महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2092, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंबुद्धिमान् विदुरजी! मैं राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे जूएमें अवश्य चलना चाहता हूँ। पुत्रको पिता सदैव प्रिय है; अतः आपने मुझे जैसा आदेश दिया है, वैसा ही करूँगा ॥
न चाकामः शकुनिना देविताहं न चेन्मां जिष्णुराह्वयिता सभायाम् । आहूतोऽहं न निवर्ते कदाचित् तदाहितं शाश्वतं वै व्रतं मे ॥ १६ ॥
मेरे मनमें जूआ खेलनेकी इच्छा नहीं है। यदि मुझे विजयशील राजा धृतराष्ट्र सभामें न बुलाते, तो मैं शकुनिसे कभी जुआ न खेलता; किंतु बुलानेपर मैं कभी पीछे नहीं हटूँगा। यह मेरा सदाका नियम है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा विदुरं धर्मराजः प्रायात्रिकं सर्वमाज्ञाप्य तूर्णम् । प्रायाच्छ्वोभूते सगणः सानुयात्रः सह स्त्रीभिर्द्रौपदीमादि कृत्वा ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! विदुरसे ऐसा कहकर धर्मराज युधिष्ठिरने तुरंत ही यात्राकी सारी तैयारी करनेके लिये आज्ञा दे दी। फिर सबेरा होनेपर उन्होंने अपने भाई-बन्धुओं, सेवकों तथा द्रौपदी आदि स्त्रियोंके साथ हस्तिनापुरकी यात्रा की ॥ १७ ॥
दैवं हि प्रज्ञां मुष्णाति चक्षुस्तेज इवापतत् । धातुश्च वशमन्वेति पाशैरिव नरः सितः ॥ १८ ॥
जैसे उत्कृष्ट तेज सामने आनेपर आँखकी ज्योतिको हर लेता है, उसी प्रकार दैव मनुष्यकी बुद्धिको हर लेता है। दैवसे ही प्रेरित होकर मनुष्य रस्सीमें बँधे हुएकी भाँति विधाताके वशमें घूमता रहता है ॥ १८ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ राजा सह क्षत्रा युधिष्ठिरः । अमृष्यमाणस्तस्याथ समाह्वानमरिंदमः ॥ १९ ॥
ऐसा कहकर शत्रुदमन राजा युधिष्ठिर जूएके लिये राजा धृतराष्ट्रके उस बुलावेको सहन न करते हुए भी विदुरजीके साथ वहाँ जानेको उद्यत हो गये ॥ १९ ॥
बाह्लीकेन रथं यत्तमास्थाय परवीरहा । परिच्छन्नो ययौ पार्थो भ्रातृभिः सह पाण्डवः ॥ २० ॥
बाह्लीकद्वारा जोते हुए रथपर बैठकर शत्रुसूदन पाण्डुकुमार युधिष्ठिरने अपने भाइयोंके साथ हस्तिनापुरकी यात्रा प्रारम्भ की ॥ २० ॥
राजश्रिया दीप्यमानो ययौ ब्रह्मपुरःसरः ।