महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाञ्चाली पाण्डवानेतान् दैवसृष्टोपसर्पति ॥ ३० ॥ तदनन्तर सब धर्मोंके ज्ञाता परम बुद्धिमान् विदुरने कहा—‘भरतवंशियो! यह कृष्णा जो तुम्हारी सभामें लायी गयी, यही तुम्हारे विनाशका कारण होगा। यह जो पांचालराजकी पुत्री है, वह परम उत्तम लक्ष्मी ही है। देवताओंकी आज्ञासे ही पांचाली इन पाण्डवोंकी सेवा करती है ॥ २९-३० ॥ तस्याः पार्थाः परिक्लेशं न क्षंस्यन्ते ह्यमर्षणाः । वृष्णयो वा महेष्वासाः पाञ्चाला वा महारथाः ॥ ३१ ॥ तेन सत्याभिसंधेन वासुदेवेन रक्षिताः । आगमिष्यति बीभत्सुः पाञ्चालैः परिवारितः ॥ ३२ ॥ ‘कुन्तीके पुत्र अमर्षमें भरे हुए हैं। द्रौपदीको जो यहाँ इस प्रकार क्लेश दिया गया है, इसे वे कदापि सहन नहीं करेंगे। सत्यप्रतिज्ञ भगवान् श्रीकृष्णसे सुरक्षित महान् धनुर्धर वृष्णिवंशी अथवा महारथी पांचाल वीर भी इसे नहीं सहेंगे। अर्जुन पांचाल वीरोंसे घिरे हुए अवश्य आयेंगे ॥ ३१-३२ ॥ तेषां मध्ये महेष्वासो भीमसेनो महाबलः । आगमिष्यति धुन्वानो गदां दण्डमिवान्तकः ॥ ३३ ॥ ‘उनके बीचमें महाधनुर्धर महाबली भीमसेन होंगे, जो दण्डपाणि यमराजकी भाँति गदा घुमाते हुए युद्धके लिये आयेंगे ॥ ३३ ॥ ततो गाण्डीवनिर्घोषं श्रुत्वा पार्थस्य धीमतः । गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ॥ ३४ ॥ ‘उस समय परम बुद्धिमान् अर्जुनके गाण्डीव धनुषकी टंकार सुनकर और भीमसेनकी गदाका महान् वेग देखकर कोई भी राजा उनका सामना करनेमें समर्थ न हो सकेंगे ॥ ३४ ॥ तत्र मे रोचते नित्यं पार्थैः साम न विग्रहः । कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवान् बलवत्तरान् ॥ ३५ ॥ ‘अतः मुझे तो पाण्डवोंके साथ सदा शान्ति बनाये रखनेकी ही नीति अच्छी लगती है। उनके साथ युद्ध करना मुझे पसंद नहीं है। मैं पाण्डवोंको सदा ही कौरवोंसे अधिक बलवान् मानता हूँ ॥ ३५ ॥ तथा हि बलवान् राजा जरासंधो महाद्युतिः । बाहुप्रहरणेनैव भीमेन निहतो युधि ॥ ३६ ॥ ‘क्योंकि महान् तेजस्वी और बलवान् राजा जरासंधको भीमसेनने बाहुरूपी शस्त्रसे ही युद्धमें मार गिराया था ॥ तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ । उभयोः पक्षयोर्युक्तं क्रियतामविशङ्कया ॥ ३७ ॥