महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक सहस्रकी संख्यामें प्रकट हुए उन दक्ष-पुत्रोंको देवर्षि नारदजीने मोक्ष-शास्त्रका अध्ययन कराया। परम उत्तम सांख्य-ज्ञानका उपदेश किया ॥ ७ ॥
ततः पञ्चाशतं कन्याः पुत्रिका अभिसंदधे ।
प्रजापतिः प्रजा दक्षः सिसृक्षुर्जनमेजय ॥ ८ ॥
जनमेजय! जब वे सभी विरक्त होकर घरसे निकल गये, तब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छासे प्रजापति दक्षने पुत्रिकाके द्वारा पुत्र (दौहित्र) होनेपर उस पुत्रिकाको ही पुत्र मानकर पचास कन्याएँ उत्पन्न कीं ॥ ८ ॥
ददौ दश स धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
कालस्य नयने युक्ताः सप्तविंशतिमिन्दवे ॥ ९ ॥
उन्होंने दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कश्यपको और कालका संचालन करनेमें नियुक्त नक्षत्रस्वरूपा सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको ब्याह दीं ॥ ९ ॥
त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा ।
मारीचः कश्यपस्त्वस्यामादित्यान् समजीजनत् ॥ १० ॥
इन्द्रादीन् वीर्यसम्पन्नान् विवस्वन्तमथापि च ।
विवस्वतः सुतो जज्ञे यमो वैवस्वतः प्रभुः ॥ ११ ॥
मरीचिनन्दन कश्यपने अपनी तेरह पत्नियोंमेंसे जो सबसे बड़ी दक्ष-कन्या अदिति थीं, उनके गर्भसे इन्द्र आदि बारह आदित्योंको जन्म दिया, जो बड़े पराक्रमी थे। तदनन्तर उन्होंने अदितिसे ही विवस्वान्को उत्पन्न किया। विवस्वान्के पुत्र यम हुए, जो वैवस्वत कहलाते हैं। वे समस्त प्राणियोंके नियन्ता हैं ॥ १०-११ ॥
मार्तण्डस्य मनुर्धीमानजायत सुतः प्रभुः ।
यमश्चापि सुतो जज्ञे ख्यातस्तस्यानुजः प्रभुः ॥ १२ ॥
विवस्वान्के ही पुत्र परम बुद्धिमान् मनु हुए, जो बड़े प्रभावशाली हैं। मनुके बाद उनसे यम नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई, जो सर्वत्र विख्यात हैं। यमराज मनुके छोटे भाई तथा प्राणियोंका नियमन करनेमें समर्थ हैं ॥ १२ ॥
धर्मात्मा स मनुर्धीमान् यत्र वंशः प्रतिष्ठितः ।
मनोर्वंशो मानवानां ततोऽयं प्रथितोऽभवत् ॥ १३ ॥
बुद्धिमान् मनु बड़े धर्मात्मा थे, जिनपर सूर्यवंशकी प्रतिष्ठा हुई। मानवोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह मनुवंश उन्हींसे विख्यात हुआ ॥ १३ ॥
ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः ।
ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम् ॥ १४ ॥
उन्हीं मनुसे ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानव उत्पन्न हुए हैं। महाराज! तभीसे ब्राह्मणकुल क्षत्रियसे सम्बद्ध हुआ ॥ १४ ॥
ब्राह्मणा मानवास्तेषां साङ्गं वेदमधारयन् ।