भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 382

बताती हूँ, सुनो ।। ५ ।।

उच्चैःश्रवाः सोऽश्वराजो यन्मिथ्या न कृतो मम । विनतार्थाय पणिते दासीभावाय पुत्रकाः ।। ६ ।। जनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथिः । तत्र पञ्चत्वमापन्नाः प्रेतलोकं गमिष्यथ ।। ७ ।।

(अश्वोंका राजा जो उच्चैःश्रवा है, उसके रंगको लेकर विनताके साथ कद्रूने बाजी लगायी थी। उसमें यह शर्त थी—'जो हारे वह जीतनेवालीकी दासी बने।' कद्रू उच्चैःश्रवाकी पूँछ काली बता चुकी थी। अतः उसने अपने पुत्रोंसे कहा—'तुमलोग छलपूर्वक उस घोड़ेकी पूँछ काले रंगकी कर दो।' सर्प इससे सहमत न हुए। तब उन्होंने सर्पोंको शाप देते हुए कहा—) 'पुत्रो! तुमलोगोंने मेरे कहनेसे अश्वराज उच्चैःश्रवाकी पूँछका रंग न बदलकर विनताके साथ जो मेरी दासी होनेकी शर्त थी, उसमें—उस घोड़ेके सम्बन्धमें विनताके कथनको मिथ्या नहीं कर दिखाया, इसलिये जनमेजयके यज्ञमें तुमलोगोंको आग जलाकर भस्म कर देगी और तुम सभी मरकर प्रेतलोकको चले जाओगे' ।। ६-७ ।।

तां च शप्तवतीं देवः साक्षाल्लोकपितामहः । एवमस्त्विति तद्वाक्यं प्रोवाचानुमुमोद च ।। ८ ।।

कद्रूने जब इस प्रकार शाप दे दिया, तब साक्षात् लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने 'एवमस्तु' कहकर उनके वचनका अनुमोदन किया ।। ८ ।।

वासुकिश्चापि तच्छ्रुत्वा पितामहवचस्तदा । अमृते मथिते तात देवाञ्छरणमीयिवान् ।। ९ ।।

तात! मेरे भाई वासुकिने भी उस समय पितामहकी बात सुनी थी। फिर अमृत-मन्थनका कार्य हो जानेपर वे देवताओंकी शरणमें गये ।। ९ ।।

सिद्धार्थाश्च सुराः सर्वे प्राप्यामृतमनुत्तमम् । भ्रातरं मे पुरस्कृत्य पितामहमुपागमन् ।। १० ।। ते तं प्रसादयामासुः सुराः सर्वेऽब्जसम्भवम् । राज्ञा वासुकिना सार्धं शापोऽसौ न भवेदिति ।। ११ ।।

देवतालोग मेरे भाईकी सहायतासे उत्तम अमृत पाकर अपना मनोरथ सिद्ध कर चुके थे। अतः वे मेरे भाईको आगे करके पितामह ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ समस्त देवताओंने नागराज वासुकिके साथ रहकर पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न किया। उन्हें प्रसन्न करनेका उद्देश्य यह था कि माताका वह शाप लागू न हो ।। १०-११ ।।

देवा ऊचुः

वासुकिर्नागराजोऽयं दुःखितो ज्ञातिकारणात् । अभिशापः स मातुस्तु भगवन् न भवेत् कथम् ।। १२ ।।