महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऋषय ऊचुः
समवायो महानद्य ब्रह्मलोके महात्मनाम् । देवानां च ऋषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् । वयं तत्र गमिष्यामो द्रष्टुकामाः स्वयम्भुवम् ॥ ७ ॥ ऋषि बोले— राजन्! आज ब्रह्मलोकमें महात्मा देवताओं, ऋषि-मुनियों तथा महामना पितरोंका बहुत बड़ा समूह एकत्र होनेवाला है। अतः हम वहीं स्वयम्भू ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये जायँगे ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
पाण्डुरुत्थाय सहसा गन्तुकामो महर्षिभिः । स्वर्गपारं तितीर्षुः स शतशृङ्गादुदङ्मुखः ॥ ८ ॥ प्रतस्थे सह पत्नीभ्यामब्रुवंस्तं च तापसाः । उपर्युपरि गच्छन्तः शैलराजमुदङ्मुखाः ॥ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! यह सुनकर महाराज पाण्डु भी महर्षियोंके साथ जानेके लिये सहसा उठ खड़े हुए। उनके मनमें स्वर्गके पार जानेकी इच्छा जाग उठी और वे उत्तरकी ओर मुँह करके अपनी दोनों पत्नियोंके साथ शतशृंग पर्वतसे चल दिये। यह देख गिरिराज हिमालयके ऊपर-ऊपर उत्तराभिमुख यात्रा करनेवाले तपस्वी मुनियोंने कहा— ॥ ८-९ ॥
दृष्टवन्तो गिरौ रम्ये दुर्गान् देशान् बहून् वयम् । विमानशतसम्बाधां गीतस्वरनिनादिताम् ॥ १० ॥ आक्रीडभूमिं देवानां गन्धर्वाप्सरसां तथा । उद्यानानि कुबेरस्य समानि विषमाणि च ॥ ११ ॥ ‘भरतश्रेष्ठ! इस रमणीय पर्वतपर हमने बहुत-से ऐसे प्रदेश देखे हैं, जहाँ जाना बहुत कठिन है। वहाँ देवताओं, गन्धर्वों तथा अप्सराओंकी क्रीड़ाभूमि है, जहाँ सैकड़ों विमान खचाखच भरे रहते हैं और मधुर गीतोंके स्वर गूँजते रहते हैं। इसी पर्वतपर कुबेरके अनेक उद्यान हैं, जहाँकी भूमि कहीं समतल है और कहीं नीची-ऊँची ॥ १०-११ ॥
महानदीनितम्बांश्च गहनान् गिरिगुह्वरान् । सन्ति नित्यहिमा देशा निर्वृक्षमृगपक्षिणः ॥ १२ ॥ ‘इस मार्गमें हमने कई बड़ी-बड़ी नदियोंके दुर्गम तट और कितनी ही पर्वतीय घाटियाँ देखी हैं। यहाँ बहुत-से ऐसे स्थल हैं, जहाँ सदा बर्फ जमी रहती है तथा जहाँ वृक्ष, पशु और पक्षियोंका नाम भी नहीं है ॥ १२ ॥
सन्ति क्वचिन्महादर्यो दुर्गाः काश्चिद् दुरासदाः । नातिक्रामेत पक्षी यान् कुत एवेतरे मृगाः ॥ १३ ॥