महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 383, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवता बोले— भगवन्! ये नागराज वासुकि अपने जाति-भाइयोंके लिये बहुत दुःखी हैं। कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे माताका शाप इन लोगोंपर लागू न हो ॥ १२ ॥
ब्रह्मोवाच
जरत्कारुर्जरत्कारुं यां भार्यां समवाप्स्यति । तत्र जातो द्विजः शापान्मोक्षयिष्यति पन्नगान् ॥ १३ ॥ ब्रह्माजीने कहा— जरत्कारु मुनि जरत्कारु नामवाली जिस पत्नीको ग्रहण करेंगे, उसके गर्भसे उत्पन्न ब्राह्मण सर्पोंको माताके शापसे मुक्त करेगा ॥ १३ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वासुकिः पन्नगोत्तमः । प्रादान्माममरप्रख्य तव पित्रे महात्मने ॥ १४ ॥ प्रागेवानागते काले तस्मात् त्वं मय्यजायथाः । अयं स कालः सम्प्राप्तो भयान्रस्त्रातुमर्हसि ॥ १५ ॥ भ्रातरं चापि मे तस्मात् त्रातुमर्हसि पावकात् । न मोघं तु कृतं तत् स्याद् यदहं तव धीमते । पित्रे दत्ता विमोक्षार्थं कथं वा पुत्र मन्यसे ॥ १६ ॥ देवताके समान तेजस्वी पुत्र! ब्रह्माजीकी वह बात सुनकर नागश्रेष्ठ वासुकिने मुझे तुम्हारे महात्मा पिताकी सेवामें समर्पित कर दिया। यह अवसर आनेसे बहुत पहले इसी निमित्तसे मेरा विवाह किया गया। तदनन्तर उन महर्षिद्वारा मेरे गर्भसे तुम्हारा जन्म हुआ। जनमेजयके सर्पयज्ञका वह पूर्वनिर्दिष्ट काल आज उपस्थित है (उस यज्ञमें निरन्तर सर्प जल रहे हैं), अतः उस भयसे तुम उन सबका उद्धार करो। मेरे भाईको भी उस भयंकर अग्निसे बचा लो। जिस उद्देश्यको लेकर तुम्हारे बुद्धिमान् पिताकी सेवामें मैं दी गयी, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये। अथवा बेटा! सर्पोंको इस संकटसे बचानेके लिये तुम क्या उचित समझते हो? ॥ १४—१६ ॥
सौतिरुवाच
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सास्तीको मातरं तदा । अब्रवीद् दुःखसंतप्तं वासुकिं जीवयन्निव ॥ १७ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं— माताके ऐसा कहनेपर आस्तीकने उससे कहा—'माँ! तुम्हारी जैसी आज्ञा है वैसा ही करूँगा।' इसके बाद वे दुःखपीड़ित वासुकिको जीवनदान देते हुए-से बोले— ॥ १७ ॥
अहं त्वां मोक्षयिष्यामि वासुके पन्नगोत्तम । तस्माच्छापान्महासत्त्व सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १८ ॥ 'महान् शक्तिशाली नागराज वासुके! मैं आपको माताके उस शापसे छुड़ा दूँगा। यह आपसे सत्य कहता हूँ ॥ १८ ॥