महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्रायश्चित्तनखो धीरः पशुजानुर्महावृषः ।
धर्म और सत्य उनका स्वरूप था, वे अलौकिक तेजसे सम्पन्न थे। वे विभिन्न कर्मरूपी विक्रमसे सुशोभित हो रहे थे, प्रायश्चित्त उनके नख थे, वे धीर स्वभावसे युक्त थे, पशु उनके घुटनोंके स्थानमें थे और महान् वृषभ (धर्म) ही उनका श्रीविग्रह था।
औद्गात्रहोमलिङ्गोऽसौ फलबीजमहौषधिः ।।
बाह्यान्तरात्मा मन्त्रास्थिविकृतः सौम्यदर्शनः ।
उद्गाताका होमरूप कर्म उनका लिंग था, फल और बीज ही उनके लिये महान् औषध थे, वे बाह्य और आभ्यन्तर जगत्के आत्मा थे, वैदिक मन्त्र ही उनके शारीरिक अस्थिविकार थे। देखनेमें उनका स्वरूप बड़ा ही सौम्य था।
वेदिस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यादिवेगवान् ।।
प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिराचितः ।
यज्ञकी वेदी ही उनके कंधे, हविष्य सुगन्ध और हव्य-कव्य आदि उनके वेग थे। प्राग्वंश (यजमानगृह एवं पत्नीशाला) उनका शरीर कहा गया है। वे महान् तेजस्वी और अनेक प्रकारकी दीक्षाओंसे व्याप्त थे।
दक्षिणाहृदयो योगी महाशास्त्रमयो महान् ।।
उपाकमाँष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ।
दक्षिणा उनके हृदयके स्थानमें थीं, वे महान् योगी और महान् शास्त्रस्वरूप थे। प्रीतिकारक उपाकर्म उनके ओष्ठ और प्रवर्ग्य कर्म ही उनके रत्नोंके आभूषण थे।
छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः ।।
एवं यज्ञवराहो वै भूत्वा विष्णुः सनातनः ।
महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ।।
एकार्णवजले भ्रष्टामेकार्णवगतः प्रभुः ।
मज्जितां सलिले तस्मिन् स्वदेवीं पृथिवीं तदा ।।
उज्जहार विषाणेन मार्कण्डेयस्य पश्यतः ।
जलमें पड़नेवाली छाया (परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उनकी सहायिका थी। वे मणिमय पर्वत-शिखरकी भाँति ऊँचे जान पड़ते थे। इस प्रकार यज्ञमय वराहरूप धारण करके एकार्णवके जलमें प्रविष्ट हो सर्वशक्तिमान् सनातन भगवान् विष्णुने उस जलमें गिरकर डूबी हुई पर्वत, वन और समुद्रोंसहित अपनी महारानी भूदेवीका (दाढ़ या) सींगकी सहायतासे मार्कण्डेय मुनिके देखते-देखते उद्धार किया।
शृङ्गेणेमां समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया ।।
सहस्रशीर्षो देवो हि निर्ममे जगतीं प्रभुः ।
सहस्रों मस्तकोंसे सुशोभित होनेवाले उन भगवान्ने सींग (या दाढ़)-के द्वारा सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये इस पृथिवीका उद्धार करके उसे जगत्का एक सुदृढ़ आश्रय बना दिया।
एवं यज्ञवराहेण भूतभव्यभवात्मना ।।
उद्धृता पृथिवी देवी सागराम्बुधरा पुरा ।
निहता दानवाः सर्वे देवदेवेन विष्णुना ।।
इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमानस्वरूप भगवान् यज्ञवराहने समुद्रका जल हरण करनेवाली भूदेवीका पूर्वकालमें उद्धार किया था। उस समय उन देवाधिदेव विष्णुने समस्त दानवोंका संहार किया था।
वाराहः कथितो ह्येष नारसिंहमथो शृणु ।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ।।
यह वराह अवतारका वृत्तान्त बतलाया गया। अब नृसिंहावतारका वर्णन सुनो, जिसमें नरसिंहरूप धारण करके भगवान्ने हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वध किया था।
दैत्येन्द्रो बलवान् राजन् सुरारिर्बलगर्वितः ।
हिरण्यकशिपुर्नाम आसीत् त्रैलोक्यकण्टकः ।।
राजन्! प्राचीन कालमें देवताओंका शत्रु हिरण्यकशिपु समस्त दैत्योंका राजा था। वह बलवान् तो था ही, उसे अपने बलका घमंड भी बहुत था। वह तीनों लोकोंके लिये कण्टकरूप हो रहा था।
दैत्यानामादिपुरुषो वीर्यवान् धृतिमान् बली ।
प्रविश्य स वनं राजंश्चकार तप उत्तमम् ।।
पराक्रमी हिरण्यकशिपु धीर और बलवान् था। दैत्यकुलका आदिपुरुष वही था। राजन्! उसने वनमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की।
दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च ।
जपोपवासैस्तस्यासीत् स्थाणुर्मौनव्रतो दृढः ।।
साढ़े ग्यारह हजार वर्षोंतक पूर्वोक्त तपस्याके हेतुभूत जप और उपवासमें संलग्न रहनेसे वह ठूंठे काठके समान अविचल और दृढ़तापूर्वक मौनव्रतका पालन करनेवाला हो गया।
ततो दमशमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चानघ ।
ब्रह्मा प्रीतमनास्तस्य तपसा नियमेन च ।।
निष्पाप नरेश! उसके इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या तथा शौच-संतोषादि नियमोंके पालनसे ब्रह्माजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई।
ततः स्वयम्भूभगवान् स्वयमागम्य भूपते ।
विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ।।
भूपाल! तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा हंस जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा स्वयं वहाँ पधारे।
आदित्यैर्वसुभिः साध्यैः मरुद्भिर्दैवतैः सह ।
रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥ दिशाभिर्विदिशाभिश्च नदीभिः सागरैस्तथा । नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्चापरैर्ग्रहैः ॥ देवर्षिभिस्तपोयुक्तैः सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा । राजर्षिभिः पुण्यतमैर्गन्धर्वैरप्सरोगणैः ॥ उनके साथ आदित्य, वसु, साध्य, मरुद्गण, देवगण, रुद्रगण, विश्वेदेव, यक्ष, राक्षस, किन्नर, दिशा, विदिशा, नदी, समुद्र, नक्षत्र, मुहूर्त, अन्यान्य आकाशचारी ग्रह, तपस्वी देवर्षि, सिद्ध, सप्तर्षि, पुण्यात्मा राजर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी थीं।
चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वसुरैस्तथा । ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यमागम्य चाब्रवीत् ॥ सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यके पास आकर बोले।
ब्रह्मोवाच
प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत । वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ ब्रह्माजीने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दैत्यराज! तुम मेरे भक्त हो। तुम्हारी इस तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो और मनोवांछित वस्तु प्राप्त करो।
हिरण्यकशिपुरुवाच
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः । न मानुषाः पिशाचाश्च हन्युर्मां देवसत्तम ॥ हिरण्यकशिपु बोला—सुरश्रेष्ठ! मुझे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच—कोई भी न मार सके।
ऋषयो वा न मां शापैः क्रुद्धा लोकपितामह । शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया ॥ लोकपितामह! तपस्वी ऋषि-महर्षि कुपित होकर मुझे शाप भी न दें यही वर मैंने माँगा है।
न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन च । न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न वान्येन मे वधः ॥ न शस्त्रसे, न अस्त्रसे, न पर्वतसे, न वृक्षसे, न सूखेसे, न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो।
नाकाशे वा न भूमौ वा रात्रौ वा दिवसेऽपि वा ।
नान्तर्वा न बहिर्वापि स्याद् वधो मे पितामह ॥
पितामह! न आकाशमें, न पृथ्वीपर, न रातमें, न दिनमें तथा न बाहर और न भीतर ही मेरा वध हो सके।
पशुभिर्वा मृगैर्न स्यात् पक्षिभिर्वा सरीसृपैः ।
ददासि चेद् वरानैतान् देवदेव वृणोम्यहम् ॥
पशु या मृग, पक्षी अथवा सरीसृप (सर्प-बिच्छू) आदिसे भी मेरी मृत्यु न हो। देवदेव! यदि आप वर दे रहे हैं तो मैं इन्हीं वरोंको लेना चाहता हूँ।
ब्रह्मोवाच
एते देव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः ।
सर्वकामान् वरांस्तात प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥
ब्रह्माजीने कहा— तात! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दे दिये। वत्स! इसमें संशय नहीं कि सम्पूर्ण कामनाओंसहित इन मनोवांछित वरोंको तुम अवश्य प्राप्त कर लोगे।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स भगवानाकाशेन जगाम ह ।
रराज ब्रह्मलोके स ब्रह्मर्षिगणसेवितः ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमार्गसे चले गये और ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित होकर अत्यन्त शोभा पाने लगे।
ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनयस्तथा ।
वरप्रदानं श्रुत्वा ते ब्रह्माणमुपतस्थिरे ॥
तदनन्तर देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि उस वरदानका समाचार सुनकर ब्रह्माजीकी सभामें उपस्थित हुए।
देवा ऊचुः
वरेणानेन भगवन् बाधिष्यति स नोऽसुरः ।
तत् प्रसीदस्व भगवत् वधोऽस्य प्रविचिन्त्यताम् ॥
देवता बोले— भगवन्! इस वरके प्रभावसे वह असुर हमलोगोंको बहुत कष्ट देगा, अतः आप प्रसन्न होइये और उसके वधका कोई उपाय सोचिये।
भवान् हि सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः ।
स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥
क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्यके निर्माता तथा अव्यक्त प्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं।
भीष्म उवाच
ततो लोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः । प्रोवाच भगवान् वाक्यं सर्वदेवगणांस्तदा ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर देवताओंका यह लोकहितकारी वचन सुनकर दिव्यशक्तिसम्पन्न भगवान् प्रजापतिने उन सब देवगणोंसे इस प्रकार कहा।
ब्रह्मोवाच अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् । तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् वधं कृष्णः करिष्यति ॥ **ब्रह्माजीने कहा—**देवताओ! उस असुरको अपनी तपस्याका फल अवश्य प्राप्त होगा। फलभोगके द्वारा जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब भगवान् विष्णु स्वयं ही उसका वध करेंगे।
भीष्म उवाच एकच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे ब्रह्मणा तस्य वै वधम् । स्वानि स्थानानि दिव्यानि जग्मुस्ते वै मुदान्विताः ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार उसके वधकी बात सुनकर सब देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने दिव्य धामको चले गये। लब्धमात्रे वरे चापि सर्वास्ता बाधते प्रजाः । हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥ दैत्य हिरण्यकशिपु ब्रह्माजीका वर पाते ही समस्त प्रजाको कष्ट पहुँचाने लगा। वरदानसे उसका घमण्ड बहुत बढ़ गया था। राज्यं चकार दैत्येन्द्रो दैत्यसङ्घैः समावृतः । सप्त दीपान्वशे चक्रे लोकान् लोकान्तरान् बलात् ॥ वह दैत्योंका राजा होकर राज्य भोगने लगा। झुंड-के-झुंड दैत्य उसे घेरे रहते थे। उसने सातों द्वीपों और अनेक लोक-लोकान्तरोंको बलपूर्वक अपने वशमें कर लिया। दिव्यलोकान् समस्तान् वै भोगान् दिव्यांनवाप सः । देवांस्त्रिभुवनस्थांस्तान् पराजित्य महासुरः ॥ उस महान् असुरने तीनों लोकोंमें रहनेवाले समस्त देवताओंको जीतकर सम्पूर्ण दिव्य लोकों और वहाँके दिव्य भोगोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया। त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः । यदा वरमदोन्मत्तो न्यवसद् दानवो दिवि ॥ इस प्रकार तीनों लोकोंको अपने अधीन करके वह दैत्य स्वर्गलोकमें निवास करने लगा। वरदानके मदसे उन्मत्त हो दानव हिरण्यकशिपु देवलोकका निवासी बन बैठा। अथ लोकान् समस्तांश्च विजित्य स महासुरः ।
