महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्र रक्षां कुरुष्वेति पुनः पुनरथाब्रवीत् । तदन्यथा न शक्यं च कर्तुं केनचिदप्युत ॥ २१ ॥ इस दशामें आप अपनी रक्षाकी व्यवस्था करें। यह मुनिने बार-बार कहा है। उस शापको कोई भी टाल नहीं सकता ॥ २१ ॥ न हि शक्नोति तं यन्तुं पुत्रं कोपसमन्वितम् । ततोऽहं प्रेषितस्तेन तव राजन् हितार्थिना ॥ २२ ॥ स्वयं महर्षि भी क्रोधमें भरे हुए अपने पुत्रको शान्त नहीं कर पा रहे हैं। अतः राजन्! आपके हितकी इच्छासे उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है ॥ २२ ॥
सौतिरुवाच
इति श्रुत्वा वचो घोरं स राजा कुरुनन्दनः । पर्यतप्यत तत् पापं कृत्वा राजा महातपाः ॥ २३ ॥ **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**यह घोर वचन सुनकर कुरुनन्दन राजा परीक्षित् मुनिका अपराध करनेके कारण मन-ही-मन संतप्त हो उठे ॥ २३ ॥ तं च मौनव्रतं श्रुत्वा वने मुनिवरं तदा । भूय एवाभवद् राजा शोकसंतप्तमानसः ॥ २४ ॥ वे श्रेष्ठ महर्षि उस समय वनमें मौन-व्रतका पालन कर रहे थे, यह सुनकर राजा परीक्षित्का मन और भी शोक एवं संतापमें डूब गया ॥ २४ ॥ अनुक्रोशात्मतां तस्य शमीकस्यावधार्य च । पर्यतप्यत भूयोऽपि कृत्वा तत् किल्बिषं मुनेः ॥ २५ ॥ शमीक मुनिकी दयालुता और अपने द्वारा उनके प्रति किये हुए उस अपराधका विचार करके वे अधिकाधिक संतप्त होने लगे ॥ २५ ॥ न हि मृत्युं तथा राजा श्रुत्वा वै सोऽन्वतप्यत । अशोचदमरप्रख्यो यथा कृत्वेह कर्म तत् ॥ २६ ॥ देवतुल्य राजा परीक्षित्को अपनी मृत्युका शाप सुनकर वैसा संताप नहीं हुआ जैसा कि मुनिके प्रति किये हुए अपने उस बर्तावको याद करके वे शोकमग्न हो रहे थे ॥ २६ ॥ ततस्तं प्रेषयामास राजा गौरमुखं तदा । भूयः प्रसादं भगवान् करोत्विह ममेति वै ॥ २७ ॥ तदनन्तर राजाने यह संदेश देकर उस समय गौरमुखको विदा किया कि 'भगवान् शमीक मुनि यहाँ पधारकर पुनः मुझपर कृपा करें' ॥ २७ ॥ तस्मिंश्च गतमात्रेऽथ राजा गौरमुखे तदा । मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास सह संविग्नमानसः ॥ २८ ॥