महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1881, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रायश्चित्तनखो धीरः पशुजानुर्महावृषः ।
धर्म और सत्य उनका स्वरूप था, वे अलौकिक तेजसे सम्पन्न थे। वे विभिन्न कर्मरूपी विक्रमसे सुशोभित हो रहे थे, प्रायश्चित्त उनके नख थे, वे धीर स्वभावसे युक्त थे, पशु उनके घुटनोंके स्थानमें थे और महान् वृषभ (धर्म) ही उनका श्रीविग्रह था।
औद्गात्रहोमलिङ्गोऽसौ फलबीजमहौषधिः ।।
बाह्यान्तरात्मा मन्त्रास्थिविकृतः सौम्यदर्शनः ।
उद्गाताका होमरूप कर्म उनका लिंग था, फल और बीज ही उनके लिये महान् औषध थे, वे बाह्य और आभ्यन्तर जगत्के आत्मा थे, वैदिक मन्त्र ही उनके शारीरिक अस्थिविकार थे। देखनेमें उनका स्वरूप बड़ा ही सौम्य था।
वेदिस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यादिवेगवान् ।।
प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिराचितः ।
यज्ञकी वेदी ही उनके कंधे, हविष्य सुगन्ध और हव्य-कव्य आदि उनके वेग थे। प्राग्वंश (यजमानगृह एवं पत्नीशाला) उनका शरीर कहा गया है। वे महान् तेजस्वी और अनेक प्रकारकी दीक्षाओंसे व्याप्त थे।
दक्षिणाहृदयो योगी महाशास्त्रमयो महान् ।।
उपाकमाँष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ।
दक्षिणा उनके हृदयके स्थानमें थीं, वे महान् योगी और महान् शास्त्रस्वरूप थे। प्रीतिकारक उपाकर्म उनके ओष्ठ और प्रवर्ग्य कर्म ही उनके रत्नोंके आभूषण थे।
छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः ।।
एवं यज्ञवराहो वै भूत्वा विष्णुः सनातनः ।
महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ।।
एकार्णवजले भ्रष्टामेकार्णवगतः प्रभुः ।
मज्जितां सलिले तस्मिन् स्वदेवीं पृथिवीं तदा ।।
उज्जहार विषाणेन मार्कण्डेयस्य पश्यतः ।
जलमें पड़नेवाली छाया (परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उनकी सहायिका थी। वे मणिमय पर्वत-शिखरकी भाँति ऊँचे जान पड़ते थे। इस प्रकार यज्ञमय वराहरूप धारण करके एकार्णवके जलमें प्रविष्ट हो सर्वशक्तिमान् सनातन भगवान् विष्णुने उस जलमें गिरकर डूबी हुई पर्वत, वन और समुद्रोंसहित अपनी महारानी भूदेवीका (दाढ़ या) सींगकी सहायतासे मार्कण्डेय मुनिके देखते-देखते उद्धार किया।
शृङ्गेणेमां समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया ।।
सहस्रशीर्षो देवो हि निर्ममे जगतीं प्रभुः ।
सहस्रों मस्तकोंसे सुशोभित होनेवाले उन भगवान्ने सींग (या दाढ़)-के द्वारा सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये इस पृथिवीका उद्धार करके उसे जगत्का एक सुदृढ़ आश्रय बना दिया।