भवेयमहमेवेन्द्रः सोमोऽग्निर्मारुतो रविः ॥ सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश । अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वसवोऽर्यमा ॥ धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किम्पुरुषाधिपः । एते भवेयमित्युक्त्वा स्वयं भूत्वा बलात् स च ॥ तदनन्तर वह महान् असुर अन्य समस्त लोकोंको जीतकर यह सोचने लगा कि मैं ही इन्द्र हो जाऊँ, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, सूर्य, जल, आकाश, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, क्रोध, काम, वरुण, वसुगण, अर्यमा, धन देनेवाले धनाध्यक्ष, यक्ष और किम्पुरुषोंका स्वामी—ये सब मैं ही हो जाऊँ। ऐसा सोचकर उसने स्वयं ही बलपूर्वक उन-उन पदोंपर अधिकार जमा लिया।
तेषां गृहीत्वा स्थानानि तेषां कार्याण्यवाप सः । इज्यश्चासीन्मखवरैः स तैर्देवर्षिसत्तमैः ॥ नरकस्थान् समानीय स्वर्गस्थांस्तांश्चकार सः । एवमादीनि कर्माणि कृत्वा दैत्यपतिर्बली ॥ आश्रमेषु महाभागान् मुनीन् वै संशितव्रतान् । सत्यधर्मपरान् दान्तान् पुरा धर्षितवांश्च सः ॥ उनके स्थान ग्रहण करके उन सबके कार्य वह स्वयं देखने लगा। उत्तम देवर्षिगण श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा जिन देवताओंका यजन करते थे, उन सबके स्थानपर वह स्वयं ही यज्ञभागका अधिकारी बन बैठा। नरकमें पड़े हुए सब जीवोंको वहाँसे निकालकर उसने स्वर्गका निवासी बना दिया। बलवान् दैत्यराजने ये सब कार्य करके मुनियोंके आश्रमोंपर धावा किया और कठोर व्रतका पालन करनेवाले सत्यधर्मपरायण एवं जितेन्द्रिय महाभाग मुनियोंको सताना आरम्भ किया।
यज्ञीयान् कृतवान् दैत्यानयज्ञीयांश्च देवताः । यत्र यत्र सुरा जग्मुस्तत्र तत्र व्रजत्युत ॥ स्थानानि देवतानां तु हृत्वा राज्यमपालयत् । उसने दैत्योंको यज्ञका अधिकारी बनाया और देवताओंको उस अधिकारसे वंचित कर दिया। जहाँ-जहाँ देवता जाते थे, वहाँ-वहाँ वह उनका पीछा करता था। देवताओंके सारे स्थान हड़पकर वह स्वयं ही त्रिलोकीके राज्यका पालन करने लगा।
पञ्च कोट्यश्च वर्षाणि नियुतान्येकषष्टि च ॥ षष्टिश्चैव सहस्राणां जग्मुस्तस्य दुरात्मनः । एतद् वर्षं स दैत्येन्द्रो भोगैश्वर्यमवाप सः ॥ उस दुरात्माके राज्य करते पाँच करोड़ इकठ लाख साठ हजार वर्ष व्यतीत हो गये। इतने वर्षोंतक दैत्यराज हिरण्यकशिपुने दिव्य भोगों और ऐश्वर्यका उपभोग किया।
तेनातिबाध्यमानास्ते दैत्येन्द्रेण बलीयसा । ब्रह्मलोकं सुरा जग्मुः सर्वे शक्रपुरोगमाः ॥ पितामहं समासाद्य खिन्नाः प्राञ्जलयोऽब्रुवन् । महाबली दैत्यराज हिरण्यकशिपुके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हो इन्द्र आदि सब देवता ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीके पास पहुँचकर खेदग्रस्त हो हाथ जोड़कर बोले।
देवा ऊचुः
भगवन् भूतभव्येश नस्त्रायस्व इहागतान् । भयं दितिसुताद् घोरं भवत्यद्य दिवानिशम् ॥ देवताओोंने कहा— भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवान् पितामह! हम यहाँ आपकी शरणमें आये हैं! आप हमारी रक्षा कीजिये। अब हमें उस दैत्यसे दिन-रात घोर भयकी प्राप्ति हो रही है।
भगवन् सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः । स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥ भगवन्! आप सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्योंके निर्माता, अव्यक्त प्रकृति एवं नित्यस्वरूप हैं।
ब्रह्मोवाच
श्रूयतामापदेवं हि दुर्विज्ञेया मयापि च । नारायणस्तु पुरुषो विश्वरूपो महाद्युतिः ॥ अव्यक्तः सर्वभूतानामचिन्त्यो विभुरव्ययः । ब्रह्माजी बोले—देवताओ! सुनो, ऐसी विपत्तिको समझना मेरे लिये भी अत्यन्त कठिन है। अन्तर्यामी भगवान् नारायण ही हमारी सहायता कर सकते हैं। वे विश्वरूप, महातेजस्वी, अव्यक्तस्वरूप, सर्वव्यापी, अविनाशी तथा सम्पूर्ण भूतोंके लिये अचिन्त्य हैं।
ममापि स तु युष्माकं व्यसने परमा गतिः ॥ नारायणः परोऽव्यक्तादहमव्यक्तसम्भवः । संकटकालमें मेरे और तुम्हारे वे ही परम गति हैं। भगवान् नारायण अव्यक्तसे परे हैं और मेरा आविर्भाव अव्यक्तसे हुआ है।
मत्तो जज्ञुः प्रजा लोकाः सर्वे देवासुराश्च ते ॥ देवा यथाहं युष्माकं तथा नारायणो मम । पितामहोऽहं सर्वस्य स विष्णुः प्रपितामहः ॥ तमिमं विबुधा दैत्यं स विष्णुः संहरिष्यति । तस्य नास्ति ह्यशक्यं च तस्माद् व्रजत मा चिरम् ॥
देवता बोले—देवेश्वर! आज आप हिरण्यकशिपुका वध करके हमारी रक्षा कीजिये। सुरश्रेष्ठ! आप ही हमारे और ब्रह्मा आदिके भी धारण-पोषण करनेवाले परमेश्वर हैं।
उत्फुल्लपद्मपत्राक्ष शत्रुपक्षभयङ्कर ।
क्षयाय दितिवंशस्य शरण्यस्त्वं भवाद्य नः ॥
