्त्वसौ भगवानृषिः ।
सोऽस्य भागस्तपस्तेपे भार्गवो लोकविश्रुतः ॥
शृणु राजंस्तथा विष्णोः प्रादुर्भावं महात्मनः ।
चतुर्विंशे युगे चापि विश्वामित्रपुरःसरः ॥
आदिकालमें जिसकी प्रवृत्ति हुई थी, उस कालका विभाग करके भगवान् परशुरामने कुमारियोंकी बातपर श्रद्धा होनेके कारण ही सौभ विमानका नाश नहीं किया, असमर्थताके कारण नहीं। जमदग्निनन्दन परशुरामके नामसे विख्यात वे महर्षि, जो विश्वविदित ऐश्वर्यशाली महर्षि हैं, वे इन्हीं श्रीकृष्णके अंश हैं, जो इस समय तपस्या कर रहे हैं। राजन्! अब महात्मा भगवान् विष्णुके साक्षात् स्वरूप श्रीरामके अवतारका वर्णन सुनो, जो विश्वामित्र मुनिको आगे करके चलनेवाले थे।