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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

१०६-

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षडधिकशततमोऽध्यायः

महर्षि माण्डव्यका शूलीपर चढ़ाया जाना

जनमेजय उवाच

किं कृतं कर्म धर्मेण येन शापमुपेयिवान् ।
कस्य शापाच्च ब्रह्मर्षेः शूद्रयोनावजायत ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! धर्मराजने ऐसा कौन-सा कर्म किया था, जिससे उन्हें शाप प्राप्त हुआ? किस ब्रह्मर्षिके शापसे वे शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

बभूव ब्राह्मणः कश्चिन्माण्डव्य इति विश्रुतः ।
धृतिमान् सर्वधर्मज्ञः सत्ये तपसि च स्थितः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! पूर्वकालमें माण्डव्य नामसे विख्यात एक ब्राह्मण थे, जो धैर्यवान्, सब धर्मोंके ज्ञाता, सत्यनिष्ठ एवं तपस्वी थे ॥ २ ॥

स आश्रमपदद्वारि वृक्षमूले महातपाः ।
ऊर्ध्वबाहुर्महायोगी तस्थौ मौनव्रतान्वितः ॥ ३ ॥
वे अपने आश्रमके द्वारपर एक वृक्षके नीचे दोनों बाँहें ऊपरको उठाये हुए मौनव्रत धारण करके खड़े रहकर बड़ी भारी तपस्या करते थे। माण्डव्यजी बहुत बड़े योगी थे ॥ ३ ॥

तस्य कालेन महता तस्मिंस्तपसि वर्ततः ।
तमाश्रममनुप्राप्ता दस्यवो लोप्त्रहारिणः ॥ ४ ॥
उस कठोर तपस्यामें लगे हुए महर्षिके बहुत दिन व्यतीत हो गये। एक दिन उनके आश्रमपर चोरीका माल लिये हुए बहुत-से लुटेरे आये ॥ ४ ॥

अनुसार्यमाणा बहुभी रक्षिभिर्भरतर्षभ ।
ते तस्यावसथे लोप्त्रं दस्यवः कुरुसत्तम ॥ ५ ॥
निधाय च भयाल्लीनास्तत्रैवानागते बले ।
तेषु लीनेष्वथो शीघ्रं ततस्तद् रक्षिणां बलम् ॥ ६ ॥
आजगाम ततोऽपश्यंस्तमृषिं तस्करानुगाः ।
तमपृच्छंस्ततो राजंस्तथावृत्तं तपोधनम् ॥ ७ ॥
कतमेन पथा याता दस्यवो द्विजसत्तम ।
तेन गच्छामहे ब्रह्मन् यथा शीघ्रतरं वयम् ॥ ८ ॥

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जनमेजय! उन चोरोंका बहुत-से सैनिक पीछा कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ! वे दस्यु वह चोरीका माल महर्षिके आश्रममें रखकर भयके मारे प्रजा-रक्षक सेनाके आनेके पहले वहीं कहीं छिप गये। उनके छिप जानेपर रक्षकोंकी सेना शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँची। राजन्! चोरोंका पीछा करनेवाले लोगोंने इस प्रकार तपस्यामें लगे हुए उन महर्षिको जब वहाँ देखा, तो पूछा कि 'द्विजश्रेष्ठ! बताइये, चोर किस रास्तेसे भगे हैं? जिससे वही मार्ग पकड़कर हम तीव्र गतिसे उनका पीछा करें' ।। ५–८ ।।

तथा तु रक्षिणां तेषां ब्रुवतां स तपोधनः । न किंचिद् वचनं राजन्नब्रवीत् साध्वसाधु वा ।। ९ ।। राजन्! उन रक्षकोंके इस प्रकार पूछनेपर तपस्याके धनी उन महर्षिने भला-बुरा कुछ भी नहीं कहा ।। ९ ।।

ततस्ते राजपुरुषा विचिन्वानास्तमाश्रमम् । ददृशुस्तत्र लीनांस्तांश्चौरांस्तद् द्रव्यमेव च ।। १० ।। तब उन राजपुरुषोंने उस आश्रममें ही चोरोंको खोजना आरम्भ किया और वहीं छिपे हुए चोरों तथा चोरीके मालको भी देख लिया ।। १० ।।

ततः शङ्का समभवद् रक्षिणां तं मुनिं प्रति । संयम्यैनं ततो राज्ञे दस्यूंश्चैव न्यवेदयन् ।। ११ ।। फिर तो रक्षकोंको मुनिके प्रति मनमें संदेह उत्पन्न हो गया और वे उन्हें बाँधकर राजाके पास ले गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने राजासे सब बातें बतायीं और उन चोरोंको भी राजाके हवाले कर दिया ।। ११ ।।

तं राजा सह तैश्चौरैरन्वशाद् वध्यतामिति । स रक्षिभिस्तैरज्ञातः शूले प्रोतो महातपाः ।। १२ ।। राजाने उन चोरोंके साथ महर्षिको भी प्राणदण्डकी आज्ञा दे दी। रक्षकोंने उन महातपस्वी मुनिको नहीं पहचाना और उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया ।। १२ ।।

ततस्ते शूलमारोप्य तं मुनिं रक्षिणस्तदा । प्रतिजग्मुर्महीपालं धनान्यादाय तान्यथ ।। १३ ।। इस प्रकार वे रक्षक माण्डव्य मुनिको शूलीपर चढ़ाकर वह सारा धन साथ ले राजाके पास लौट गये ।। १३ ।।

शूलस्थः स तु धर्मात्मा कालेन महता ततः । निराहारोऽपि विप्रर्षिर्मरणं नाभ्यपद्यत ।। १४ ।। धर्मात्मा ब्रह्मर्षि माण्डव्य दीर्घकालतक उस शूलके अग्रभागपर बैठे रहे। वहाँ भोजन न मिलनेपर भी उनकी मृत्यु नहीं हुई ।। १४ ।।

धारयामास च प्राणानृषींश्च समुपानयत् । शूलाग्रे तप्यमानेन तपस्तेन महात्मना ।। १५ ।।