खिले हुए कमलदलके समान नेत्रोंवाले नारायण! आप शत्रुपक्षको भय प्रदान करनेवाले हैं। प्रभो! आज आप दैत्योंका विनाश करनेके लिये उद्यत हो हमारे शरणदाता होइये।
भीष्म उवाच
देवानां वचनं श्रुत्वा तदा विष्णुः शुचिश्रवाः ।
अदृश्यः सर्वभूतानां वक्तुमेवोपचक्रमे ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! देवताओंकी यह बात सुनकर पवित्र कीर्तिवाले भगवान् विष्णुने उस समय सम्पूर्ण भूतोंसे अदृश्य रहकर बोलना आरम्भ किया।
श्रीभगवानुवाच
भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ।
तदेवं त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम् ॥
श्रीभगवान् बोले—देवताओ! भय छोड़ दो। मैं तुम्हें अभय देता हूँ। देवगण! तुमलोग अविलम्ब स्वर्गलोकमें जाओ और पहलेकी ही भाँति वहाँ निर्भय होकर रहो।
एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ।
अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ॥
मैं वरदान पाकर घमंडमें भरे हुए दानवराज हिरण्यकशिपुको, जो देवेश्वरोंके लिये भी अवध्य हो रहा है, सेवकोंसहित अभी मार डालता हूँ।
ब्रह्मोवाच
भगवन् भूतभव्येश खिन्ना ह्येते भृशं सुराः ।
तस्मात् त्वं जहि दैत्येन्द्रं क्षिप्रं कालोऽस्य मा चिरम् ॥
ब्रह्माजीने कहा—भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी नारायण! ये देवता बहुत दुःखी हो गये हैं, अतः आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको शीघ्र मार डालिये। उसकी मृत्युका समय आ गया है, इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये।
श्रीभगवानुवाच
क्षिप्रं देवाः करिष्यामि त्वरया दैत्यनाशनम् ।
तस्मात् त्वं विबुधाश्चैव प्रतिपद्यत वै दिवम् ॥
श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मा तथा देवताओ! मैं शीघ्र ही उस दैत्यका नाश करूँगा, अतः तुम सब लोग अपने-अपने दिव्यलोकमें जाओ।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदिवेश्वरान् ।
नरस्यार्धतनुं कृत्वा सिंहस्यार्धतनुं तथा ॥
नारसिंहेन वपुषा पाणिं निष्पिष्य पाणिना ।
भीमरूपो महातेजा व्यादितास्य इवान्तकः ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने देवेश्वरोंको विदा करके आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका-सा बनाकर नरसिंहविग्रह धारण करके एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए बड़ा भयंकर रूप बना लिया। वे महातेजस्वी नरसिंह मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ते थे।
हिरण्यकशिपुं राजन् जगाम हरीरीश्वरः ।
दैत्यास्तमागतं दृष्ट्वा नारसिंहं महाबलम् ॥
ववर्षुः शस्त्रवर्षैस्ते सुसंक्रुद्धास्तदा हरिम् ।
राजन्! तदनन्तर भगवान् विष्णु हिरण्यकशिपुके पास गये। नृसिंहरूपधारी महाबली भगवान् श्रीहरिको आया देख दैत्योंने कुपित होकर उनपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ की।
तैर्विसृष्टानि शस्त्राणि भक्षयामास वै हरिः ॥
जघान च रणे दैत्यान् सहस्राणि बहून्यपि ।
उनके द्वारा चलाये हुए सभी शस्त्रोंको भगवान् खा गये, साथ ही उन्होंने उस युद्धमें कई हजार दैत्योंका संहार कर डाला।
तान् निहत्य च दैत्येन्द्रान् सर्वान् क्रुद्धान् महाबलान् ॥
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो दैत्येन्द्रं बलगर्वितम् ।
क्रोधमें भरे हुए उन सभी महाबलवान् दैत्येश्वरोंका विनाश करके अत्यन्त कुपित हो भगवान्ने बलोन्मत्त दैत्यराज हिरण्यकशिपुपर धावा किया।
जीमूतघनसंकाशो जीमूतघननःस्वनः ॥
जीमूत इव दीप्तौजा जीमूत इव वेगवान् ।
भगवान् नृसिंहकी अंगकान्ति मेघोंकी घटाके समान श्याम थी। वे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान दहाड़ रहे थे। उनका उद्दीप्त तेज भी मेघोंके ही समान शोभा पाता था और वे मेघोंके ही समान महान् वेगशाली थे।
देवारिर्दितिजो दुष्टो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥
भगवान् नृसिंहको आया देख देवताओंसे द्वेष रखनेवाला दुष्ट दैत्य हिरण्यकशिपु उनकी ओर दौड़ा।
दैत्यं सोऽतिबलं दृष्ट्वा क्रुद्धशार्दूलविक्रमम् । दीप्तैर्दैत्यगणैर्गुप्तं खरैर्नखमुखैरुत ॥ ततः कृत्वा तु युद्धं वै तेन दैत्येन वै हरिः । कुपित सिंहके समान पराक्रमी उस अत्यन्त बलशाली, दर्पयुक्त एवं दैत्यगणोंसे सुरक्षित दैत्यको सामने आया देख महातेजस्वी भगवान् नृसिंहने नखोंके तीखे अग्रभागोंके द्वारा उस दैत्यके साथ घोर युद्ध किया। संध्याकाले महातेजाः प्रघाणे च त्वरान्वितः ॥ ऊरौ निधाय दैत्येन्द्रं निर्बिभेद नखैर्हि तम् । फिर संध्याकाल आनेपर बड़ी उतावलीके साथ उसे पकड़कर वे राजभवनकी देहलीपर बैठ गये। तदनन्तर उन्होंने अपनी जाँघोंपर दैत्यराजको रखकर नखोंसे उसका वक्षःस्थल विदीर्ण कर डाला। महाबलं महावीर्यं वरदानेन दर्पितम् ॥ दैत्यश्रेष्ठं सुरश्रेष्ठो जघान तरसा हरिः । सुरश्रेष्ठ श्रीहरिने वरदानसे घमंडमें भरे हुए महाबली महापराक्रमी दैत्यराजको बड़े वेगसे मार डाला। हिरण्यकशिपुं हत्वा सर्वदैत्यांश्च वै तदा ॥ विबुधानां प्रजानां च हितं कृत्वा महाद्युतिः । प्रमुमोद हरिर्देवः स्थाप्य धर्मं तदा भुवि ॥ इस प्रकार हिरण्यकशिपु तथा उसके अनुयायी सब दैत्योंका संहार करके महातेजस्वी भगवान् श्रीहरिने देवताओं तथा प्रजाजनोंका हितसाधन किया और इस पृथ्वीपर धर्मकी स्थापना करके वे बड़े प्रसन्न हुए। एष ते नारसिंहोऽत्र कथितः पाण्डुनन्दन । शृणु त्वं वामनं नाम प्रादुर्भावं महात्मनः ॥ पाण्डुनन्दन! यह मैंने तुम्हें संक्षेपसे नृसिंहावतारकी कथा सुनायी है। अब तुम परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वृत्तान्त सुनो। पुरा त्रेतायुगे राजन् बलिवैरोचनोऽभवत् । दैत्यानां पार्थिवो वीरो बलेनाप्रतिमो बली ॥ राजन्! प्राचीन त्रेतायुगकी बात है; विरोचनकुमार बलि दैत्योंके राजा थे। बलमें उनके समान दूसरा कोई नहीं था। बलि अत्यन्त बलवान् होनेके साथ ही महान् वीर भी थे। तदा बलिर्महाराज दैत्यसङ्घैः समावृतः । विजित्य तरसा शक्रमिन्द्रस्थानमवाप सः ॥ महाराज! दैत्यसमूहसे घिरे हुए बलिने बड़े वेगसे इन्द्रपर आक्रमण किया और उन्हें जीतकर इन्द्रलोकपर अधिकार प्राप्त कर लिया।
