महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयः पुत्राधिमसम्प्राप्य स्वर्गेच्छामकरोत् प्रियाम् ॥ १८ ॥ मैं तो तुम्हारे तपस्वी एवं मेधावी पिताको ही धन्य मानती हूँ, जिन्होंने पुत्रोंके दुःखसे दुःखी होनेका अवसर न पाकर स्वर्गलोककी अभिलाषाको ही प्रिय समझा ॥ १८ ॥ धन्यां चातीन्द्रियज्ञानामिमां प्राप्तां परां गतिम् । मन्ये तु माद्रीं धर्मज्ञां कल्याणीं सर्वथैव तु ॥ १९ ॥ रत्या मत्या च गत्या च ययाहमभिसन्धिता । जीवितप्रियतां मह्यं धिङ्मां संक्लेशभागिनीम् ॥ २० ॥ इसी प्रकार अतीन्द्रिय ज्ञानसे सम्पन्न एवं परमगतिको प्राप्त हुई कल्याणमयी इस धर्मज्ञा माद्रीको भी सर्वथा धन्य मानती हूँ। जिसने अपने अनुराग, उत्तम बुद्धि और सद्व्यवहारद्वारा मुझे भुलाकर जीवित रहनेके लिये विवश कर दिया। मुझको और जीवनके प्रति मेरी इस आसक्तिको धिक्कार है! जिसके कारण मुझे यह महान् क्लेश भोगना पड़ता है ॥ १९-२० ॥ पुत्रका न विहास्ये वः कृच्छ्रलब्धान् प्रियान् सतः । साहं यास्यामि हि वनं हा कृष्णे किं जहासि माम् ॥ २१ ॥ पुत्रो! तुम सदाचारी और मेरे लिये प्राणोंसे भी अधिक प्यारे हो। मैंने बड़े कष्टसे तुम्हें पाया है; अतः तुम्हें छोड़कर अलग नहीं रहूँगी। मैं भी तुम्हारे साथ वनमें चलूँगी। हाय कृष्णे! तुम क्यों मुझे छोड़े जाती हो? ॥ अन्तवत्यसुधर्मेऽस्मिन् धात्रा किं नु प्रमादतः । ममान्तो नैव विहितस्तेनायुर्न जहाति माम् ॥ २२ ॥ यह प्राणधारणरूपी धर्म अनित्य है, एक-न-एक दिन इसका अन्त होना निश्चित है, फिर भी विधाताने न जाने क्यों प्रमादवश मेरे जीवनका भी शीघ्र ही अन्त नहीं नियत कर दिया। तभी तो आयु मुझे छोड़ नहीं रही है ॥ हा कृष्ण द्वारकावासिन् क्वासि संकर्षणानुज । कस्मान्न त्रायसे दुःखान्मां चेमांश्च नरोत्तमान् ॥ २३ ॥ हा द्वारकावासी श्रीकृष्ण! तुम कहाँ हो! बलरामजीके छोटे भैया! मुझको तथा इन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको इस दुःखसे क्यों नहीं बचाते? ॥ २३ ॥ अनादिनिधनं ये त्वामनुध्यायन्ति वै नराः । तांस्त्वं पासीत्ययं वादः स गतो व्यर्थतां कथम् ॥ २४ ॥ 'प्रभो! तुम आदि-अन्तसे रहित हो, जो मनुष्य तुम्हारा निरन्तर स्मरण करते हैं, उन्हें तुम अवश्य संकटसे बचाते हो।' तुम्हारी यह विरद व्यर्थ कैसे हो रही है? ॥ २४ ॥ इमे सद्धर्ममाहात्म्ययशोवीर्यानुवर्तिनः । नार्हन्ति व्यसनं भोक्तुं नन्वेषां क्रियतां दया ॥ २५ ॥