महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्तिनापुरसे उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके निकलते ही बिना बादलके बिजली गिरने लगी, पृथ्वी काँप उठी। राजन्! बिना पर्व (अमावस्या)-के ही राहुने सूर्यको ग्रस लिया था और नगरको दायें रखकर उल्का गिरी थी ॥
प्रत्याहरन्ति क्रव्यादा गृध्रगोमायुवायसाः । देवायतनचैत्येषु प्राकाराट्टालकेषु च ॥ ३० ॥ गीध, गीदड़ और कौवे आदि मांसाहारी जन्तु नगरके मन्दिरों, देववृक्षों, चहारदीवारी तथा अट्टालिकाओंपर मांस और हड्डी आदि लाकर गिराने लगे थे ॥ ३० ॥
एवमेते महोत्पाताः प्रादुरासन् दुरासदाः । भरतानामभावाय राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ३१ ॥ राजन्! इस प्रकार आपकी दुर्मन्त्रणाके कारण ऐसे-ऐसे अपशकुनरूप दुर्दम्य एवं महान् उत्पात प्रकट हुए हैं, जो भरतवंशियोंके विनाशकी सूचना दे रहे हैं ॥ ३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं प्रवदतोरेव तयोस्तत्र विशाम्पते । धृतराष्ट्रस्य राज्ञश्च विदुरस्य च धीमतः ॥ ३२ ॥ नारदश्च सभामध्ये कुरूणामग्रतः स्थितः । महर्षिभिः परिवृतो रौद्रं वाक्यमुवाच ह ॥ ३३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान् विदुर जब दोनों वहाँ बातचीत कर रहे थे, उसी समय सभामें महर्षियोंसे घिरे हुए देवर्षि नारद कौरवोंके सामने आकर खड़े हो गये और यह भयंकर वचन बोले— ॥ ३२-३३ ॥
इतश्चतुर्दशे वर्षे विनङ्क्ष्यन्तीह कौरवाः । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च ॥ ३४ ॥ 'आजसे चौदहवें वर्षमें दुर्योधनके अपराधसे भीम और अर्जुनके पराक्रमद्वारा कौरवकुलका नाश हो जायगा' ॥
इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन्तरधीयत । ब्राह्मीं श्रियं सुविपुलां बिभ्रद् देवर्षिसत्तमः ॥ ३५ ॥ ऐसा कहकर विशाल ब्रह्मतेज धारण करनेवाले देवर्षि-प्रवर नारद आकाशमें जाकर सहसा अन्तर्धान हो गये ॥
(धृतराष्ट्र उवाच)
किमब्रुवन् नागरिकाः किं वै जानपदा जनाः । मह्यं तत्त्वेन चाचक्ष्व क्षत्तः सर्वमशेषतः ॥ **धृतराष्ट्रने पूछा—**विदुर! जब पाण्डव वनको जाने लगे, उस समय नगर और देशके लोग क्या कह रहे थे, ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे ठीक-ठीक बताओ।