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संतापं परमं जग्मुर्मुनयस्तपसान्विताः ।
ते रात्रौ शकुना भूत्वा संनिपत्य तु भारत ।
दर्शयन्तो यथाशक्ति तमपृच्छन् द्विजोत्तमम् ॥ १६ ॥
वे प्राण धारण किये रहे और स्मरणमात्र करके ऋषियोंको अपने पास बुलाने लगे। शूलीकी नोकपर तपस्या करनेवाले उन महात्मासे प्रभावित होकर सभी तपस्वी मुनियोंको बड़ा संताप हुआ। वे रातमें पक्षियोंका रूप धारण करके वहाँ उड़ते हुए आये और अपनी शक्तिके अनुसार स्वरूपको प्रकाशित करते हुए उन विप्रवर माण्डव्य मुनिसे पूछने लगे— ॥ १५-१६ ॥

श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन् किं पापं कृतवानसि ।
येनेह समनुप्राप्तं शूले दुःखभयं महत् ॥ १७ ॥
‘ब्रह्मन्! हम सुनना चाहते हैं कि आपने कौन-सा पाप किया है, जिससे यहाँ शूलपर बैठनेका यह महान् कष्ट आपको प्राप्त हुआ है?’ ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अणीमाण्डव्योपाख्यानविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६ ॥

१०७-

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सप्ताधिकशततमोऽध्यायः

माण्डव्यका धर्मराजको शाप देना

वैशम्पायन उवाच

ततः स मुनिशार्दूलस्तानुवाच तपोधनान् ।
दोषतः कं गमिष्यामि न हि मेऽन्योऽपराध्यति ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तब उन मुनिश्रेष्ठने उन तपस्वी मुनियोंसे कहा—'मैं किसपर दोष लगाऊँ; दूसरे किसीने मेरा अपराध नहीं किया है' ॥ १ ॥

तं दृष्ट्वा रक्षिणस्तत्र तथा बहुतिथेऽहनि ।
न्यवेदयंस्तथा राज्ञे यथावृत्तं नराधिप ॥ २ ॥
महाराज! रक्षकोंने बहुत दिनोंतक उन्हें शूलपर बैठे देख राजाके पास जा वह सब समाचार ज्यों-का-त्यों निवेदन किया ॥ २ ॥

श्रुत्वा च वचनं तेषां निश्चित्य सह मन्त्रिभिः ।
प्रसादयामास तथा शूलस्थमृषिसत्तमम् ॥ ३ ॥
उनकी बात सुनकर मन्त्रियोंके साथ परामर्श करके राजाने शूलीपर बैठे हुए उन मुनिश्रेष्ठको प्रसन्न करनेका प्रयत्न किया ॥ ३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 794)

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धर्मराज और अणीमाण्डव्य

(चित्र: ऊपर धर्मराज और अणीमाण्डव्य; नीचे अणीमाण्डव्य ऋषि शूलीपर एवं बाल्यकाल का प्रसंग)

अणीमाण्डव्य ऋषि शूलीपर

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राजोवाच

यन्मयापकृतं मोहादज्ञानादृषिसत्तम । प्रसादये त्वां तत्राहं न मे त्वं क्रोद्धुमर्हसि ॥ ४ ॥ **राजाने कहा—**मुनिवर! मैंने मोह अथवा अज्ञानवश जो अपराध किया है, उसके लिये आप मुझपर क्रोध न करें। मैं आपसे प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्ततो राज्ञा प्रसादमकरोन्मुनिः । कृतप्रसादं राजा तं ततः समवतारयत् ॥ ५ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजाके यों कहनेपर मुनि उनपर प्रसन्न हो गये। राजाने उन्हें प्रसन्न जानकर शूलीसे उतार दिया ॥ ५ ॥ अवतार्य च शूलाग्रात् तच्छूलं निष्ककर्ष ह । अशक्नुवंश्च निष्क्रष्टुं शूलं मूले स चिच्छिदे ॥ ६ ॥ नीचे उतारकर उन्होंने शूलके अग्रभागके सहारे उनके शरीरके भीतरसे शूलको निकालनेके लिये खींचा। खींचकर निकालनेमें असफल होनेपर उन्होंने उस शूलको मूलभागमें काट दिया ॥ ६ ॥ स तथान्तर्गतेनैव शूलेन व्यचरन्मुनिः । तेनातितपसा लोकान् विजिग्ये दुर्लभान् परैः ॥ ७ ॥ तबसे वे मुनि शूलाग्रभागको अपने शरीरके भीतर लिये हुए ही विचरने लगे। उस अत्यन्त घोर तपस्याके द्वारा महर्षिने ऐसे पुण्यलोकोंपर विजय पायी, जो दूसरोंके लिये दुर्लभ हैं ॥ ७ ॥ अणीमाण्डव्य इति च ततो लोकेषु गीयते । स गत्वा सदनं विप्रो धर्मस्य परमात्मवित् ॥ ८ ॥ आसनस्थं ततो धर्मं दृष्ट्वोपालभत प्रभुः । किं नु तद् दुष्कृतं कर्म मया कृतमजानता ॥ ९ ॥ यस्येयं फलनिर्वृत्तिरीदृश्यासादिता मया । शीघ्रमाचक्ष्व मे तत्त्वं पश्य मे तपसो बलम् ॥ १० ॥ अणी कहते हैं शूलके अग्रभागको, उससे युक्त होनेके कारण वे मुनि तभीसे सभी लोकोंमें 'अणी-माण्डव्य' कहलाने लगे। एक समय परमात्मतत्त्वके ज्ञाता विप्रवर माण्डव्यने धर्मराजके भवनमें जाकर उन्हें दिव्य आसनपर बैठे देखा। उस समय उन शक्तिशाली महर्षिने उन्हें उलाहना देते हुए पूछा—'मैंने अनजानमें कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिसके फलका भोग मुझे इस रूपमें प्राप्त हुआ? मुझे शीघ्र इसका रहस्य बताओ। फिर मेरी तपस्याका बल देखो' ॥ ८—१० ॥

