महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन
वैशम्पायन उवाच
प्रजापतेस्तु दक्षस्य मनोर्वैवस्वतस्य च ।
भरतस्य कुरोः पूरोरजमीढस्य चानघ ॥ १ ॥
यादवानामिमं वंशं कौरवाणां च सर्वशः ।
तथैव भरतानां च पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् ॥ २ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—निष्पाप जनमेजय! अब मैं दक्ष प्रजापति, वैवस्वत मनु, भरत, कुरु, पूरु, अजमीढ, यादव, कौरव तथा भरतवंशियोंकी कुल-परम्पराका तुमसे वर्णन करूँगा। उनका कुल परम पवित्र, महान् मंगलकारी तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है ।। १-२ १/२ ।।
तेजोभिरुदिताः सर्वे महर्षिसमतेजसः ॥ ३ ॥
दश प्राचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः ।
मुखजेनाग्निना यैस्ते पूर्वं दग्धा महीरुहाः ॥ ४ ॥
प्रचेताके दस पुत्र थे, जो अपने तेजके द्वारा सदा प्रकाशित होते थे। वे सब-के-सब महर्षियोंके समान तेजस्वी, सत्पुरुष और पुण्यकर्मा माने गये हैं। उन्होंने पूर्वकालमें अपने मुखसे प्रकट की हुई अग्निद्वारा उन बड़े-बड़े वृक्षोंको जलाकर भस्म कर दिया था (जो प्राणियोंको पीड़ा दे रहे थे) ।। ३-४ ।।
तेभ्यः प्राचेतसो जज्ञे दक्षो दक्षादिमाः प्रजाः ।
सम्भुताः पुरुषव्याघ्र स हि लोकपितामहः ॥ ५ ॥
उक्त दस प्रचेताओंद्वारा (मारिषाके गर्भसे) प्राचेतस दक्षका जन्म हुआ तथा दक्षसे ये समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। नरश्रेष्ठ! वे सम्पूर्ण जगत्के पितामह हैं ।। ५ ।।
वीरिण्या सह संगम्य दक्षः प्राचेतसो मुनिः ।
आत्मतुल्यानजनयत् सहस्रं संशितव्रतान् ॥ ६ ॥
प्राचेतस मुनि दक्षने वीरिणीसे समागम करके अपने ही समान गुण-शीलवाले एक हजार पुत्र उत्पन्न किये। वे सब-के-सब अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे ।। ६ ।।
सहस्रसंख्यान् सम्भूतान् दक्षपुत्रांश्च नारदः ।
मोक्षमध्यापयामास सांख्यज्ञानमनुत्तमम् ॥ ७ ॥