महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 810, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंजलमें छोड़े हुए उस नवजात शिशुको महायशस्वी सूतपुत्र अधिरथने, जिसकी पत्नीका नाम राधा था, ले लिया। उसने और उसकी पत्नीने उस बालकको अपना पुत्र बना लिया॥ २३॥ नामधेयं च चक्राते तस्य बालस्य तायुभौ । वसुना सह जातोऽयं वसुषेणो भवत्विति ॥ २४ ॥ उन दम्पतिने उस बालकका नामकरण इस प्रकार किया; यह वसु (कवच-कुण्डलादि धन)-के साथ उत्पन्न हुआ है, इसलिये वसुषेण नामसे प्रसिद्ध हो ॥ २४ ॥ स वर्धमानो बलवान् सर्वास्त्रेषूद्यतोऽभवत् । आ पृष्ठतापादादित्यमुपातिष्ठत वीर्यवान् ॥ २५ ॥ वह बलवान् बालक बड़े होनेके साथ ही सब प्रकारकी अस्त्रविद्यामें निपुण हुआ। पराक्रमी कर्ण प्रातःकालसे लेकर जबतक सूर्य पृष्ठभागकी ओर न चले जाते, सूर्योपस्थान करता रहता था ॥ २५ ॥ तस्मिन् काले तु जपतस्तस्य वीरस्य धीमतः । नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत् किंचिद् वसु महीतले ॥ २६ ॥ उस समय मन्त्र-जपमें लगे हुए बुद्धिमान-वीर कर्णके लिये इस पृथ्वीपर कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जिसे वह ब्राह्मणोंके माँगनेपर न दे सके ॥ २६ ॥ (ततः काले तु कस्मिंश्चित् स्वप्नान्ते कर्णमब्रवीत् । आदित्यो ब्राह्मणो भूत्वा शृणु वीर वचो मम ।। प्रभातायां रजन्यां त्वामागमिष्यति वासवः । न तस्य भिक्षा दातव्या विप्ररूपी भविष्यति ।। निश्चयोऽस्यापहर्तुं ते कवचं कुण्डले तथा । अतस्त्वां बोधयाम्येष स्मर्तासि वचनं मम ।। किसी समयकी बात है, सूर्यदेवने ब्राह्मणका रूप धारण करके कर्णको स्वप्नमें दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—'वीर! मेरी बात सुनो—आजकी रात बीत जानेपर सबेरा होते ही इन्द्र तुम्हारे पास आयेंगे। उस समय वे ब्राह्मण-वेषमें होंगे। यहाँ आकर इन्द्र यदि तुमसे भिक्षा माँगें तो उन्हें देना मत। उन्होंने तुम्हारे कवच और कुण्डलोंका अपहरण करनेका निश्चय किया है। अतः मैं तुम्हें सचेत किये देता हूँ। तुम मेरी बात याद रखना।'
कर्ण उवाच
शक्रो मां विप्ररूपेण यदि वै याचते द्विज । कथं चास्मै न दास्यामि यथा चास्म्यवबोधितः ।। विप्राः पूज्यास्तु देवानां सततं प्रियमिच्छताम् । तं देवदेवं जानन् वै न शक्नोम्यवमन्त्रणे ।।