महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना
सौतिरुवाच
तत आहूय पुत्रं स्वं जरत्कारुर्भुजङ्गमा ।
वासुकेर्नागराजस्य वचनादिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— तब नागकन्या जरत्कारु नागराज वासुकिके कथनानुसार अपने पुत्रको बुलाकर इस प्रकार बोली— ॥ १ ॥
अहं तव पितुः पुत्र भ्रात्रा दत्ता निमित्ततः ।
कालः स चायं सम्प्राप्तस्तत् कुरुष्व यथातथम् ॥ २ ॥
‘बेटा! मेरे भैयाने एक निमित्तको लेकर तुम्हारे पिताके साथ मेरा विवाह किया था। उसकी पूर्तिका यही उपयुक्त अवसर प्राप्त हुआ है। अतः तुम यथावत्रूपसे उस उद्देश्यकी पूर्ति करो’ ॥ २ ॥
आस्तीक उवाच
किं निमित्तं मम पितुर्दत्ता त्वं मातुलेन मे ।
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन श्रुत्वा कर्तास्मि तत् तथा ॥ ३ ॥
आस्तीकने पूछा— माँ! मामाजीने किस निमित्तको लेकर पिताजीके साथ तुम्हारा विवाह किया था? वह मुझे ठीक-ठीक बताओ। उसे सुनकर मैं उसकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करूँगा ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
तत आचष्ट सा तस्मै बान्धवानां हितैषिणी ।
भगिनी नागराजस्य जरत्कारुरविक्कवा ॥ ४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— तदनन्तर अपने भाई-बन्धुओंका हित चाहनेवाली नागराजकी बहिन जरत्कारु शान्तचित्त हो आस्तीकसे बोली ॥ ४ ॥
जरत्कारुरुवाच
पन्नगानामशेषाणां माता कद्रूरिति श्रुता ।
तया शप्ता रुषितया सुता यस्मान्निबोध तत् ॥ ५ ॥
जरत्कारुने कहा— वत्स! सम्पूर्ण नागोंकी माता कद्रू नामसे विख्यात हैं। उन्होंने किसी समय रुष्ट होकर अपने पुत्रोंको शाप दे दिया था। जिस कारणसे वह शाप दिया, वह