भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 567

वेनं धृष्णुं नरिष्यन्तं नाभागेक्ष्वाकुमेव च ॥ १५ ॥
कारूषमथ शर्यातिं तथा चैवाष्टमीमिलाम् ।
पृषध्रं नवमं प्राहुः क्षत्रधर्मपरायणम् ॥ १६ ॥
नाभागारिष्टदशमान् मनोः पुत्रान् प्रचक्षते ।
पञ्चाशत् तु मनोः पुत्रास्तथैवान्येऽभवन् क्षितौ ॥ १७ ॥
उनमेंसे ब्राह्मणजातीय मानवोंने छहों अंगोंसहित वेदोंको धारण किया। वेन, धृष्णु, नरिष्यन्त, नाभाग, इक्ष्वाकु, कारूष, शर्याति, आठवीं इला, नवें क्षत्रिय-धर्मपरायण पृषध्र तथा दसवें नाभागारिष्ट—इन दसोंको मनुपुत्र कहा जाता है। मनुके इस पृथ्वीपर पचास पुत्र और हुए ॥ १५-१७ ॥

अन्योन्यभेदात् ते सर्वे विनेशुरिति नः श्रुतम् ।
पुरूरवास्ततो विद्वानिलायां समपद्यत ॥ १८ ॥
परंतु आपसकी फूटके कारण वे सब-के-सब नष्ट हो गये, ऐसा हमने सुना है। तदनन्तर इलाके गर्भसे विद्वान् पुरूरवाका जन्म हुआ ॥ १८ ॥

सा वै तस्याभवन्माता पिता चैवेति नः श्रुतम् ।
त्रयोदश समुद्रस्य द्वीपान्यश्नन् पुरूरवाः ॥ १९ ॥
सुना जाता है, इला पुरूरवाकी माता भी थी और पिता भी*। राजा पुरूरवा समुद्रके तेरह द्वीपोंका शासन और उपभोग करते थे ॥ १९ ॥

अमानुषैर्वृतः सत्त्वैर्मानुषः सन् महायशाः ।
विप्रैः स विग्रहं चक्रे वीर्योन्मत्तः पुरूरवाः ॥ २० ॥
जहार च स विप्राणां रत्नान्युत्क्रोशतामपि ।
महायशस्वी पुरूरवा मनुष्य होकर भी मानवेतर प्राणियोंसे घिरे रहते थे। वे अपने बल-पराक्रमसे उन्मत्त हो ब्राह्मणोंके साथ विवाद करने लगे। बेचारे ब्राह्मण चीखते-चिल्लाते रहते थे तो भी वे उनका सारा धन-रत्न छीन लेते थे ॥ २० १/२ ॥

सनत्कुमारस्तं राजन् ब्रह्मलोकादुपत्य ह ॥ २१ ॥
अनुदर्शं ततश्चक्रे प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ ।
ततो महर्षिभिः क्रुद्धैः सद्यः शप्तो व्यनश्यत ॥ २२ ॥
जनमेजय! ब्रह्मलोकसे सनत्कुमारजीने आकर उन्हें बहुत समझाया और ब्राह्मणोंपर अत्याचार न करनेका उपदेश दिया, किंतु वे उनकी शिक्षा ग्रहण न कर सके। तब क्रोधमें भरे हुए महर्षियोंने तत्काल उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे नष्ट हो गये ॥ २१-२२ ॥

लोभान्वितो बलमदान्नष्टसंज्ञो नराधिपः ।
स हि गन्धर्वलोकस्थानुर्वश्या सहितो विराट् ॥ २३ ॥
आनिनाय क्रियार्थेऽग्नीन् यथावत् विहितांस्त्रिधा ।