भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1904, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1904

अथ गत्वा स किष्किन्धां सुग्रीवेण तदा सह ।
निहत्य वालिनं युद्धे वानरेन्द्रं महाबलम् ।।
अभ्यषिञ्चत् तदा रामः सुग्रीवं वानरेश्वरम् ।
ततः स वीर्यवान् राजंस्त्वरयन् वै समुत्सुकः ।
विचित्य वायुपुत्रेण लङ्कादेशं निवेदितम् ।।
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवके साथ किष्किन्धामें जाकर महाबली वानरराज बालीको युद्धमें मारा और सुग्रीवको वानरोंके राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया। राजन्! तदनन्तर पराक्रमी श्रीराम सीताजीके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ उनकी खोज कराने लगे। वायुपुत्र हनुमान्‌जीने पता लगाकर यह बतलाया कि सीताजी लंकामें हैं।

सेतुं बद्ध्वा समुद्रस्य वानरैः सहितस्तदा ।
सीतायाः पदमन्विच्छन् रामो लङ्कां विवेश ह ।।
तब समुद्रपर पुल बाँधकर वानरोंसहित श्रीरामने सीताजीके स्थानका पता लगाते हुए लंकामें प्रवेश किया।

देवोरगगणानां हि यक्षराक्षसपक्षिणाम् ।
तत्रावध्यं राक्षसेन्द्रं रावणं युधि दुर्जयम् ।।
युक्तं राक्षसकोटीभिर्भिन्नाञ्जनचयोपमम् ।
वहाँ देवता, नागगण, यक्ष, राक्षस तथा पक्षियोंके लिये अवध्य और युद्धमें दुर्जय राक्षसराज रावण करोड़ों राक्षसोंके साथ रहता था। वह देखनेमें खानसे खोदकर निकाले हुए कोयलेके ढेरके समान जान पड़ता था।

दुर्निरीक्ष्यं सुरगणैर्वरदानेन दर्पितम् ।
जघान सचिवैः सार्धं सान्वयं रावणं रणे ।
त्रैलोक्यकण्टकं वीरं महाकायं महाबलम् ।।
रावणं सगणं हत्वा रामो भूतपतिः पुरा ।।
लङ्कायां तं महात्मानं राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।
अभिषिच्य च तत्रैव अमरत्वं ददौ तदा ।।
देवताओंके लिये उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी कठिन था। ब्रह्माजीसे वरदान मिलनेसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया था। श्रीरामने त्रिलोकीके लिये कण्टकरूप महाबली विशालकाय वीर रावणको उसके मन्त्रियों और वंशजोंसहित युद्धमें मार डाला। इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीरघुनाथजीने प्राचीन कालमें रावणको सेवकोंसहित मारकर लंकाके राज्यपर राक्षसपति महात्मा विभीषणका अभिषेक करके उन्हें वहीं अमरत्व प्रदान किया।

आरुह्य पुष्पकं रामः सीतामादाय पाण्डव ।
सबलः स्वपुरं गत्वा धर्मराज्यमपालयत् ।।

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