महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः
सूर्यके तापसे मूर्च्छित हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति
सौतिरुवाच
ततः कामगमः पक्षी महावीर्यो महाबलः ।
मातुरन्तिकमागच्छत् परं पारं महोदधेः ॥ १ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**शौनकादि महर्षियो! तदनन्तर इच्छानुसार गमन करनेवाले महान् पराक्रमी तथा महाबली गरुड समुद्रके दूसरे पार अपनी माताके समीप आये ॥ १ ॥
यत्र सा विनता तस्मिन् पणितेन पराजिता ।
अतीव दुःखसंतप्ता दासीभावमुपागता ॥ २ ॥
जहाँ उनकी माता विनता बाजी हार जानेसे दासी-भावको प्राप्त हो अत्यन्त दुःखसे संतप्त रहती थीं ॥ २ ॥
ततः कदाचिद् विनतां प्रणतां पुत्रसंनिधौ ।
काले चाहूय वचनं कद्रूरिदमभाषत ॥ ३ ॥
एक दिन अपने पुत्रके समीप बैठी हुई विनय-शील विनताको किसी समय बुलाकर कद्रूने यह बात कही— ॥ ३ ॥
नागानामालयं भद्रे सुरम्यं चारुदर्शनम् ।
समुद्रकुक्षावेकान्ते तत्र मां विनते नय ॥ ४ ॥
‘कल्याणी विनते! समुद्रके भीतर निर्जन प्रदेशमें एक बहुत रमणीय तथा देखनेमें अत्यन्त मनोहर नागोंका निवासस्थान है। तू वहाँ मुझे ले चल’ ॥ ४ ॥
ततः सुपर्णमाता तामवहत् सर्पमातरम् ।
पन्नगान् गरुडश्चापि मातुर्वचनचोदितः ॥ ५ ॥
तब गरुडकी माता विनता सर्पोंकी माता कद्रूको अपनी पीठपर ढोने लगी। इधर माताकी आज्ञासे गरुड भी सर्पोंको अपनी पीठपर चढ़ाकर ले चले ॥ ५ ॥
स सूर्यमभितो याति वैनतेयो विहंगमः ।
सूर्यरश्मिप्रतप्ताश्च मूर्च्छिताः पन्नगाभवन् ॥ ६ ॥
पक्षिराज गरुड आकाशमें सूर्यके निकट होकर चलने लगे। अतः सर्प सूर्यकी किरणोंसे संतप्त हो मूर्च्छित हो गये ॥ ६ ॥
तदवस्थान् सुतान् दृष्ट्वा कद्रूः शक्रमथास्तुवत् ।
नमस्ते सर्वदेवेश नमस्ते बलसूदन ॥ ७ ॥