तेन वित्रासिता देवा बलिनाऽऽखण्डलादयः ।
ब्रह्माणं तु पुरस्कृत्य गत्वा क्षीरोदधिं तदा ॥
तुष्टुवुः सहिताः सर्वे देवं नारायणं प्रभुम् ।
राजा बलिके आक्रमणसे अत्यन्त त्रस्त हुए इन्द्र आदि देवता ब्रह्माजीको आगे करके क्षीरसागरके तटपर गये और सबने मिलकर देवाधिदेव भगवान् नारायणका स्तवन किया।
स तेषां दर्शनं चक्रे विबुधानां हरिः स्तुतः ॥
प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्यां जन्म चोच्यते ।
देवताओंके स्तुति करनेपर श्रीहरिने उन्हें दर्शन दिया और कहा जाता है, उनपर कृपाप्रसाद करनेके फलस्वरूप भगवान्का अदितिके गर्भसे प्रादुर्भाव हुआ।
अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दनः ॥
एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजोऽभवत् ।
जो इस समय यदुकुलको आनन्दित कर रहे हैं, ये ही भगवान् श्रीकृष्ण पहले अदितिके पुत्र होकर इन्द्रके छोटे भाई विष्णु (या उपेन्द्र)-के नामसे विख्यात हुए।
तस्मिन्नेव च काले तु दैत्येन्द्रो वीर्यवान् बलिः ॥
अश्वमेधं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे ।
उन्हीं दिनों महापराक्रमी दैत्यराज बलिने क्रतुश्रेष्ठ अश्वमेधके अनुष्ठानकी तैयारी आरम्भ की।
वर्तमाने तदा यज्ञे दैत्येन्द्रस्य युधिष्ठिर ॥
स विष्णुर्वामनो भूत्वा प्रच्छन्नो ब्रह्मवेषधृक् ।
मुण्डो यज्ञोपवीती च कृष्णाजिनधरः शिखी ॥
पलाशदण्डं संगृह्य वामनोऽद्भुतदर्शनः ।
प्रविश्य स बलेर्यज्ञे वर्तमाने तु दक्षिणाम् ॥
देहीत्युवाच दैत्येन्द्रं विक्रमांस्त्रीन् ममैव ह ।
युधिष्ठिर! जब दैत्यराजका यज्ञ आरम्भ हो गया, उस समय भगवान् विष्णु ब्राह्मणवेषधारी वामन ब्रह्मचारीके रूपमें अपनेको छिपाकर सिर मुँड़ाये, यज्ञोपवीत, काला मृगचर्म और शिखा धारण किये, हाथमें पलाशका डंडा लिये उस यज्ञमें गये। उस समय भगवान् वामनकी अद्भुत शोभा दिखायी देती थी। बलिके वर्तमान यज्ञमें प्रवेश करके उन्होंने दैत्यराजसे कहा—'मुझे तीन पग भूमि दक्षिणारूपमें दीजिये।'
दीयतां त्रिपदीमात्रमित्ययाचन्महासुरम् ॥
स तथेति प्रतिश्रुत्य प्रददौ विष्णवे तदा ।
'केवल तीन पग भूमि मुझे दे दीजिये।' ऐसा कहकर उन्होंने महान् असुर बलिसे याचना की। बलिने भी 'तथास्तु' कहकर श्रीविष्णुको भूमि दे दी।
तेन लब्ध्वा हरिर्भूमिं जृम्भयामास वै भृशम् ।
स शिशुः सदिवं खं च पृथिवीं च विशाम्पते ।। त्रिभिर्विक्रमणैरेतत् सर्वमाक्रमताभिभूः । बलेर्बलवतो यज्ञे बलिना विष्णुना पुरा ।। विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्याः क्षोभितास्ते महासुराः । बलिसे वह भूमि पाकर भगवान् विष्णु बड़े वेगसे बढ़ने लगे। राजन्! वे पहले तो बालक-जैसे लगते थे; किंतु उन्होंने बढ़कर तीन ही पगोंमें स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी—सबको माप लिया। इस प्रकार बलवान् राजा बलिके यज्ञमें जब महाबली भगवान् विष्णुने केवल तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नाप लिया, तब किसीसे भी क्षुब्ध न किये जा सकनेवाले महान् असुर क्षुब्ध हो उठे। विप्रचित्तिमुखाः क्रुद्धा दैत्यसङ्घा महाबलाः ।। नानावक्त्रा महाकाया नानावेषधरा नृप । राजन्! उनमें विप्रचित्ति आदि दानव प्रधान थे। क्रोधमें भरे हुए उन महाबली दैत्योंके समुदाय अनेक प्रकारके वेष धारण किये वहाँ उपस्थित थे। उनके मुख अनेक प्रकारके दिखायी देते थे। वे सब-के-सब विशालकाय थे। नानाप्रहरणा रौद्रा नानामाल्यानुलेपनाः ।। स्वान्यायुधानि संगृह्य प्रदीप्ता इव तेजसा । क्रममाणं हरिं तत्र उपावर्तन्त भारत ।। उनके हाथोंमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र थे। उन्होंने विविध प्रकारकी मालाएँ तथा चन्दन धारण कर रखे थे। वे देखनेमें बड़े भयंकर थे और तेजसे मानो प्रज्वलित हो रहे थे। भरतनन्दन! जब भगवान् विष्णुने तीनों लोकोंको मापना आरम्भ किया, उस समय सभी दैत्य अपने-अपने आयुध लेकर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। प्रमथ्य सर्वान् दैतेयान् पादहस्ततलैस्तु तान् । रूपं कृत्वा महाभीमं जहाराशु स मेदिनीम् ।। सम्प्राप्य पादमाकाशमादित्यसदने स्थितः । अत्यरोचत भूतात्मा भास्करं स्वेन तेजसा ।। भगवान्ने महाभयंकर रूप धारण करके उन सब दैत्योंको लातों-थप्पड़ोंसे मारकर भूमण्डलका सारा राज्य उनसे शीघ्र छीन लिया। उनका एक पैर आकाशमें पहुँचकर आदित्य-मण्डलमें स्थित हो गया। भूतात्मा भगवान् श्रीहरि उस समय अपने तेजसे सूर्यकी अपेक्षा बहुत बढ़-चढ़कर प्रकाशित हो रहे थे। प्रकाशयन् दिशः सर्वाः प्रदिशश्च महाबलः । शुशुभे स महाबाहुः सर्वलोकान् प्रकाशयन् ।। तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे । नभः प्रक्रममाणस्य नाभ्यां किल तदा स्थितौ ।।
