BharatKosha
Back to the archive

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages
Page 1321Permalink

हमारी सहायता लेना चाहेंगे तो हम इसके लिये प्रयत्न करेंगे। वीरवर! मेरा विश्वास है कि पाण्डुपुत्र अर्जुनकी पराजय नहीं हो सकती।' तमब्रवीन्निर्जलतोयदाभो हलायुधोऽनन्तरजं प्रतीतः। प्रीतोऽस्मि दृष्ट्वा हि पितृष्वसारं पृथां विमुक्तां सह कौरवाग्र्यैः॥ २४॥ जलहीन मेघके समान गौरवर्णवाले हलधर (बलरामजी)-ने अपने छोटे भाई श्रीकृष्णकी बातपर विश्वास करके उनसे कहा—'भैया! कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर पाण्डवोंसहित अपनी बुआ कुन्तीको लाक्षागृहसे बची हुई देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है'॥ २४॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि कृष्णवाक्ये अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८८॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८८॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २६ १/३ श्लोक हैं।)


* ऊर्ध्वविस्तृतदोर्मानि तालमित्यभिधीयते। इस वचनके अनुसार एक मनुष्य अपनी बाँहको ऊपर उठाकर खड़ा हो तो उस हाथसे लेकर पैरतककी लम्बाईको 'ताल' कहते हैं।

१८९-

Page 1322Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कर्ण तथा शल्यकी पराजय और द्रौपदीसहित भीम-अर्जुनका अपने डेरेपर जाना

वैशम्पायन उवाच

अजिनानि विधुन्वन्तः करकांश्च द्विजर्षभाः ।
ऊचुस्ते भीर्न कर्तव्या वयं योत्स्यामहे परान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय अपने मृगचर्म और कमण्डलुओंको हिलाते और उछालते हुए वे श्रेष्ठ ब्राह्मण अर्जुनसे कहने लगे—'तुम डरना नहीं, हम (सब)-लोग (तुम्हारी ओरसे) शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे' ॥ १ ॥

तानेवं वदतो विप्रानर्जुनः प्रहसन्निव ।
उवाच प्रेक्षका भूत्वा यूयं तिष्ठथ पार्श्वतः ॥ २ ॥
इस प्रकारकी बातें करनेवाले उन ब्राह्मणोंसे अर्जुनने हँसते हुए-से कहा—'आपलोग दर्शक होकर बगलमें चुपचाप खड़े रहें' ॥ २ ॥

अहमेनानजिह्मागैः शतशो विकिरञ्छरैः ।
वारयिष्यामि संक्रुद्धान् मन्त्रैराशीविषानिव ॥ ३ ॥
'मैं (अकेला ही) सीधी नोकवाले सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करके क्रोधमें भरे हुए इन शत्रुओंको उसी प्रकार रोक दूँगा, जैसे मन्त्रज्ञ लोग अपने मन्त्रों (के बल)-से विषैले सर्पोंको कुण्ठित कर देते हैं' ॥ ३ ॥

इति तद् धनुरानम्य शुल्कावाप्तं महाबलः ।
भ्रात्रा भीमेन सहितस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ४ ॥
यों कहकर महाबली अर्जुनने उसी स्वयंवरमें लक्ष्यवेधके लिये प्राप्त हुए धनुषको झुकाकर (उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी और उसे हाथमें लेकर) भाई भीमसेनके साथ वे पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ ४ ॥

ततः कर्णमुखान् दृष्ट्वा क्षत्रियान् युद्धदुर्मदान् ।
सम्पेततुरभीतौ तौ गजौ प्रतिगजानिव ॥ ५ ॥
तदनन्तर कर्ण आदि रणोन्मत्त क्षत्रियोंको आते देख वे दोनों भाई निर्भय हो उनपर उसी तरह टूट पड़े, जैसे दो (मतवाले) हाथी अपने विपक्षी हाथियोंकी ओर बढ़े जा रहे हों ॥ ५ ॥

ऊचुश्च वाचः परुषास्ते राजानो युयुत्सवः ।
आहवे हि द्विजस्यापि वधो दृष्टो युयुत्सतः ॥ ६ ॥

Page 1323Permalink

तब युद्धके लिये उत्सुक उन राजाओंने कठोर स्वरमें ये बातें कहीं—'युद्धकी इच्छावाले ब्राह्मणका भी रणभूमिमें वध शास्त्रानुकूल देखा गया है' ।। ६ ।।