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धर्म उवाच

पतङ्गिकानां पुच्छेषु त्वयेषीका प्रवेशिता ।
कर्मणस्तस्य ते प्राप्तं फलमेतत् तपोधन ॥ ११ ॥
**धर्मराज बोले—**तपोधन! तुमने फतिंगोंके पुच्छ-भागमें सींक घुसेड़ दी थी। उसी कर्मका यह फल तुम्हें प्राप्त हुआ है ॥ ११ ॥
स्वल्पमेव यथा दत्तं दानं बहुगुणं भवेत् ।
अधर्म एवं विप्रर्षे बहुदुःखफलप्रदः ॥ १२ ॥
विप्रर्षे! जैसे थोड़ा-सा भी किया हुआ दान कई गुना फल देनेवाला होता है, वैसे ही अधर्म भी बहुत दुःखरूपी फल देनेवाला होता है ॥ १२ ॥

अणीमाण्डव्य उवाच

कस्मिन् काले मया तत् तु कृतं ब्रूहि यथातथम् ।
तेनोक्तो धर्मराजेन बालभावे त्वया कृतम् ॥ १३ ॥
**अणीमाण्डव्यने पूछा—**अच्छा, तो ठीक-ठीक बताओ, मैंने किस समय—किस आयुमें वह पाप किया था?
धर्मराजने उत्तर दिया—‘बाल्यावस्थामें तुम्हारे द्वारा यह पाप हुआ था’ ॥ १३ ॥

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अणीमाण्डव्य उवाच

बालो हि द्वादशाद् वर्षाज्जन्मतो यत् करिष्यति ।
न भविष्यत्यधर्मोऽत्र न प्रज्ञास्यन्ति वै दिशः ॥ १४ ॥
अणीमाण्डव्यने कहा— धर्मशास्त्रके अनुसार जन्मसे लेकर बारह वर्षकी आयुतक बालक जो कुछ भी करेगा, उसमें अधर्म नहीं होगा; क्योंकि उस समयतक बालकको धर्मशास्त्रके आदेशका ज्ञान नहीं हो सकेगा ॥ १४ ॥

अल्पेऽपराधेऽपि महान् मम दण्डस्त्वया कृतः ।
गरीयान् ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधादपि ॥ १५ ॥
धर्मराज! तुमने थोड़े-से अपराधके लिये मुझे बहुत बड़ा दण्ड दिया है। ब्राह्मणका वध सम्पूर्ण प्राणियोंके वधसे भी अधिक भयंकर है ॥ १५ ॥

शूद्रयोनावतो धर्म मानुषः सम्भविष्यसि ।
मर्यादां स्थापयाम्यद्य लोके धर्मफलोदयाम् ॥ १६ ॥
अतः धर्म! तुम मनुष्य होकर शूद्रयोनिमें जन्म लोगे। आजसे संसारमें मैं धर्मके फलको प्रकट करनेवाली मर्यादा स्थापित करता हूँ ॥ १६ ॥

आ चतुर्दशकाद् वर्षान्न भविष्यति पातकम् ।
परतः कुर्वतामेवं दोष एव भविष्यति ॥ १७ ॥
चौदह वर्षकी उम्रतक किसीको पाप नहीं लगेगा। उससे अधिककी आयुमें पाप करनेवालोंको ही दोष लगेगा ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतेन त्वपराधेन शापात् तस्य महात्मनः ।
धर्मो विदुररूपेण शूद्रयोनावजायत ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! इसी अपराधके कारण महात्मा माण्डव्यके शापसे साक्षात् धर्म ही विदुररूपसे शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥

धर्मे चार्थे च कुशलो लोभक्रोधविवर्जितः ।
दीर्घदर्शी शमपरः कुरूणां च हिते रतः ॥ १९ ॥
वे धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्रके पण्डित, लोभ और क्रोधसे रहित, दीर्घदर्शी, शान्तिपरायण तथा कौरवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अणीमाण्डव्योपाख्यानविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥

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१०८-

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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः

धृतराष्ट्र आदिके जन्म तथा भीष्मजीके धर्मपूर्ण शासनसे कुरुदेशकी सर्वांगीण उन्नतिका दिग्दर्शन

वैशम्पायन उवाच

(धृतराष्ट्रे च पाण्डौ च विदुरे च महात्मनि ।)
तेषु त्रिषु कुमारेषु जातेषु कुरुजाङ्गलम् ।
कुरवोऽथ कुरुक्षेत्रं त्रयमेतदवर्धत ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धृतराष्ट्र, पाण्डु और महात्मा विदुर—इन तीनों कुमारोंके जन्मसे कुरुवंश, कुरुजांगल देश और कुरुक्षेत्र—इन तीनोंकी बड़ी उन्नति हुई ॥ १ ॥

ऊर्ध्वसस्याभवद् भूमिः सस्यानि रसवन्ति च ।
यथर्तुवर्षी पर्जन्यो बहुपुष्पफला द्रुमाः ॥ २ ॥

पृथ्वीपर खेतीकी उपज बहुत बढ़ गयी, सभी अन्न सरस होने लगे, बादल ठीक समयपर वर्षा करते थे, वृक्षोंमें बहुत-से फल और फूल लगने लगे ॥ २ ॥

वाहनानि प्रहृष्टानि मुदिता मृगपक्षिणः ।
गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ॥ ३ ॥

घोड़े-हाथी आदि वाहन हृष्ट-पुष्ट रहते थे, मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे दिन बिताते थे, फूलों और मालाओंमें अनुपम सुगन्ध होती थी और फलोंमें अनोखा रस होता था ॥ ३ ॥

वणिग्भिश्चान्वकीर्यन्त नगराण्यथ शिल्पिभिः ।
शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन् ॥ ४ ॥

सभी नगर व्यापार-कुशल वैश्यों तथा शिल्पकलामें निपुण कारीगरोंसे भरे रहते थे। शूर-वीर, विद्वान् और संत सुखी हो गये ॥ ४ ॥

नाभवन् दस्यवः केचिन्नाधर्मरुचयो जनाः ।
प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ॥ ५ ॥