महाबली महाबाहु भगवान् विष्णु सम्पूर्ण दिशाओं-विदिशाओं तथा समस्त लोकोंको प्रकाशित करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। जिस समय वे वसुधाको अपने पैरोंसे माप रहे थे, उस समय वे इतने बढ़े कि चन्द्रमा और सूर्य उनकी छातीके सामने आ गये थे। जब वे आकाशको लाँघने लगे, तब वे ही चन्द्रमा और सूर्य उनके नाभिदेशमें आ गये।
परमाक्रममाणस्य जानुभ्यां तौ व्यवस्थितौ ।।
विष्णोरमितवीर्यस्य वदन्त्येवं द्विजातयः ।
अथासाद्य कपालं स अण्डस्य तु युधिष्ठिर ।।
तच्छिद्रात् स्यन्दिनी तस्य पादाद् भ्रष्टा तु निम्नगा ।
ससार सागरं साऽऽशु पावनी सागरङ्गमा ।।
जब वे आकाश या स्वर्गलोकसे भी ऊपरको पैर बढ़ाने लगे, उस समय उनका रूप इतना विशाल हो गया कि सूर्य और चन्द्रमा उनके घुटनोंमें स्थित दिखायी देने लगे। इस प्रकार ब्राह्मणलोग अमितपराक्रमी भगवान् विष्णुके उस विशाल रूपका वर्णन करते हैं। युधिष्ठिर! भगवान्का पैर ब्रह्माण्डकपालतक पहुँच गया और उसके आघातसे कपालमें छिद्र हो गया, जिससे झर-झर करके एक नदी प्रकट हो गयी, जो शीघ्र ही नीचे उतरकर समुद्रमें जा मिली। सागरमें मिलनेवाली वह पावन सरिता ही गंगा है।
जहार मेदिनीं सर्वां हत्वा दानवपुङ्गवान् ।
आसुरीं श्रियमाहृत्य त्रींल्लोकान् स जनार्दनः ।।
सपुत्रदारानसुरान् पाताले तानपातयत् ।
नमुचिः शम्बरश्चैव प्रह्लादश्च महामनाः ।।
पादपाताभिनिर्धूताः पाताले विनिपातिताः ।
महाभूतानि भूतात्मा स विशेषेण वै हरिः ।।
कालं च सकलं राजन् गात्रभूतान्यदर्शयत् ।
भगवान् श्रीहरिने बड़े-बड़े दानवोंको मारकर सारी पृथ्वी उनके अधिकारसे छीन ली और तीनों लोकोंके साथ सारी आसुरी-सम्पदाका अपहरण करके उन असुरोंको स्त्री-पुत्रोंसहित पातालमें भेज दिया। नमुचि, शम्बर और महामना प्रह्लाद भगवान्के चरणोंके स्पर्शसे पवित्र हो गये। भगवान्ने उनको भी पातालमें भेज दिया। राजन्! भूतात्मा भगवान् श्रीहरिने अपने श्रीअंगोंमें विशेषरूपसे पंचमहाभूतों तथा भूत, भविष्य और वर्तमान—सभी कालोंका दर्शन कराया।
तस्य गात्रे जगत् सर्वमानीतमिव दृश्यते ।।
न किंचिदस्ति लोकेषु यदव्याप्तं महात्मना ।
तद्धि रूपं महेशस्य देवदानवमानवाः ।।
दृष्ट्वा तं मुमुहुः सर्वे विष्णुतेजोऽभिपीडिताः ।
उनके शरीरमें सारा संसार इस प्रकार दिखायी देता था, मानो उसमें लाकर रख दिया गया हो। संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो उन परमात्मासे व्याप्त न हो। परमेश्वर भगवान् विष्णुके उस रूपको देखकर उनके तेजसे तिरस्कृत हो देवता, दानव और मानव सभी मोहित हो गये। बलिर्बद्धोऽभिमानी च यज्ञवाटे महात्मना ।। विरोचनकुलं सर्वं पाताले विनिपातितम् ।। अभिमानी राजा बलिको भगवान्ने यज्ञमण्डपमें ही बाँध लिया और विरोचनके समस्त कुलको स्वर्गसे पातालमें भेज दिया। एवंविधानि कर्माणि कृत्वा गरुडवाहनः । न विस्मयमुपागच्छत् पारमेष्ठ्येन तेजसा ।। गरुडवाहन भगवान् विष्णुको अपने पारमेश्वरीय तेजसे उपर्युक्त कर्म करके भी अहंकार नहीं हुआ। स सर्वममरैश्वर्यं सम्प्रदाय शचीपतेः । त्रैलोक्यं च ददौ शके विष्णुर्दानवसूदनः ।। दानवसूदन श्रीविष्णुने शचीपति इन्द्रको समस्त देवताओंका आधिपत्य देकर त्रिलोकीका राज्य भी उन्हें दे दिया। एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मनः । वेदविद्भिर्द्विजैरेतत् कथ्यते वैष्णवं यशः ।। मानुषेषु यथा विष्णोः प्रादुर्भावं तथा शृणु ।। इस प्रकार परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वृत्तान्त संक्षेपसे तुम्हें बताया गया। वेदवेत्ता ब्राह्मण भगवान् विष्णुके इस सुयशका वर्णन करते हैं। युधिष्ठिर! अब तुम मनुष्योंमें श्रीहरिके जो अवतार हुए हैं, उनका वृत्तान्त सुनो। विष्णोः पुनर्महाराज प्रादुर्भावो महात्मनः । दत्तात्रेय इति ख्यात ऋषिरासीन्महायशाः ।। महाराज! अब मैं पुनः भगवान् विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन करता हूँ। दत्तात्रेयजी महान् यशस्वी महर्षि थे। तेन नष्टेषु वेदेषु क्रियासु च मखेषु च । चातुर्वर्ण्ये च संकीर्णे धर्मे शिथिलतां गते ।। अभिवर्धति चाधर्मे सत्ये नष्टे स्थितेऽनृते । प्रजासु क्षीयमाणासु धर्मे चाकुलतां गते ।। सयज्ञाः सक्रिया वेदाः प्रत्यानीताश्च तेन वै । चातुर्वर्ण्यमसंकीर्णं कृतं तेन महात्मना ।। स एव वै यदा प्रादाद्धैहयाधिपतेर्वरम् ।
तं हैहयानामधिपस्त्वर्जुनोऽभिप्रसादयत् ॥ एक समयकी बात है, सारे वेद नष्ट-से हो गये। वैदिक कर्मों और यज्ञ-यागादिकोंका लोप हो गया। चारों वर्ण एकमें मिल गये और सर्वत्र वर्णसंकरता फैल गयी। धर्म शिथिल हो गया एवं अधर्म दिनोंदिन बढ़ने लगा। सत्य दब गया और सब ओर असत्यने सिक्का जमा लिया। प्रजा क्षीण होने लगी और धर्मको अधर्मद्वारा हर तरहसे पीड़ा (हानि) पहुँचने लगी। ऐसे समयमें महात्मा दत्तात्रेयने यज्ञ और कर्मानुष्ठानकी विधिसहित सम्पूर्ण वेदोंका पुनरुद्धार किया और पुनः चारों वर्णोंको पृथक्- पृथक् अपनी-अपनी मर्यादामें स्थापित किया। इन्होंने ही हैहयराज अर्जुनको वर प्रदान किया था। हैहयराज अर्जुनने अपनी सेवाओंद्वारा दत्तात्रेयजीको प्रसन्न कर लिया था। वने पर्यचरत् सम्यक् शुश्रूषुरनसूयकः । निर्ममो निरहंकारो दीर्घकालमतोषयत् ॥ आराध्य दत्तात्रेयं हि अगृह्णात् स वरानिमान् । आप्तादाप्ततराद् विप्राद् विद्वान् विद्वन्निषेवितात् ॥ ऋतेऽमरत्वं विप्रेण दत्तात्रेयेण धीमता । वरैश्चतुर्भिः प्रवृत्त इमांस्तत्राभ्यनन्दत ॥ वह अच्छी तरह सेवामें संलग्न हो वनमें मुनिवर दत्तात्रेयकी परिचर्यामें लगा रहता था। उसने दूसरोंका दोष देखना छोड़ दिया था। वह ममता और अहंकारसे रहित था। उसने दीर्घकालतक दत्तात्रेयजीकी आराधना करके उन्हें संतुष्ट किया। दत्तात्रेयजी आप्त पुरुषोंसे भी बढ़कर आप्त पुरुष थे। बड़े-बड़े विद्वान् उनकी सेवामें रहते थे। विद्वान् सहस्रबाहु अर्जुनने उन ब्रह्मर्षिसे ये निम्नांकित वर प्राप्त किये। अमरत्व छोड़कर उसके माँगे हुए सभी वर विद्वान् ब्राह्मण दत्तात्रेयजीने दे दिये। उसने चार वरोंके लिये महर्षिसे प्रार्थना की थी और उन चारोंका ही महर्षिने अभिनन्दन किया था। श्रीमान् मनस्वी बलवान् सत्यवागनसूयकः । सहस्रबाहुर्भूयासमेष मे प्रथमो वरः ॥ जरायुजाण्डजं सर्वं सर्वं चैव चराचरम् । प्रशासितुमिच्छे धर्मेण द्वितीयस्त्वेष मे वरः ॥ (वे वर इस प्रकार हैं—हैहयराज बोला—) 'मैं श्रीमान्, मनस्वी, बलवान्, सत्यवादी, अदोषदर्शी तथा सहस्रभुजाओंसे विभूषित होऊँ, यह मेरे लिये पहला वर है। 'मैं जरायुज और अण्डज जीवोंके साथ-साथ समस्त चराचर जगत्का धर्मपूर्वक शासन करना चाहता हूँ'—मेरे लिये दूसरा वर यही हो। पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् यजेयं विपुलैर्मखैः । अमित्रान् निशितैर्बाणैर्घातयेयं रणाजिरे ॥ दत्तात्रेयेह भगवंस्तृतीयो वर एष मे ।
यस्य नासीन्न भविता न चास्ति सदृशः पुमान् ।।
इह वा दिवि वा लोके स मे हन्ता भवेदिति ।।
‘मैं अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा ब्राह्मण अतिथियोंका
यजन करूँ और जो लोग मेरे शत्रु हैं, उन्हें समरांगणमें तीखे बाणोंद्वारा मारकर यमलोक
पहुँचा दूँ।' भगवन् दत्तात्रेय! मेरे लिये यही तीसरा वर हो। 'जिसके समान इहलोक या
स्वर्गलोकमें कोई पुरुष न था, न है और न होगा ही, वही मेरा वध करनेवाला हो' (यह मेरे
लिये चौथा वर हो)।
सोऽर्जुनः कृतवीर्यस्य वरः पुत्रोऽभवद् युधि ।
स सहस्रं सहस्राणां माहिष्मत्यामवर्धत ।।
वह अर्जुन राजा कृतवीर्यका ज्येष्ठ पुत्र था और युद्धमें महान् शौर्यका परिचय देता था।
उसने माहिष्मती नगरीमें दस लाख वर्षोंतक निरन्तर अभ्युदयशील होकर राज्य किया।
पृथिवीमखिलां जित्वा द्वीपांश्चापि समुद्रिनः ।
नभसीव ज्वलन् सूर्यः पुण्यैः कर्मभिरर्जुनः ।।
जैसे आकाशमें सूर्यदेव सदा प्रकाशमान होते हैं, उसी प्रकार कार्तवीर्य अर्जुन सारी
पृथ्वी और समुद्री द्वीपोंको जीतकर इस भूतलपर अपने पुण्यकर्मोंसे प्रकाशित हो रहा था।
इन्द्रद्वीपं कशेरुं च ताम्रद्वीपं गभस्तिमत् ।
गान्धर्वं वारुणं द्वीपं सौम्याक्षमिति च प्रभुः ।।
पूर्वेरजितपूर्वांश्च द्वीपानजयदर्जुनः ।।
सौवर्णं सर्वमप्यासीद् विमानवरमुत्तमम् ।
चतुर्थाव्यभजद् राष्ट्रं तद् विभज्यान्वपालयत् ।।
शक्तिशाली सहस्रबाहुने इन्द्रद्वीप, कशेरुद्वीप, ताम्रद्वीप, गभस्तिमान् द्वीप, गन्धर्वद्वीप,
वरुणद्वीप और सौम्याक्षद्वीपको, जिन्हें उसके पूर्वजोंने भी नहीं जीता था, जीतकर अपने
अधिकारमें कर लिया। उसका श्रेष्ठ राजभवन बहुत ही सुन्दर और सारा-का-सारा सुवर्णमय
था। उसने अपने राज्यकी आयको चार भागोंमें बाँट रखा था और इस विभाजनके अनुसार
ही वह प्रजाका पालन करता था।
एकांशेनाहरत् सेनामेकांशेनावसद् गृहान् ।
यस्तु तस्य तृतीयांशो राजाऽऽसीज्जनसंग्रहे ।।
आप्तः परमकल्याणस्तेन यज्ञानकल्पयत् ।।
वह उस आयके एक अंशके द्वारा सेनाका संग्रह और संरक्षण करता था, दूसरे अंशके
द्वारा गृहस्थीका खर्च चलाता था तथा उसका जो तीसरा अंश था, उसके द्वारा राजा अर्जुन
प्रजाजनोंकी भलाईके लिये यज्ञोंका अनुष्ठान करता था। वह सबका विश्वासपात्र और परम
कल्याणकारी था।
ये दस्यवो ग्रामचरा अरण्ये च वसन्ति ये ।
चतुर्थेन च सोऽंशेन तान् सर्वान् प्रत्यषेधयत् ॥ सर्वेभ्यश्चान्तवासिभ्यः कार्तवीर्योऽहरद् बलिम् । आहृतं स्वबलैर्यत् तदर्जुनश्चाभिमन्यते ॥ काको वा मूषिको वापि तं तमेव न्यबर्हयत् । द्वाराणि नापिधीयन्ते राष्ट्रेषु नगरेषु च ॥ वह राजकीय आयके चौथे अंशके द्वारा गाँवों और जंगलोंमें डाकुओं और लुटेरोंको शासनपूर्वक रोकता था। कृतवीर्यकुमार अर्जुन उसी धनको अच्छा मानता था, जिसे उसने अपने बल-पराक्रमद्वारा प्राप्त किया हो। काक या मूषकवृत्तिसे जो लोग प्रजाके धनका अपहरण करते थे, उन सबको वह नष्ट कर देता था। उसके राज्यके भीतर गाँवों तथा नगरोंमें घरके दरवाजे बंद नहीं किये जाते थे। स एव राष्ट्रपालोऽभूत् स्त्रीपालोऽभवदर्जुनः । स एवासीदजापालः स गोपालो विशाम्पते ॥ राजन्! कार्तवीर्य अर्जुन ही समूचे राष्ट्रका पोषक, स्त्रियोंका संरक्षक, बकरियोंकी रक्षा करनेवाला तथा गौओंका पालक था। स स्मारण्ये मनुष्याणां राजा क्षेत्राणि रक्षति । इदं तु कार्तवीर्यस्य बभूवासदृशं जनैः ॥ वही जंगलोंमें मनुष्योंके खेतोंकी रक्षा करता था। यह है कार्तवीर्यका अद्भुत कार्य, जिसकी मनुष्योंसे तुलना नहीं हो सकती। न पूर्वे नापरे तस्य गमिष्यन्ति गतिं नृपाः । यदर्णवे प्रयातस्य वस्त्रं न परिषिच्यते ॥ शतं वर्षसहस्राणामनुशिष्यार्जुनो महीम् । दत्तात्रेयप्रसादेन एवं राज्यं चकार सः ॥ न पहलेका कोई राजा कार्तवीर्यकी किसी महत्ताको प्राप्त कर सका और न भविष्यमें ही कोई प्राप्त कर सकेगा। वह जब समुद्रमें चलता था, तब उसका वस्त्र नहीं भीगता था। राजा अर्जुन दत्तात्रेयजीके कृपाप्रसादसे लाखों वर्षतक पृथ्वीपर शासन करते हुए इस प्रकार राज्यका पालन करता रहा। एवं बहूनि कर्माणि चक्रे लोकहिताय सः । दत्तात्रेय इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥ कथितो भरतश्रेष्ठ शृणु भूयो महात्मनः ॥ यदा भृगुकुले जन्म यदर्थं च महात्मनः । जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥ इस प्रकार उसने लोकहितके लिये बहुत-से कार्य किये। भरतश्रेष्ठ! यह मैंने भगवान् विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन किया। अब पुनः उन महात्माके अन्य अवतारका