इत्येवमुक्त्वा राजानः सहसा दुद्रुवुर्द्विजान् । ततः कर्णो महातेजा जिष्णुं प्रति ययौ रणे ।। ७ ।। यों कहकर वे राजालोग सहसा ब्राह्मणोंकी ओर दौड़े। महातेजस्वी कर्ण अर्जुनकी ओर युद्धके लिये बढ़ा ।। ७ ।।

युद्धार्थी वासिताहेतोर्गजः प्रतिगजं यथा । भीमसेनं ययौ शल्यो मद्राणामीश्वरो बली ।। ८ ।। ठीक उसी तरह, जैसे हथिनीके लिये लड़नेकी इच्छा रखकर एक हाथी अपने प्रतिद्वन्द्वी दूसरे हाथीसे भिड़नेके लिये जा रहा हो, महाबली मद्रराज शल्य भीमसेनसे जा भिड़े ।। ८ ।।

दुर्योधनादयः सर्वे ब्राह्मणैः सह संगताः । मृदुपूर्वमयत्नेन प्रत्ययुध्यंस्तदाहवे ।। ९ ।। दुर्योधन आदि सभी (भूपाल) एक साथ अन्यान्य ब्राह्मणोंके साथ उस युद्धभूमिमें बिना किसी प्रयासके (खेल-सा करते हुए) कोमलतापूर्वक (शीत) युद्ध करने लगे ।। ९ ।।

ततोऽर्जुनः प्रत्यविध्यदापतन्तं शितैः शरैः । कर्णं वैकर्तनं श्रीमान् विकृष्य बलवद् धनुः ।। १० ।। तब तेजस्वी अर्जुनने अपने धनुषको जोरसे खींचकर अपनी ओर वेगसे आते हुए सूर्यपुत्र कर्णको कई तीक्ष्ण बाण मारे ।। १० ।।

तेषां शराणां वेगेन शितानां तिग्मतेजसाम् । विमुह्यमानो राधेयो यत्नात् तमनुधावति ।। ११ ।। उन दुःसह तेजवाले तीखे बाणोंके वेगपूर्वक आघातसे राधानन्दन कर्णको मूर्च्छा आने लगी। वह बड़ी कठिनाईसे अर्जुनकी ओर बढ़ा ।। ११ ।।

तावुभावप्यनिर्देश्यौ लाघवाज्जयतां वरौ । अयुध्येतां सुसंरब्धावन्योन्यविजिगीषिणौ ।। १२ ।। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ वे दोनों योद्धा हाथोंकी फुर्ती दिखानेमें बेजोड़ थे, उनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा—यह बताना असम्भव था। दोनों ही एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखकर बड़े क्रोधसे लड़ रहे थे ।। १२ ।।

कृते प्रतिकृतं पश्य पश्य बाहुबलं च मे । इति शूरार्थवचनैरभाषेतां परस्परम् ।। १३ ।। 'देखो, तुमने जिस अस्त्रका प्रयोग किया था, उसे रोकनेके लिये मैंने यह अस्त्र चलाया है। देख लो, मेरी भुजाओंका बल!' इस प्रकार शौर्यसूचक वचनोंद्वारा वे आपसमें बातें भी करते जाते थे ।। १३ ।।

Page 1324Permalink

ततोऽर्जुनस्य भुजयोर्वीर्यमप्रतिमं भुवि ।
ज्ञात्वा वैकर्तनः कर्णः संरब्धः समयोधयत् ॥ १४ ॥
तदनन्तर अर्जुनके बाहुबलकी इस पृथ्वीपर कहीं समता नहीं है, यह जानकर सूर्यपुत्र कर्ण अत्यन्त क्रोधपूर्वक जमकर युद्ध करने लगा ॥ १४ ॥
अर्जुनेन प्रयुक्तांस्तान् बाणान् वेगवतस्तदा ।
प्रतिहत्य ननादोच्चैः सैन्यानि तदपूजयन् ॥ १५ ॥
उस समय अर्जुनद्वारा चलाये हुए उन सभी वेगशाली बाणोंको काटकर कर्ण बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगा। समस्त सैनिकोंने उसके इस अद्भुत कार्यकी सराहना की ॥ १५ ॥

