महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुत्रत्वं बालतां चैव तवावेक्ष्य च साहसम् ॥ ६ ॥ (किंतु यह क्रोध धर्मका नाशक होता है) इसलिये धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुम्हारे बचपन और दुःसाहसपूर्ण कार्यको देखकर मैं तुम्हें कुछ कालतक उपदेश देनेकी आवश्यकता समझता हूँ ॥ ६ ॥
स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् । चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ॥ ७ ॥ तुम मन और इन्द्रियोंके निग्रहमें तत्पर होकर जंगली कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए इस क्रोधको मिटाकर उत्तम आचरण करो; ऐसा करनेसे तुम्हारे धर्मकी हानि नहीं होगी ॥ ७ ॥
क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसंचितम् । ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥ ८ ॥ क्रोध प्रयत्नशील साधकोंके अत्यन्त दुःखसे उपार्जित धर्मका नाश कर देता है। फिर धर्महीन मनुष्योंको अभीष्ट गति नहीं मिलती है ॥ ८ ॥
शम एव यतीनां हि क्षमिणां सिद्धिकारकः । क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ॥ ९ ॥ शम (मनोनिग्रह) ही क्षमाशील साधकोंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाला है। जिनमें क्षमा है, उन्हींके लिये यह लोक और परलोक दोनों कल्याणकारक हैं ॥ ९ ॥
तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः । क्षमया प्राप्स्यसे लोकान् ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥ १० ॥ इसलिये तुम सदा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए क्षमाशील बनो। क्षमासे ही ब्रह्माजीके निकटवर्ती लोकोंमें जा सकोगे ॥ १० ॥
मया तु शममास्थाय यच्छक्यं कर्तुमद्य वै । तत् करिष्याम्यहं तात प्रेषयिष्ये नृपाय वै ॥ ११ ॥ मम पुत्रेण शप्तोऽसि बालेन कृशबुद्धिना । ममेमां धर्षणां त्वत्तः प्रेक्ष्य राजन्नमर्षिणा ॥ १२ ॥ तात! मैं तो शान्ति धारण करके अब जो कुछ किया जा सकता है, वह करूँगा। राजाके पास यह संदेश भेज दूँगा कि ‘राजन्! तुम्हारे द्वारा मुझे जो तिरस्कार प्राप्त हुआ है उसे देखकर अमर्षमें भरे हुए मेरे अल्पबुद्धि एवं मूढ़ पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है’ ॥ ११-१२ ॥
सौतिरुवाच
एवमादिश्य शिष्यं स प्रेषयामास सुव्रतः । परिक्षिते नृपतये दयापन्नो महातपाः ॥ १३ ॥