कोई भी मनुष्य डाकू नहीं था। पापमें रुचि रखनेवाले लोगोंका सर्वथा अभाव था। राष्ट्रके विभिन्न प्रान्तोंमें सत्ययुग छा रहा था ॥ ५ ॥

धर्मक्रिया यज्ञशीलाः सत्यव्रतपरायणाः ।
अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ॥ ६ ॥

उस समयकी प्रजा सत्य-व्रतके पालनमें तत्पर हो स्वभावतः यज्ञ-कर्ममें लगी रहती और धर्मानुकूल कर्मोंमें संलग्न रहकर एक-दूसरेको प्रसन्न रखती हुई सदा उन्नतिके पथपर

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बढ़ती जाती थी ॥ ६ ॥
मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः ।
अन्योन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ॥ ७ ॥
सब लोग अभिमान और क्रोधसे रहित तथा लोभसे दूर रहनेवाले थे; सभी एक-दूसरेको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करते थे। लोगोंके आचार-व्यवहारमें धर्मकी ही प्रधानता थी ॥ ७ ॥
तन्महोदधिवत् पूर्णं नगरं वै व्यरोचत ।
द्वारतोरणनिर्यूहैर्यूक्तमभ्रचयोपमैः ॥ ८ ॥
समुद्रकी भाँति सब प्रकारसे भरा-पूरा कौरवनगर मेघसमूहोंके समान बड़े-बड़े दरवाजों, फाटकों और गोपुरोंसे सुशोभित था ॥ ८ ॥
प्रासादशतसम्बाधं महेन्द्रपुरसंनिभम् ।
नदीषु वनखण्डेषु वापीपल्वलसानुषु ।
काननेषु च रम्येषु विजह्रर्मुदिता जनाः ॥ ९ ॥
सैकड़ों महलोंसे संयुक्त वह पुरी देवराज इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी। वहाँके लोग नदियों, वनखण्डों, बावलियों, छोटे-छोटे जलाशयों, पर्वतशिखरों तथा रमणीय काननोंमें प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे ॥ ९ ॥
उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तथा ।
विस्पर्धमाना व्यचरंस्तथा देवर्षिचारणैः ॥ १० ॥
उस समय दक्षिणकुरु देशके निवासी उत्तरकुरुमें रहनेवाले लोगों, देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंके साथ होड़-सी लगाते हुए स्वच्छन्द विचरण करते थे ॥ १० ॥
नाभवत् कृपणः कश्चिन्नाभवन् विधवाः स्त्रियः ।
तस्मिञ्जनपदे रम्ये कुरुभिर्बहुलीकृते ॥ ११ ॥
कौरवोंद्वारा बढ़ाये हुए उस रमणीय जनपदमें न तो कोई कंजूस था और न विधवा स्त्रियाँ देखी जाती थीं ॥ ११ ॥
कूपारामसभावाप्यो ब्राह्मणावसथास्तथा ।
बभूवुः सर्वर्द्धियुतास्तस्मिन् राष्ट्रे सदोत्सवाः ॥ १२ ॥
उस राष्ट्रके कुओं, बगीचों, सभाभवनों, बावलियों तथा ब्राह्मणोंके घरोंमें सब प्रकारकी समृद्धियाँ भरी रहती थीं और वहाँ नित्य-नूतन उत्सव हुआ करते थे ॥ १२ ॥
भीष्मेण धर्मतो राजन् सर्वतः परिरक्षिते ।
बभूव रमणीयश्च चैत्ययूपशताङ्कितः ॥ १३ ॥
जनमेजय! भीष्मजीके द्वारा सब ओरसे धर्मपूर्वक सुरक्षित भूमण्डलमें वह कुरुदेश सैकड़ों देवस्थानों और यज्ञस्तम्भोंसे चिह्नित होनेके कारण बड़ी शोभा पाता था ॥ १३ ॥
स देशः परराष्ट्राणि विमृज्याभिप्रवर्धितः ।

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भीष्मेण विहितं राष्ट्रे धर्मचक्रमवर्तत ॥ १४ ॥ वह देश दूसरे राष्ट्रोंका भी शोधन करके निरन्तर उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहा था। राष्ट्रमें सब ओर भीष्मजीके द्वारा चलाया हुआ धर्मका शासन चल रहा था ॥ १४ ॥ क्रियमाणेषु कृत्येषु कुमाराणां महात्मनाम् । पौरजानपदाः सर्वे बभूवुः सततोत्सवाः ॥ १५ ॥ उन महात्मा कुमारोंके यज्ञोपवीतादि संस्कार किये जानेके समय नगर और देशके सभी लोग निरन्तर उत्सव मनाते थे ॥ १५ ॥ गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप । दीयतां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ॥ १६ ॥ जनमेजय! कुरुकुलके प्रधान-प्रधान पुरुषों तथा अन्य नगरनिवासियोंके घरोंमें सदा सब ओर यही बात सुनायी देती थी कि 'दान दो और अतिथियोंको भोजन कराओ' ॥ १६ ॥ धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च विदुरश्च महामतिः । जन्मप्रभृति भीष्मेण पुत्रवत् परिपालिताः ॥ १७ ॥ धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा परम बुद्धिमान् विदुर—इन तीनों भाइयोंका भीष्मजीने जन्मसे ही पुत्रकी भाँति पालन किया ॥ १७ ॥ संस्कारैः संस्कृतास्ते तु व्रताध्ययनसंयुताः । श्रमव्यायामकुशलाः समपद्यन्त यौवनम् ॥ १८ ॥ उन्होंने ही उनके सब संस्कार कराये। फिर वे ब्रह्मचर्यव्रतके पालन और वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर हो गये। परिश्रम और व्यायाममें भी उन्होंने बड़ी कुशलता प्राप्त की। फिर धीरे-धीरे वे युवावस्थाको प्राप्त हुए ॥ १८ ॥ धनुर्वेदेऽश्वपृष्ठे च गदायुद्धेऽसिचर्मणि । तथैव गजशिक्षायां नीतिशास्त्रेषु पारगाः ॥ १९ ॥ धनुर्वेद, घोड़ेकी सवारी, गदायुद्ध, ढाल-तलवारके प्रयोग, गजशिक्षा तथा नीतिशास्त्रमें वे तीनों भाई पारंगत हो गये ॥ १९ ॥ इतिहासपुराणेषु नानाशिक्षासु बोधिताः । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः सर्वत्र कृतनिश्चयाः ॥ २० ॥ उन्हें इतिहास, पुराण तथा नाना प्रकारके शिष्टाचारोंका भी ज्ञान कराया गया। वे वेद-वेदांगोंके तत्त्वज्ञ तथा सर्वत्र एक निश्चित सिद्धान्तके माननेवाले थे ॥ २० ॥ पाण्डुर्धनुषि विक्रान्तो नरेष्वभ्यधिकोऽभवत् । अन्येभ्यो बलवानासीद् धृतराष्ट्रो महीपतिः ॥ २१ ॥ पाण्डु धनुर्विद्यामें उस समयके मनुष्योंमें सबसे बढ़-चढ़कर पराक्रमी थे। इसी प्रकार राजा धृतराष्ट्र दूसरे लोगोंकी अपेक्षा शारीरिक बलमें बहुत बढ़कर थे ॥ २१ ॥

