भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 857

‘कहीं-कहीं बहुत बड़ी गुफाएँ हैं, जिनमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है। कइयोंके तो निकट भी पहुँचना कठिन है। ऐसे स्थलोंको पक्षी भी नहीं पार कर सकता, फिर मृग आदि अन्य जीवोंकी तो बात ही क्या है? ।। १३ ।। वायुरेको हि यात्यत्र सिद्धाश्च परमर्षयः । गच्छन्त्यौ शैलराजेऽस्मिन् राजपुत्र्यौ कथं त्विमे ।। १४ ।। न सीदेतामदुःखार्हे मा गमो भरतर्षभ । ‘इस मार्गपर केवल वायु चल सकती है तथा सिद्ध महर्षि भी जा सकते हैं। इस पर्वतराजपर चलती हुई ये दोनों राजकुमारियाँ कैसे कष्ट न पायेंगी? भरतवंशशिरोमणे! ये दोनों रानियाँ दुःख सहन करनेके योग्य नहीं हैं; अतः आप न चलिये’ ।। १४ १/२ ।।

पाण्डुरुवाच

अप्रजस्य महाभागा न द्वारं परिचक्षते ।। १५ ।। स्वर्गे तेनाभितप्तोऽहमप्रजस्तु ब्रवीमि वः । पित्र्यादृणादनिर्मुक्तस्तेन तप्ये तपोधनाः ।। १६ ।। **पाण्डुने कहा—**महाभाग महर्षिगण! संतानहीनके लिये स्वर्गका दरवाजा बंद रहता है, ऐसा लोग कहते हैं। मैं भी संतानहीन हूँ, इसलिये दुःखसे संतप्त होकर आपलोगोंसे कुछ निवेदन करता हूँ। तपोधनो! मैं पितरोंके ऋणसे अबतक छूट नहीं सका हूँ, इसलिये चिन्तासे संतप्त हो रहा हूँ ।। १५-१६ ।। देहनाशे ध्रुवो नाशः पितॄणामेष निश्चयः । ऋणैश्चतुर्भिः संयुक्ता जायन्ते मानवा भुवि ।। १७ ।। निःसंतान-अवस्थामें मेरे इस शरीरका नाश होने-पर मेरे पितरोंका पतन अवश्य हो जायगा। मनुष्य इस पृथ्वीपर चार प्रकारके ऋणोंसे युक्त होकर जन्म लेते हैं ।। १७ ।। पितृदेवर्षिमनुजैर्देयं तेभ्यश्च धर्मतः । एतानि तु यथाकालं यो न बुध्यति मानवः ।। १८ ।। न तस्य लोकाः सन्तीति धर्मविद्भिः प्रतिष्ठितम् । यज्ञैस्तु देवान् प्रीणाति स्वाध्यायतपसा मुनीन् ।। १९ ।। (उन ऋणोंके नाम ये हैं—) पितृ-ऋण, देव-ऋण, ऋषि-ऋण और मनुष्य-ऋण। उन सबका ऋण धर्मतः हमें चुकाना चाहिये। जो मनुष्य यथासमय इन ऋणोंका ध्यान नहीं रखता, उसके लिये पुण्यलोक सुलभ नहीं होते। यह मर्यादा धर्मज्ञ पुरुषोंने स्थापित की है। यज्ञोंद्वारा मनुष्य देवताओंको तृप्त करता है, स्वाध्याय और तपस्याद्वारा मुनियोंको संतोष दिलाता है ।। १८-१९ ।। पुत्रैः श्राद्धैः पितॄंश्चापि आनृशंस्येन मानवान् । ऋषिदेवमनुष्याणां परिमुक्तोऽस्मि धर्मतः ।। २० ।।