महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1877, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकं मृदुतरं बुद्ध्वा कठिनं बुध्य चापरम् । नामनी तु तयोश्चक्रे स विभुः सलिलोद्भवः ॥ एकका शरीर उन्हें अत्यन्त कोमल प्रतीत हुआ और दूसरेका अत्यन्त कठोर। तब जलसे उत्पन्न होनेवाले भगवान् ब्रह्माने उन दोनोंका नामकरण किया।
मृदुस्त्वयं मधुर्नाम कठिनः कैटभः स्वयम् । तौ दैत्यौ कृतनामानौ चेरतुर्बलगर्वितौ ॥ यह जो मृदुल शरीरवाला असुर है, इसका नाम मधु होगा और जिसका शरीर कठोर है, वह कैटभ कहलायेगा। इस प्रकार नाम निश्चित हो जानेपर वे दोनों दैत्य बलसे उन्मत्त होकर सब ओर विचरने लगे।
तौ पुराथ दिवं सर्वां प्राप्तौ राजन् महासुरौ । प्रच्छाद्याथ दिवं सर्वां चेरतुर्मधुकैटभौ ॥ राजन्! सबसे पहले वे दोनों महादैत्य मधु और कैटभ द्युलोकमें पहुँचे और उस सारे लोकको आच्छादित करके सब ओर विचरने लगे।
सर्वमेकार्णवं लोकं योद्धुकामौ सुनिर्भयौ । तौ गतावासुरौ दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ एकार्णवाम्बुनिचये तत्रैवान्तरधीयत । उस समय सारा लोक जलमय हो रहा था। उसमें युद्धकी कामनासे अत्यन्त निर्भय होकर आये हुए उन दोनों असुरोंको देखकर लोकपितामह ब्रह्माजी वहीं एकार्णवरूप जलराशिमें अन्तर्धान हो गये।
स पद्मे पद्मनाभस्य नाभिदेशात् समुत्थिते ॥ आसीदादौ स्वयंजन्म तत् पङ्कजमपङ्कजम् । पूजयामास वसतिं ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ वे भगवान् पद्मनाभ (विष्णु)-की नाभिसे प्रकट हुए कमलमें जा बैठे। वह कमल वहाँ पहले ही स्वयं प्रकट हुआ था। कहनेको तो वह पंकज था, परंतु पंकसे उसकी उत्पत्ति नहीं हुई थी। लोकपितामह ब्रह्माने अपने निवासके लिये उस कमलको ही पसंद किया और उसकी भूरि-भूरि सराहना की।
तावुभौ जलगर्भस्थौ नारायणचतुर्मुखौ । बहून् वर्षायुतानप्सु शयानौ न चकम्पतुः ॥ अथ दीर्घस्य कालस्य तावुभौ मधुकैटभौ । आजग्मतुस्तौ तं देशं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः ॥ भगवान् नारायण और ब्रह्मा दोनों ही अनेक सहस्र वर्षोंतक उस जलके भीतर सोते रहे; किंतु कभी तनिक भी कम्पायमान नहीं हुए। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् वे दोनों असुर मधु और कैटभ उसी स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ ब्रह्माजी स्थित थे।