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त्रिषु लोकेषु न त्वासीत् कश्चिद् विदुरसम्मितः ।
धर्मनित्यस्तथा राजन् धर्मे च परमं गतः ॥ २२ ॥
राजन्! तीनों लोकोंमें विदुरजीके समान दूसरा कोई भी मनुष्य धर्मपरायण तथा धर्ममें ऊँची अवस्थाको प्राप्त (आत्मद्रष्टा)* नहीं था ॥ २२ ॥
प्रणष्टं शन्तनोर्वंशं समीक्ष्य पुनरुद्धृतम् ।
ततो निर्वचनं लोके सर्वराष्ट्रेष्ववर्तत ॥ २३ ॥
नष्ट हुए शान्तनुके वंशका पुनः उद्धार हुआ देखकर समस्त राष्ट्रके लोग परस्पर कहने लगे— ॥ २३ ॥
वीरसूनां काशिसुते देशानां कुरुजाङ्गलम् ।
सर्वधर्मविदां भीष्मः पुराणां गजसाह्वयम् ॥ २४ ॥
धृतराष्ट्रस्त्वचक्षुष्ट्वाद् राज्यं न प्रत्यपद्यत ।
पारसत्वाद् विदुरो राजा पाण्डुर्बभूव ह ॥ २५ ॥
‘वीर पुत्रोंको जन्म देनेवाली स्त्रियोंमें काशिराजकी दोनों पुत्रियाँ सबसे श्रेष्ठ हैं, देशोंमें कुरुजांगल देश सबसे उत्तम है, सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें भीष्मजीका स्थान सबसे ऊँचा है तथा नगरोंमें हस्तिनापुर सर्वोत्तम है।’ धृतराष्ट्र अंधे होनेके कारण और विदुरजी पारशव (शूद्राके गर्भसे ब्राह्मणद्वारा उत्पन्न) होनेसे राज्य न पा सके; अतः सबसे छोटे पाण्डु ही राजा हुए ॥ २४-२५ ॥
कदाचिदथ गाङ्गेयः सर्वनीतिमतां वरः ।
विदुरं धर्मतत्त्वज्ञं वाक्यमाह यथोचितम् ॥ २६ ॥
एक समयकी बात है, सम्पूर्ण नीतिज्ञ पुरुषोंमें श्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मजी धर्मके तत्त्वको जाननेवाले विदुरजीसे इस प्रकार न्यायोचित वचन बोले ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि
पाण्डुराज्याभिषेकेऽष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुराज्याभिषेकविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २६ १/३ श्लोक हैं)


* ‘अयं तु परमो धर्मो यद् योगेनात्मदर्शनम्’ याज्ञवल्क्यस्मृतिके इस कथनके अनुसार आत्मदर्शन ही सबसे उत्कृष्ट धर्म है।

१०९-

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नवाधिकशततमोऽध्यायः

राजा धृतराष्ट्रका विवाह

भीष्म उवाच

गुणैः समुदितं सम्यगिदं नः प्रथितं कुलम् ।
अत्यन्यान् पृथिवीपालान् पृथिव्यामधिराज्यभाक् ॥ १ ॥
**भीष्मजीने कहा—**बेटा विदुर! हमारा यह कुल अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न होकर इस जगत्में विख्यात हो रहा है। यह अन्य भूपालोंको जीतकर इस भूमण्डलके साम्राज्यका अधिकारी हुआ है ॥ १ ॥

रक्षितं राजभिः पूर्वं धर्मविद्भिर्महात्मभिः ।
नोत्सादमगमच्चेदं कदाचिदिह नः कुलम् ॥ २ ॥
पहलेके धर्मज्ञ एवं महात्मा राजाओंने इसकी रक्षा की थी; अतः हमारा यह कुल इस भूतलपर कभी उच्छिन्न नहीं हुआ ॥ २ ॥

मया च सत्यवत्या च कृष्णेन च महात्मना ।
समवस्थापितं भूयो युष्मासु कुलतन्तुषु ॥ ३ ॥
(बीचमें संकटकाल उपस्थित हुआ था किंतु) मैंने, माता सत्यवतीने तथा महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने मिलकर पुनः इस कुलको स्थापित किया है। तुम तीनों भाई इस कुलके तंतु हो और तुम्हींपर अब इसकी प्रतिष्ठा है ॥ ३ ॥

तच्चैतद् वर्धते भूयः कुलं सागरवद् यथा ।
तथा मया विधातव्यं त्वया चैव न संशयः ॥ ४ ॥
वत्स! यह हमारा वही कुल आगे भी जिस प्रकार समुद्रकी भाँति बढ़ता रहे, निःसंदेह वही उपाय मुझे और तुम्हें भी करना चाहिये ॥ ४ ॥

श्रूयते यादवी कन्या स्वनुरूपा कुलस्य नः ।
सुबलस्यात्मजा चैव तथा मद्रेश्वरस्य च ॥ ५ ॥
सुना जाता है, यदुवंशी शूरसेनकी कन्या पृथा (जो अब राजा कुन्तिभोजकी गोद ली हुई पुत्री है) भलीभाँति हमारे कुलके अनुरूप है। इसी प्रकार गान्धारराज सुबल और मद्रनरेशके यहाँ भी एक-एक कन्या सुनी जाती है ॥ ५ ॥

कुलीना रूपवत्यश्च ताः कन्याः पुत्र सर्वशः ।
उचिताश्चैव सम्बन्धे तेऽस्माकं क्षत्रियर्षभाः ॥ ६ ॥
बेटा! वे सब कन्याएँ बड़ी सुन्दरी तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न हैं। वे श्रेष्ठ क्षत्रियगण हमारे साथ विवाह-सम्बन्धकरनेके सर्वथा योग्य हैं ॥ ६ ॥

मन्ये वरयितव्यास्ता इत्यहं धीमतां वर ।

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संतानार्थं कुलस्यास्य यद् वा विदुर मन्यसे ॥ ७ ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विदुर! मेरी राय है कि इस कुलकी संतानपरम्पराको बढ़ानेके लिये उक्त कन्याओंका वरण करना चाहिये अथवा जैसी तुम्हारी सम्मति हो, वैसा किया जाय ॥ ७ ॥

विदुर उवाच
भवान् पिता भवान् माता भवान् नः परमो गुरुः ।
तस्मात् स्वयं कुलस्यास्य विचार्य कुरु यद्धितम् ॥ ८ ॥
**विदुर बोले—**प्रभो! आप हमारे पिता हैं, आप ही माता हैं और आप ही परम गुरु हैं; अतः स्वयं विचार करके जिस बातमें इस कुलका हित हो, वह कीजिये ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच
अथ शुश्राव विप्रेभ्यो गान्धारीं सुबलात्मजाम् ।
आराध्य वरदं देवं भगनेत्रहरं हरम् ॥ ९ ॥
गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा ।
इति शुश्राव तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ॥ १० ॥
ततो गान्धारराजस्य प्रेषयामास भारत ।
अचक्षुरिति तत्रासीत् सुबलस्य विचारणा ॥ ११ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इसके बाद भीष्मजीने ब्राह्मणोंसे गान्धारराज सुबलकी पुत्री शुभलक्षणा गान्धारीके विषयमें सुना कि वह भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले वरदायक भगवान् शंकरकी आराधना करके अपने लिये सौ पुत्र होनेका वरदान प्राप्त कर चुकी है। भारत! जब इस बातका ठीक-ठीक पता लग गया, तब कुरुपितामह भीष्मने गान्धारराजके पास अपना दूत भेजा। धृतराष्ट्र अंधे हैं, इस बातको लेकर सुबलके मनमें बड़ा विचार हुआ ॥ ९—११ ॥

कुलं ख्यातिं च वृत्तं च बुद्ध्या तु प्रसमीक्ष्य सः ।
ददौ तां धृतराष्ट्राय गान्धारीं धर्मचारिणीम् ॥ १२ ॥
परंतु उनके कुल, प्रसिद्धि और आचार आदिके विषयमें बुद्धिपूर्वक विचार करके उसने धर्मपरायणा गान्धारीका धृतराष्ट्रके लिये वाग्दान कर दिया ॥ १२ ॥

गान्धारी त्वथ शुश्राव धृतराष्ट्रमचक्षुषम् ।
आत्मानं दित्सितं चास्मै पित्रा मात्रा च भारत ॥ १३ ॥
ततः सा पट्टमादाय कृत्वा बहुगुणं तदा ।
बबन्ध नेत्रे स्वे राजन् पतिव्रतपरायणा ॥ १४ ॥
नाभ्यसूयां पतिमहमित्येवं कृतनिश्चया ।
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिर्भ्ययात् ॥ १५ ॥

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स्वसारं वयसा लक्ष्म्या युक्तामादाय कौरवान् ।
तां तदा धृतराष्ट्राय ददौ परमसत्कृताम् ।
भीष्मस्यानुमते चैव विवाहं समकारयत् ।। १६ ।।
जनमेजय! गान्धारीने जब सुना कि धृतराष्ट्र अंधे हैं और पिता-माता मेरा विवाह उन्हींके साथ करना चाहते हैं, तब उन्होंने रेशमी वस्त्र लेकर उसके कई तह करके उसीसे अपनी आँखें बाँध लीं। राजन्! गान्धारी बड़ी पतिव्रता थीं। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि मैं (सदा पतिके अनुकूल रहूँगी,) उनके दोष नहीं देखूँगी। तदनन्तर एक दिन गान्धारराजकुमार शकुनि युवावस्था तथा लक्ष्मीके समान मनोहर शोभासे युक्त अपनी बहिन गान्धारीको साथ लेकर कौरवोंके यहाँ गये और उन्होंने बड़े आदर-सत्कारके साथ धृतराष्ट्रको अपनी बहिन सौंप दी। शकुनिने भीष्मजीकी सम्मतिके अनुसार विवाह-कार्य सम्पन्न किया ।। १३—१६ ।।
दत्त्वा स भगिनीं वीरो यथार्हं च परिच्छदम् ।
पुनरायात् स्वनगरं भीष्मेण प्रतिपूजितः ।। १७ ।।
वीरवर शकुनिने अपनी बहिनका विवाह करके यथायोग्य दहेज दिया। बदलेमें भीष्मजीने भी उनका बड़ा सम्मान किया। तत्पश्चात् वे अपनी राजधानीको लौट आये ।। १७ ।।
गान्धार्यपि वरारोहा शीलाचारविचेष्टितैः ।
तुष्टिं कुरूणां सर्वेषां जनयामास भारत ।। १८ ।।
भारत! सुन्दर शरीरवाली गान्धारीने अपने उत्तम स्वभाव, सदाचार तथा सद्व्यवहारोंसे समस्त कौरवोंको प्रसन्न कर लिया ।। १८ ।।
वृत्तेनाराध्य तान् सर्वान् गुरून् पतिपरायणा ।
वाचापि पुरुषानन्यान् सुव्रता नान्यकीर्तयत् ।। १९ ।।
इस प्रकार सुन्दर बर्तावसे समस्त गुरुजनोंकी प्रसन्नता प्राप्त करके उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पतिपरायणा गान्धारीने कभी दूसरे पुरुषोंका नामतक नहीं लिया ।। १९ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रविवाहे नवाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें धृतराष्ट्रविवाहविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०९ ।।