वर्णन सुनो। भगवान्का वह अवतार जामदग्न्य (परशुराम)-के नामसे विख्यात है। उन्होंने
किसलिये और कब भृगुकुलमें अवतार ग्रहण किया, वह प्रसंग बतलाता हूँ; सुनो।
जगदग्निसुतो राजन् रामो नाम स वीर्यवान् ।
हैहयान्तकरो राजन् स रामो बलिनां वरः ॥
कार्तवीर्यो महावीर्यो बलेनाप्रतिमस्तथा ।
रामेण जामदग्न्येन हतो विषममाचरन् ।।
महाराज युधिष्ठिर! महर्षि जमदग्निके पुत्र परशुराम बड़े पराक्रमी हुए हैं। बलवानोंमें
श्रेष्ठ परशुरामजीने ही हैहयवंशका संहार किया था। महापराक्रमी कार्तवीर्य अर्जुन बलमें
अपना सानी नहीं रखता था; किंतु अपने अनुचित बर्तावके कारण जमदग्निनन्दन
परशुरामके द्वारा मारा गया।
तं कार्तवीर्यं राजानं हैहयानामरिंदमम् ।
रथस्थं पार्थिवं रामः पातयित्वावधीद् रणे ।।
शत्रुसूदन हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन रथपर बैठा था, परंतु युद्धमें परशुरामजीने उसे
नीचे गिराकर मार डाला।
जम्भस्य मूर्ध्नि भेत्ता च हन्ता च शतदुन्दुभेः ।
स एष कृष्णो गोविन्दो जातो भृगुषु वीर्यवान् ।।
सहस्रबाहुमुद्धर्तुं सहस्रजितमाहवे ।।
क्षत्रियाणां चतुष्षष्टिमयुतानां महायशाः ।
सरस्वत्यां समेतानि एष वै धनुषाजयत् ।।
ब्रह्मद्विषां वधे तस्मिन् सहस्राणि चतुर्दश ।
पुनर्जग्राह शूराणामन्तं चक्रे नरर्षभः ।।
ततो दशसहस्रस्य हन्ता पूर्वमरिंदमः ।
सहस्रं मुसलेनाहन् सहस्रमुदकृन्तत ।।
ये भगवान् गोविन्द ही पराक्रमी परशुरामरूपसे भृगुवंशमें अवतीर्ण हुए। ये ही
जम्भासुरका मस्तक विदीर्ण करनेवाले तथा शतदुन्दुभिके घातक हैं। इन्होंने सहस्रोंपर
विजय पानेवाले सहस्रबाहु अर्जुनका युद्धमें संहार करनेके लिये ही अवतार लिया था।
महायशस्वी परशुरामने केवल धनुषकी सहायतासे सरस्वती नदीके तटपर एकत्रित हुए छः
लाख चालीस हजार क्षत्रियोंपर विजय पायी थी। वे सभी क्षत्रिय ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले
थे। उनका वध करते समय नरश्रेष्ठ परशुरामने और भी चौदह हजार शूरवीरोंका अन्त कर
डाला। तदनन्तर शत्रुदमन रामने दस हजार क्षत्रियोंका और वध किया। इसके बाद उन्होंने
हजारों वीरोंको मूसलसे मारकर यमलोक पहुँचा दिया तथा सहस्रोंको फरसेसे काट डाला।
चतुर्दश सहस्राणि क्षणमात्रमपातयत् ।
शिष्टान् ब्रह्मद्विषश्छित्त्वा ततोऽस्नायत भार्गवः ।।
राम रामेत्यभिक्रुष्टो ब्राह्मणैः क्षत्रियार्दितैः । न्यघ्नद् दशसहस्राणि रामः परशुनाभिभूः ॥ भृगुनन्दन परशुरामने चौदह हजार क्षत्रियोंको क्षणमात्रमें मार गिराया तथा शेष ब्रह्मद्रोहियोंका भी मूलोच्छेद करके स्नान किया। क्षत्रियोंसे पीड़ित होकर ब्राह्मणोंने ‘राम-राम’ कहकर आर्तनाद किया था; इसीलिये सर्वविजयी परशुरामने पुनः फरसेसे दस हजार क्षत्रियोंका अन्त किया।
न हृमृष्यत तां वाचमार्तैर्भृशमुदीरिताम् । भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजातयः ॥ जिस समय द्विजलोग ‘भृगुनन्दन परशुराम! दौड़ो, बचाओ’ इत्यादि बातें कहकर करुणक्रन्दन करते, उस समय उन पीड़ितोंद्वारा कही हुई वह आर्तवाणी परशुरामजी नहीं सहन कर सके।
काश्मीरान् दरदान् कुन्तीन् क्षुद्रकान् मालवाञ्छकान् । चेदिकाशिकरूषांश्च ऋषिकान् क्रथकैशिकान् ॥ अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश्च मागधान् काशिकोसलान् । रात्रायणान् वीतिहोत्रान् किरातान् मार्तिकावतान् ॥ एतानन्यांश्च राजेन्द्रान् देशे देशे सहस्रशः । निकृत्य निशितैर्बाणैः सम्प्रदाय विवस्वते ॥ उन्होंने काश्मीर, दरद, कुन्तिभोज, क्षुद्रक, मालव, शक, चेदि, काशि, करूष, ऋषिक, क्रथ, कैशिक, अंग, वंग, कलिंग, मागध, काशी, कोसल, रात्रायण, वीतिहोत्र, किरात तथा मार्तिकावत—इनको तथा अन्य सहस्रों राजेश्वरोंको प्रत्येक देशमें तीखे बाणोंसे मारकर यमराजके भेंट कर दिया।
कीर्णा क्षत्रियकोटीभिः मेरुमन्दरभूषणा । त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥ मेरु और मन्दर पर्वत जिसके आभूषण हैं, वह पृथिवी करोड़ों क्षत्रियोंकी लाशोंसे पट गयी। एक-दो बार नहीं, इक्कीस बार परशुरामने यह पृथिवी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी।
एवमिष्ट्वा महाबाहुः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । अन्यद् वर्षशतं रामः सौभे शाल्वमयोधयत् ॥ ततः स भृगुशार्दूलस्तं सौभं योधयन् प्रभुः । सुबन्धुरं रथं राजन्नास्थाय भरतर्षभ ॥ नग्निकानां कुमारीणां गायन्तीनामुपाशृणोत् । तदनन्तर महाबाहु परशुरामने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके सौ वर्षोंतक सौभ नामक विमानपर बैठे हुए राजा शाल्वके साथ युद्ध किया। भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर!