भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1905, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1905

दानवो लवणो नाम मधोः पुत्रो महाबलः । शत्रुघ्नेन हतो राजंस्ततो रामस्य शासनात् ॥ पाण्डुनन्दन! तत्पश्चात् श्रीरामने पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो सीताको साथ ले दलबलसहित अपनी राजधानीमें जाकर धर्मपूर्वक राज्यका पालन किया। राजन्! उन्हीं दिनों मथुरामें मधुका पुत्र लवण नामक दानव राज्य करता था, जिसे रामचन्द्रजीकी आज्ञासे शत्रुघ्नने मार डाला। एवं बहूनि कर्माणि कृत्वा लोकहिताय सः । राज्यं चकार विधिवद् रामो धर्मभृतां वरः ॥ इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने लोकहितके लिये बहुत-से कार्य करके विधिपूर्वक राज्यका पालन किया। दशाश्वमेधानाजह्रे जारुधिस्थान् निरर्गलान् ॥ नाश्रूयन्ताशुभा वाचो नात्ययः प्राणिनां तदा । न वित्तजं भयं चासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥ प्राणिनां च भयं नासीज्जलानलविधानजम् । पर्यदेवन्न विधवा नानाथाः काश्चनाभवन् ॥ उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया और सरयूतटके जारुधिप्रदेशको विघ्न-बाधाओंसे रहित कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीके शासनकालमें कभी कोई अमंगल-की बात नहीं सुनी गयी। उस समय प्राणियोंकी अकालमृत्यु नहीं होती थी और किसीको भी धनकी रक्षा आदिके निमित्त भय नहीं प्राप्त होता था। संसारके जीवोंको जल और अग्नि आदिसे भी भय नहीं होता था। विधवाओंका करुण क्रन्दन नहीं सुना जाता था तथा स्त्रियाँ अनाथ नहीं होती थीं। सर्वमासीत् तदा तृप्तं रामे राज्यं प्रशासति । न संकरकरा वर्णा नाकृष्टकरकृज्जनः ॥ श्रीरामचन्द्रजीके राज्यशासनकालमें सम्पूर्ण जगत् संतुष्ट था। किसी भी वर्णके लोग वर्णसंकर संतान नहीं उत्पन्न करते थे। कोई भी मनुष्य ऐसी जमीनके लिये कर नहीं देता था, जो जोतने-बोनेके काममें न आती हो। न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥ विशः पर्यचरन् क्षत्रं क्षत्रं नापीडयद् विशः । नरा नात्यचरन् भार्या भार्या नात्यचरन् पतीन् ॥ नासीदल्पकृषिर्लोके रामे राज्यं प्रशासति । आसन् वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः । अरोगाः प्राणिनोऽप्यासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥

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