११०-

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⬅ विषय-सूची (TOC)

दशाधिकशततमोऽध्यायः

कुन्तीको दुर्वासासे मन्त्रकी प्राप्ति, सूर्यदेवका आवाहन तथा उनके संयोगसे कर्णका जन्म एवं कर्णके द्वारा इन्द्रको कवच और कुण्डलोंका दान

वैशम्पायन उवाच

शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताभवत् ।
तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! यदुवंशियोंमें श्रेष्ठ शूरसेन हो गये हैं, जो वसुदेवजीके पिता थे। उन्हें एक कन्या हुई, जिसका नाम पृथा रखा गया। इस भूमण्डलमें उसके रूपकी तुलनामें दूसरी कोई स्त्री नहीं थी ॥ १ ॥

पितृष्वस्त्रीयाय स तामनपत्याय भारत ।
अग्रयमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यं स सत्यवाक् ॥ २ ॥
भारत! सत्यवादी शूरसेनने अपने फुफेरे भाई संतानहीन कुन्तिभोजसे पहले ही यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि मैं तुम्हें अपनी पहली संतान भेंट कर दूँगा ॥ २ ॥

अग्रजामथ तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षिणे ।
प्रददौ कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने ॥ ३ ॥
उन्हें पहले कन्या ही उत्पन्न हुई। अतः कृपाकांक्षी महात्मा सखा राजा कुन्तिभोजको उनके मित्र शूरसेनने वह कन्या दे दी ॥ ३ ॥

सा नियुक्ता पितुर्गृहे देवताऽतिथिपूजने ।
उग्रं पर्यचरत् तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ ४ ॥
निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः ।
तमुग्रं संशितात्मानं सर्वयत्नैिरतोषयत् ॥ ५ ॥
पिता कुन्तिभोजके घरपर पृथाको देवताओंके पूजन और अतिथियोंके सत्कारका कार्य सौंपा गया था। एक समय वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्मके विषयमें अपने निश्चयको सदा गुप्त रखनेवाले एक ब्राह्मण महर्षि आये, जिन्हें लोग दुर्वासाके नामसे जानते हैं। पृथा उनकी सेवा करने लगी। वे बड़े उग्र स्वभावके थे। उनका हृदय बड़ा कठोर था; फिर भी राजकुमारी पृथाने सब प्रकारके यत्नोंसे उन्हें पूर्ण संतुष्ट कर लिया ॥ ४-५ ॥

तस्यै स प्रददौ मन्त्रमापद्धर्मान्ववेक्षया ।
अभिचाराभिसंयुक्तमब्रवीच्चैव तां मुनिः ॥ ६ ॥

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दुर्वासाजीने पृथापर आनेवाले भावी संकटका विचार करके उनके धर्मकी रक्षाके लिये उसे एक वशीकरणमन्त्र दिया और उसके प्रयोगकी विधि भी बता दी। तत्पश्चात् वे मुनि उससे बोले— ॥ ६ ॥ यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तस्य तस्य प्रसादेन पुत्रस्तव भविष्यति ॥ ७ ॥ 'शुभे! तुम इस मन्त्रद्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, उसी-उसीके अनुग्रहसे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा' ॥ ७ ॥ तथोक्ता सा तु विप्रेण कुन्ती कौतूहलान्विता । कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ॥ ८ ॥ ब्रह्मर्षि दुर्वासाके यों कहनेपर कुन्तीके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ। वह यशस्विनी राजकन्या यद्यपि अभी कुमारी थी, तो भी उसने मन्त्रकी परीक्षाके लिये सूर्यदेवका आवाहन किया ॥ ८ ॥ सा ददर्श तमायान्तं भास्करं लोकभावनम् । विस्मिता चानवद्याङ्गी दृष्ट्वा तन्महद्भुतम् ॥ ९ ॥ आवाहन करते ही उसने देखा, सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और पालन करनेवाले भगवान् भास्कर आ रहे हैं। यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर निर्दोष अंगोंवाली कुन्ती चकित हो उठी ॥ ९ ॥ तां समासाद्य देवस्तु विवस्वानिदमब्रवीत् । अयमस्म्यसितापाङ्गि ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १० ॥ इधर भगवान् सूर्य उसके पास आकर इस प्रकार बोले—'श्याम नेत्रोंवाली कुन्ती! यह मैं आ गया। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? ॥ १० ॥ (आहूतोपस्थितं भद्रे ऋषिमन्त्रेण चोदितम् । विद्धि मां पुत्रलाभाय देवमर्कं शुचिस्मिते ॥) 'भद्रे! मैं दुर्वासा ऋषिके दिये हुए मन्त्रसे प्रेरित हो तुम्हारे बुलाते ही तुम्हें पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये उपस्थित हुआ हूँ। पवित्र मुसकानवाली कुन्ती! तुम मुझे सूर्यदेव समझो।'

कुन्त्युवाच कश्चिन्मे ब्राह्मणः प्रादाद् वरं विद्यां च शत्रुहन् । तद्दिज्ञासयाऽऽह्वानं कृतवत्यस्मि ते विभो ॥ ११ ॥ **कुन्तीने कहा—**शत्रुओंका नाश करनेवाले प्रभो! एक ब्राह्मणने मुझे वरदानके रूपमें देवताओंके आवाहनका मन्त्र प्रदान किया है। उसीकी परीक्षाके लिये मैंने आपका आवाहन किया था ॥ ११ ॥ एतस्मिन्नपराधे त्वां शिरसाहं प्रसादये ।

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योषितो हि सदा रक्ष्याः स्वापराद्धापि नित्यशः ॥ १२ ॥
यद्यपि मुझसे यह अपराध हुआ है, तो भी इसके लिये आपके चरणोंमें मस्तक रखकर मैं यह प्रार्थना करती हूँ कि आप क्षमापूर्वक प्रसन्न हो जाइये। स्त्रियोंसे अपना अपराध हो जाय, तो भी श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा उनकी रक्षा ही करनी चाहिये ॥ १२ ॥

