भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1902

तिथौ नावमिके जज्ञे तथा दशरथादपि ।
कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा विष्णुरव्ययः ॥
चैत्रमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको अविनाशी भगवान् महाबाहु विष्णुने अपने-आपको चार स्वरूपोंमें विभक्त करके महाराज दशरथके सकाशसे अवतार ग्रहण किया था।

लोके राम इति ख्यातस्तेजसा भास्करोपमः ।
प्रसादनार्थं लोकस्य विष्णुस्तस्य सनातनः ॥
धर्मार्थमेव कौन्तेय जज्ञे तत्र महायशाः ।
वे भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी राजकुमार लोकमें श्रीरामके नामसे विख्यात हुए। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! जगत्को प्रसन्न करने तथा धर्मकी स्थापनाके लिये ही महायशस्वी सनातन भगवान् विष्णु वहाँ प्रकट हुए थे।

तमप्याहुर्मनुष्येन्द्रं सर्वभूतपतेस्तनुम् ॥
यज्ञविघ्नं तदा कृत्वा विश्वामित्रस्य भारत ।
सुबाहुर्निहतस्तेन मारीचस्ताडितो भृशम् ॥
मनुष्योंके स्वामी भगवान् श्रीरामको साक्षात् सर्वभूतपति श्रीहरिका ही स्वरूप बतलाया जाता है। भारत! उस समय विश्वामित्रके यज्ञमें विघ्न डालनेके कारण राक्षस सुबाहु श्रीरामचन्द्रजीके हाथों मारा गया और मारीच नामक राक्षसको भी बड़ी चोट पहुँची।

तस्मै दत्तानि शस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता ।
वधार्थं देवशत्रूणां दुर्वारणि सुरैरपि ॥
परम बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनिने देवशत्रु राक्षसोंका वध करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीको ऐसे-ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनका निवारण करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था।

वर्तमाने तदा यज्ञे जनकस्य महात्मनः ।
भग्नं माहेश्वरं चापं क्रीडता लीलया परम् ॥
ततो विवाहं सीतायाः कृत्वा स रघुवल्लभः ।
नगरीं पुनरासाद्य मुमुदे तत्र सीतया ॥
उन्हीं दिनों महात्मा जनकके यहाँ धनुषयज्ञ हो रहा था, उसमें श्रीरामने भगवान् शंकरके महान् धनुषको खेल-खेलमें ही तोड़ डाला। तदनन्तर सीताजीके साथ विवाह करके रघुनाथजी अयोध्यापुरीमें लौट आये और वहाँ सीताजीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे।

कस्यचित् त्वथ कालस्य पित्रा तत्राभिचोदितः ।
कैकेय्याः प्रियमन्विच्छन् वनमभ्यवपद्यत ॥