भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 858

त्रयाणामितरेषां तु नाश आत्मनि नश्यति ।
पित्र्यादृणादनिर्मुक्त इदानीमस्मि तापसाः ॥ २१ ॥
पुत्रोत्पादन और श्राद्धकर्मोंद्वारा पितरोंको तथा दयापूर्ण बर्तावद्वारा वह मनुष्योंको संतुष्ट करता है। मैं धर्मकी दृष्टिसे ऋषि, देव तथा मनुष्य—इन तीनों ऋणोंसे मुक्त हो चुका हूँ। अन्य अर्थात् पितरोंके ऋणका नाश तो इस शरीरके नाश होनेपर भी शायद ही हो सके। तपस्वी मुनियो! मैं अबतक पितृ-ऋणसे मुक्त न हो सका ।। २०-२१ ।।
इह तस्मात् प्रजाहेतोः प्रजायन्ते नरोत्तमाः ।
यथैवाहं पितुः क्षेत्रे जातस्तेन महर्षिणा ॥ २२ ॥
तथैवास्मिन् मम क्षेत्रे कथं वै सम्भवेत् प्रजा ।
इस लोकमें श्रेष्ठ पुरुष पितृ-ऋणसे मुक्त होनेके लिये संतानोत्पत्तिका प्रयत्न करते और स्वयं ही पुत्ररूपमें जन्म लेते हैं। जैसे मैं अपने पिताके क्षेत्रमें महर्षि व्यासद्वारा उत्पन्न हुआ हूँ, उसी प्रकार मेरे इस क्षेत्रमें भी कैसे संतानकी उत्पत्ति हो सकती है? ।। २२ १/२ ।।

ऋषय ऊचुः
अस्ति वै तव धर्मात्मन् विद्मो देवोपमं शुभम् ॥ २३ ॥
अपत्यमनघं राजन् वयं दिव्येन चक्षुषा ।
दैवोद्दिष्टं नरव्याघ्र कर्मणेहोपपादय ॥ २४ ॥
**ऋषि बोले—**धर्मात्मा नरेश! तुम्हें पापरहित देवोपम शुभ संतान होनेका योग है, यह हम दिव्यदृष्टिसे जानते हैं। नरव्याघ्र! भाग्यने जिसे दे रखा है, उस फलको प्रयत्नद्वारा प्राप्त कीजिये ।। २३-२४ ।।
अक्लिष्टं फलमव्यग्रो विन्दते बुद्धिमान् नरः ।
तस्मिन् दृष्टे फले राजन् प्रयत्नं कर्तुमर्हसि ॥ २५ ॥
अपत्यं गुणसम्पन्नं लब्धा प्रीतिकरं ह्यसि ।
बुद्धिमान् मनुष्य व्यग्रता छोड़कर बिना क्लेशके ही अभीष्ट फलको प्राप्त कर लेता है। राजन्! आपको उस दृष्ट फलके लिये प्रयत्न करना चाहिये। आप निश्चय ही गुणवान् और हर्षोत्पादक संतान प्राप्त करेंगे ।। २५ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच
नच्छ्रुत्वा तापसवचः पाण्डुश्चिन्तापरोऽभवत् ॥ २६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तपस्वी मुनियोंका यह वचन सुनकर राजा पाण्डु बड़े सोच-विचारमें पड़ गये ।। २६ ।।
आत्मनो मृगशापेन जानन्नुपहतां क्रियाम् ।
सोऽब्रवीद् विजने कुन्तीं धर्मपत्नीं यशस्विनीम् ।
अपत्योत्पादने यत्नमापदि त्वं समर्थय ॥ २७ ॥

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