महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1876, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुप्त्वा युगसहस्रं स प्रादुर्भवति कार्यवान् । पूर्णे युगसहस्रेऽथ देवदेवो जगत्पतिः ॥ ब्रह्माणं कपिलं चैव परमेष्ठिनमेव च । देवान् सप्त ऋषींश्चैव शङ्करं च महायशाः ॥ देवाधिदेव जगदीश्वर महायशस्वी भगवान् श्रीहरि सहस्र युगोंतक शयन करनेके पश्चात् कल्पान्तकी सहस्रयुगात्मक अवधि पूरी होनेपर प्रकट होते और सृष्टिकार्यमें संलग्न हो परमेष्ठी ब्रह्मा, कपिल, देवगणों, सप्तर्षियों तथा शंकरकी उत्पत्ति करते हैं।
सनत्कुमारं भगवान् मनुं चैव प्रजापतिम् । पुरा चक्रेऽथ देवादीन् प्रदीप्ताग्निसमप्रभः ॥ इसी प्रकार भगवान् श्रीहरि सनत्कुमार, मनु एवं प्रजापतिको भी उत्पन्न करते हैं। पूर्वकालमें प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी नारायणदेवने ही देवताओं आदिकी सृष्टि की है।
येन चार्णवमध्यस्थौ नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टदेवासुरनरे प्रणष्टोरगराक्षसे ॥ योद्धुकामौ सुदुर्धर्षौ भ्रातरौ मधुकैटभौ । हतौ भगवता तेन तयोर्दत्त्वा वृतं वरम् ॥ पहलेकी बात है, प्रलयकालमें समस्त चराचर प्राणी, देवता, असुर, मनुष्य, नाग तथा राक्षस सभी नष्ट हो चुके थे। उस समय एकार्णव (महासागर)-की जलराशिमें दो अत्यन्त दुर्धर्ष दैत्य रहते थे, जिनके नाम थे—मधु और कैटभ। वे दोनों भाई युद्धकी इच्छा रखते थे। उन्हीं भगवान् नारायणने उन्हें मनोवांछित वर देकर उन दोनों दैत्योंका वध किया था।
भूमिं बद्ध्वा कृतौ पूर्वं मृन्मयौ द्वौ महासुरौ । कर्णस्रोतोद्भवौ तौ तु विष्णोस्तस्य महात्मनः ॥ कहते हैं, वे दोनों महान् असुर महात्मा भगवान् विष्णुके कानोंकी मैलसे उत्पन्न हुए थे। पहले भगवान्ने इस पृथ्वीको आबद्ध करके मिट्टीसे ही उनकी आकृति बनायी थी।
महार्णवे प्रस्वपतः शैलराजसमौ स्थितौ । तौ विवेश स्वयं वायुः ब्रह्मणा साधु चोदितः ॥ वे पर्वतराज हिमालयके समान विशाल शरीर लिये महासागरके जलमें सो रहे थे। उस समय ब्रह्माजीकी प्रेरणासे स्वयं वायुदेवने उनके भीतर प्रवेश किया।
तौ दिवं छादयित्वा तु ववृधाते महासुरौ । वायुप्राणौ तु तौ दृष्ट्वा ब्रह्मा पर्यामृशच्छनैः ॥ फिर तो वे दोनों महान् असुर सम्पूर्ण द्युलोकको आच्छादित करके बढ़ने लगे। वायुदेव ही जिनके प्राण थे, उन दोनों असुरोंको देखकर ब्रह्माजीने धीरे-धीरे उनके शरीरपर हाथ फेरा।