महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविदुर उवाच
गान्धारराजः शकुनिर्विशाम्पते राजातिदेवी कृतहस्तो मताक्षः । विविंशतिश्चित्रसेनश्च राजा सत्यव्रतः पुरुमित्रो जयश्च ॥ १३ ॥
विदुरने कहा— राजन्! वहाँ गान्धारराज शकुनि है, जो जुएका बहुत बड़ा खिलाड़ी है। वह अपनी इच्छाके अनुसार पासे फेंकनेमें सिद्धहस्त है। उसे द्यूतविद्याके रहस्यका ज्ञान है। उसके सिवा राजा विविंशति, चित्रसेन, राजा सत्यव्रत, पुरुमित्र और जय भी रहेंगे ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
महाभयाः कितवाः संनिविष्टा मायोपधा देवितारोऽत्र सन्ति । धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं सर्वं जगत् तिष्ठति न स्वतन्त्रम् ॥ १४ ॥
युधिष्ठिर बोले— तब तो वहाँ बड़े भयंकर, कपटी और धूर्त जुआरी जुटे हुए हैं। विधाताका रचा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् दैवके ही अधीन है; स्वतन्त्र नहीं है ॥ १४ ॥
नाहं राज्ञो धृतराष्ट्रस्य शासना- न्न गन्तुमिच्छामि कवे दुरोदरम् । इष्टो हि पुत्रस्य पिता सदैव तदस्मि कर्ता विदुरात्थ मां यथा ॥ १५ ॥