महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्यूते क्षत्तः कलहो विद्यते नः को वै द्यूतं रोचयेद् बुध्यमानः । किं वा भवान् मन्यते युक्तरूपं भवद्वाक्ये सर्व एव स्थिताः स्म ॥ १० ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**विदुरजी! जूएमैं तो झगड़ा-फसाद होता है। कौन समझदार मनुष्य जूआ खेलना पसंद करेगा अथवा आप क्या ठीक समझते हैं; हम सब लोग तो आपकी आज्ञाके अनुसार ही चलनेवाले हैं ॥ १० ॥
विदुर उवाच
जानाम्यहं द्यूतमनर्थमूलं कृतश्च यत्नोऽस्य मया निवारणे । राजा च मां प्राहिणोत् त्वत्सकाशं श्रुत्वा विद्वञ्छ्रेय इहाचरस्व ॥ ११ ॥ **विदुरजीने कहा—**विद्वन्! मैं जानता हूँ, जूआ अनर्थकी जड़ है; इसीलिये मैंने उसे रोकनेका प्रयत्न भी किया तथापि राजा धृतराष्ट्रने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, यह सुनकर तुम्हें जो कल्याणकर जान पड़े, वह करो ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
के तत्रान्ये कितवा दीव्यमाना विना राज्ञो धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः । पृच्छामि त्वां विदुर ब्रूहि नस्तान् यैर्दीव्यामः शतशः संनिपत्य ॥ १२ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**विदुरजी! वहाँ राजा धृतराष्ट्रके पुत्रोंको छोड़कर दूसरे कौन-कौन धूर्त जुआ खेलनेवाले हैं? यह मैं आपसे पूछता हूँ। आप उन सबको बताइये, जिनके साथ मिलकर और सैकड़ोंकी बाजी लगाकर हमें जुआ खेलना पड़ेगा ॥ १२ ॥