भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1980, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1980

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(शिशुपालवधपर्व)

चत्वारिंंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरकी चिन्ता और भीष्मजीका उन्हें सान्त्वना देना

वैशम्पायन उवाच

ततः सागरसंकाशं दृष्ट्वा नृपतिमण्डलम् ।
संवर्तवाताभिहतं भीमं क्षुब्धमिवार्णवम् ॥ १ ॥
रोषात् प्रचलितं सर्वमिदमाह युधिष्ठिरः ।
भीष्मं मतिमतां मुख्यं वृद्धं कुरुपितामहम् ।
बृहस्पतिं बृहत्तेजाः पुरुहूत इवारिहा ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर प्रलयकालीन महावायुके थपेड़ोंसे क्षुब्ध हुए भयंकर महासागरकी भाँति राजाओंके उस समुदायको क्रोधसे चंचल हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीसे उसी प्रकार बोले, जैसे शत्रुहन्ता महातेजस्वी इन्द्र बृहस्पतिजीसे कोई बात पूछते हैं— ॥ १-२ ॥
असौ रोषात् प्रचलितो महान् नृपतिसागरः ।
अत्र यत् प्रतिपत्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३ ॥
'पितामह! यह देखिये, राजाओंका महासमुद्र रोषसे अत्यन्त चंचल हो उठा है। अब यहाँ इन सबको शान्त करनेका जो उचित उपाय जान पड़े, वह मुझे बताइये ॥ ३ ॥
यज्ञस्य च न विघ्नः स्यात् प्रजानां च हितं भवेत् ।
यथा सर्वत्र तत् सर्वं ब्रूहि मेऽद्य पितामह ॥ ४ ॥
'दादाजी! यज्ञमें विघ्न न पड़े और प्रजाओंका हित हो तथा जिस प्रकार सर्वत्र शान्ति भी बनी रहे, वह सब उपाय अब मुझे बतानेकी कृपा करें' ॥ ४ ॥
इत्युक्तवति धर्मज्ञे धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
उवाचेदं वचो भीष्मस्ततः कुरुपितामहः ॥ ५ ॥
धर्मके ज्ञाता धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुरुकुलपितामह भीष्मजी इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
मा भैस्त्वं कुरुशार्दूल श्वा सिंहं हन्तुमर्हति ।
शिवः पन्थाः सुनीतोऽत्र मया पूर्वतरं वृतः ॥ ६ ॥

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