महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएवं कृतोदका भार्याः प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्वयम् ॥ २१ ॥ 'जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट-लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे-सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी' ॥ २०-२१ ॥
कृत्वा तु नैर्ऋतान् दर्भान् धीरो धौम्यः पुरोहितः । सामानि गायन् याम्यानि पुरतो याति भारत ॥ २२ ॥ भारत! धीरस्वभाववाले पुरोहित धौम्यजी कुशोंका अग्रभाग नैर्ऋत्यकोणकी ओर करके यमदेवतासम्बन्धी साम-मन्त्रोंका गान करते हुए पाण्डवोंके आगे-आगे जा रहे हैं ॥
हतेषु भारतेष्वाजौ कुरूणां गुरवस्तदा । एवं सामानि गास्यन्तीत्युक्त्वा धौम्योऽपि गच्छति ॥ २३ ॥ धौम्यजी यह कहकर गये थे कि युद्धमें कौरवोंके मारे जानेपर उनके गुरु भी इसी प्रकार कभी सामगान करेंगे ॥
हा हा गच्छन्ति नो नाथाः समवेक्षध्वमीदृशम् । अहो धिक् कुरुवृद्धानां बालानामिव चेष्टितम् ॥ २४ ॥ राष्ट्रेभ्यः पाण्डुदायादाँल्लोभान्निर्वासयन्ति ये । अनाथाः स्म वयं सर्वे वियुक्ताः पाण्डुनन्दनैः ॥ २५ ॥ दुर्विनीतेषु लुब्धेषु का प्रीतिः कौरवेषु नः । इति पौराः सुदुःखार्ताः क्रोशन्ति स्म पुनः पुनः ॥ २६ ॥ महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्लाकर कह रहे थे कि 'हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक्कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है? ॥ २४—२६ ॥
एवमाकारलिङ्गैस्ते व्यवसायं मनोगतम् । कथयन्तश्च कौन्तेया वनं जग्मुर्मनस्विनः ॥ २७ ॥ महाराज! इस प्रकार मनस्वी कुन्तीपुत्र अपनी आकृति एवं चिह्नोंके द्वारा अपने आन्तरिक निश्चयको प्रकट करते हुए वनको गये हैं ॥ २७ ॥
एवं तेषु नराग्र्येषु निर्यत्सु गजसाह्वयात् । अनभ्रे विद्युतश्चासन् भूमिश्च समकम्पत ॥ २८ ॥ राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशाम्पते । उल्का चाप्यपसव्येन पुरं कृत्वा व्यशीर्यत ॥ २९ ॥