सूर्य उवाच
वेदाहं सर्वमेवैतद् यद् दुर्वासा वरं ददौ ।
संत्यज्य भयमेवेह क्रियतां संगमो मम ॥ १३ ॥
सूर्यदेव बोले— शुुभे! मैं यह सब जानता हूँ कि दुर्वासाने तुम्हें वर दिया है। तुम भय छोड़कर यहाँ मेरे साथ समागम करो ॥ १३ ॥
अमोघं दर्शनं मह्यमाहूतश्चास्मि ते शुभे ।
वृथाह्वानेऽपि ते भीरु दोषः स्यान्नात्र संशयः ॥ १४ ॥
शुभे! मेरा दर्शन अमोघ है और तुमने मेरा आवाहन किया है। भीरु! यदि यह आवाहन व्यर्थ हुआ, तो भी निःसंदेह तुम्हें बड़ा दोष लगेगा ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता बहुविधं सान्त्वपूर्वं विवस्वता ।
सा तु नैच्छद् वरारोहा कन्याहमिति भारत ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत! भगवान् सूर्यने कुन्तीको समझाते हुए इस तरहकी बहुत-सी बातें कहीं; किंतु मैं अभी कुमारी कन्या हूँ, यह सोचकर सुन्दरी कुन्तीने उनसे समागमकी इच्छा नहीं की ॥ १५ ॥
बन्धुपक्षभयाद् भीता लज्जया च यशस्विनी ।
तामर्कः पुनरेवेदमब्रवीद् भरतर्षभ ॥ १६ ॥
यशस्विनी कुन्ती भाई-बन्धुओंमें बदनामी फैलनेके डरसे भी डरी हुई थी और नारीसुलभ लज्जासे भी वह विवश थी। भरतश्रेष्ठ! उस समय सूर्यदेवने पुनः उससे कहा— ॥ १६ ॥
(पुत्रस्ते निर्मितः सुभ्रु शृणु यादृक्छुभानने ॥
आदित्ये कुण्डले बिभ्रत् कवचं चैव मामकम् ।
शस्त्रास्त्राणामभेद्यं च भविष्यति शुचिस्मिते ॥
न न किंचन देयं तु ब्राह्मणेभ्यो भविष्यति ।
चोद्यमानो मया चापि नाक्षमं चिन्तयिष्यति ।
दास्यत्येव हि विप्रेभ्यो मानी चैव भविष्यति ॥)
'सुन्दर मुख एवं सुन्दर भौंहोंवाली राजकुमारी! तुम्हारे लिये जैसे पुत्रका निर्माण होगा, वह सुनो—शुचिस्मिते! वह माता अदितिके दिये हुए दिव्य कुण्डलों और मेरे कवचको

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धारण किये हुए उत्पन्न होगा। उसका वह कवच किन्हीं अस्त्र-शस्त्रोंसे टूट न सकेगा। उसके

पास कोई भी वस्तु ब्राह्मणोंके लिये अदेय न होगी। मेरे कहनेपर भी वह कभी अयोग्य कार्य

या विचारको अपने मनमें स्थान न देगा। ब्राह्मणोंके याचना करनेपर वह उन्हें सब प्रकारकी

वस्तुएँ देगा ही। साथ ही वह बड़ा स्वाभिमानी होगा।

मत्प्रसादान्न ते राज्ञि भविता दोष इत्युत ।

एवमुक्त्वा स भगवान् कुन्तिराजसुतां तदा ।। १७ ।।

प्रकाशकर्ता तपनः सम्बभूव तया सह ।

तत्र वीरः समभवत् सर्वशस्त्रभृतां वरः ।

आमुक्तकवचः श्रीमान् देवगर्भः श्रियान्वितः ।। १८ ।।

‘रानी! मेरी कृपासे तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा।’ कुन्तिराजकुमारी कुन्तीसे यों कहकर

प्रकाश और गरमी उत्पन्न करनेवाले भगवान् सूर्यने उसके साथ समागम किया। इससे उसी

समय एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था। उसने जन्मसे ही कवच

पहन रखा था और वह देवकुमारके समान तेजस्वी तथा शोभासम्पन्न था ।। १७-१८ ।।

सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ।

अजायत सुतः कर्णः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।। १९ ।।

जन्मके साथ ही कवच धारण किये उस बालकका मुख जन्मजात कुण्डलोंसे

प्रकाशित हो रहा था। इस प्रकार कर्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सब लोकोंमें विख्यात

है ।। १९ ।।

प्रादाच्च तस्यै कन्यात्वं पुनः स परमद्युतिः ।

दत्त्वा च तपतां श्रेष्ठो दिवमाचक्रमे ततः ।। २० ।।

उत्तम प्रकाशवाले भगवान् सूर्यने कुन्तीको पुनः कन्यात्व प्रदान किया। तत्पश्चात्

तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्य देवलोकमें चले गये ।। २० ।।

दृष्ट्वा कुमारं जातं सा वार्ष्णेयी दीनमानसा ।

एकाग्रं चिन्तयामास किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ।। २१ ।।

उस नवजात कुमारको देखकर वृष्णिवंशकी कन्या कुन्तीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ।

उसने एकाग्रचितसे विचार किया कि अब क्या करनेसे अच्छा परिणाम निकलेगा ।। २१ ।।

गूहमानापचारं सा बन्धुपक्षभयात् तदा ।

उत्ससर्ज कुमारं तं जले कुन्ती महाबलम् ।। २२ ।।

उस समय कुटुम्बीजनोंके भयसे अपने उस अनुचित कृत्यको छिपाती हुई कुन्तीने

महाबली कुमार कर्णको जलमें छोड़ दिया ।। २२ ।।

तमुत्सृष्टं जले गर्भं राधाभर्ता महायशाः ।

पुत्रत्वे कल्पयामास सभार्यः सूतनन्दनः ।। २३ ।।s