महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 377, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना
शौनक उवाच
सर्पसत्रे तदा राज्ञः पाण्डवेयस्य धीमतः ।
जनमेजयस्य के त्वासन्नृत्विजः परमर्षयः ॥ १ ॥
शौनकजीने पूछा— सूतनन्दन! पाण्डववंशी बुद्धिमान् राजा जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें कौन-कौनसे महर्षि ऋत्विज् बने थे? ॥ १ ॥
के सदस्या बभूवुश्च सर्पसत्रे सुदारुणे ।
विषादजननेऽत्यर्थं पन्नगानां महाभये ॥ २ ॥
उस अत्यन्त भयंकर सर्पसत्रमें, जो सर्पोंके लिये महान् भयदायक और विषादजनक था, कौन-कौनसे मुनि सदस्य हुए थे? ॥ २ ॥
सर्वं विस्तरशस्तात भवाञ्छंसितुमर्हति ।
सर्पसत्रविधानज्ञविज्ञेयाः के च सूतज ॥ ३ ॥
तात! ये सब बातें आप विस्तारपूर्वक बताइये। सूतपुत्र! यह भी सूचित कीजिये कि सर्पसत्रकी विधिको जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ समझे जानेयोग्य कौन-कौनसे महर्षि वहाँ उपस्थित थे ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि नामानीह मनीषिणाम् ।
ये ऋत्विजः सदस्याश्च तस्यासन् नृपतेस्तदा ॥ ४ ॥
तत्र होता बभूवाथ ब्राह्मणश्चण्डभार्गवः ।
च्यवनस्यान्वये ख्यातो जातो वेदविदां वरः ॥ ५ ॥
उद्गाता ब्राह्मणो वृद्धो विद्वान् कौत्सोऽथ जैमिनिः ।
ब्रह्माभवच्छाङ्गँरवोऽथाध्वर्युश्चापि पिङ्गलः ॥ ६ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा— शौनकजी! मैं आपको उन मनीषी महात्माओंके नाम बता रहा हूँ, जो उस समय राजा जनमेजयके ऋत्विज् और सदस्य थे। उस यज्ञमें वेद-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण चण्डभार्गव होता थे। उनका जन्म च्यवन मुनिके वंशमें हुआ था। वे उस समयके विख्यात कर्मकाण्डी थे। वृद्ध एवं विद्वान् ब्राह्मण कौत्स उद्गाता, जैमिनि ब्रह्मा तथा शार्ङ्गरव और पिंगल अध्वर्यु थे ॥ ४—६ ॥