कर्ण उवाच

तुष्यामि ते विप्रमुख्य भुजवीर्यस्य संयुगे ।
अविषादस्य चैवास्य शस्त्रास्त्रविजयस्य च ॥ १६ ॥
**कर्ण बोला—**विप्रवर! युद्धमें आपके बाहुबलसे मैं (बहुत) संतुष्ट हूँ। आपमें थकावट या विषादका कोई चिह्न नहीं दिखायी देता और आपने सभी अस्त्र-शस्त्रोंको जीतकर मानो अपने काबूमें कर लिया है। (आपकी यह सफलता देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है) ॥ १६ ॥
किं त्वं साक्षाद् धनुर्वेदो रामो वा विप्रसत्तम ।
अथ साक्षाद्धरिहयः साक्षाद् वा विष्णुरच्युतः ॥ १७ ॥
विप्रशिरोमणे! आप मूर्तिमान् धनुर्वेद हैं? या परशुराम? अथवा आप स्वयं इन्द्र या अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णु हैं? ॥ १७ ॥
आत्मप्रच्छादनार्थं वै बाहुवीर्यमुपाश्रितः ।
विप्ररूपं विधायेदं मन्ये मां प्रतियुध्यसे ॥ १८ ॥
मैं समझता हूँ, आप इन्हींमेंसे कोई हैं और अपने स्वरूपको छिपानेके लिये यह ब्राह्मणवेष धारण करके बाहुबलका आश्रय ले मेरे साथ युद्ध कर रहे हैं ॥ १८ ॥
न हि मामाहवे क्रुद्धमन्यः साक्षाच्छचीपतेः ।
पुमान् योधयितुं शक्तः पाण्डवाद् वा किरीटिनः ॥ १९ ॥
क्योंकि युद्धमें मेरे कुपित होनेपर साक्षात् शचीपति इन्द्र अथवा किरीटधारी पाण्डु-नन्दन अर्जुनके अतिरिक्त दूसरा कोई मेरा सामना नहीं कर सकता ॥ १९ ॥
तमेवं वादिनं तत्र फाल्गुनः प्रत्यभाषत ।
नास्मि कर्ण धनुर्वेदो नास्मि रामः प्रतापवान् ॥ २० ॥
कर्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उसे इस प्रकार उत्तर दिया—‘कर्ण! न तो मैं धनुर्वेद हूँ और न प्रतापी परशुराम’ ॥ २० ॥

Page 1325Permalink

ब्राह्मणोऽस्मि युधां श्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
ब्राह्मे पौरन्दरे चास्त्रे निष्ठितो गुरुशासनात् ॥ २१ ॥
स्थितोऽस्म्यद्य रणे जेतुं त्वां वै वीर स्थिरो भव ।
मैं तो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें उत्तम और योद्धाओंमें श्रेष्ठ एक ब्राह्मण हूँ। गुरुका उपदेश पाकर ब्रह्मास्त्र तथा इन्द्रास्त्र दोनोंमें पारंगत हो गया हूँ। वीर! आज मैं तुम्हें युद्धमें जीतनेके लिये खड़ा हूँ, तुम भी स्थिरतापूर्वक खड़े रहो ॥ २१ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु राधेयो युद्धात् कर्णो न्यवर्तत ॥ २२ ॥
ब्राह्मं तेजस्तदाजय्यं मन्यमानो महारथः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अर्जुनकी यह बात सुनकर महारथी कर्ण ब्राह्मतेजको अजेय मानता हुआ उस समय युद्ध छोड़कर हट गया ॥ २२ १/२ ॥
अपरस्मिन् वनोद्देशे वीरौ शल्यवृकोदरौ ॥ २३ ॥
बलिनौ युद्धसम्पन्नौ विद्यया च बलेन च ।
अन्योन्यमाह्वयन्तौ तु मत्ताविव महागभौ ॥ २४ ॥
इसी समय दूसरे स्थानको अपना रणक्षेत्र बनाकर वहीं बलवान् वीर शल्य और भीमसेन एक-दूसरेको ललकारते हुए दो मतवाले गजराजोंकी भाँति युद्ध कर रहे थे। दोनों ही विद्या, बल और युद्धकी कलासे सम्पन्न थे ॥ २३-२४ ॥
मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव निघ्नन्तावितरेतरम् ।
प्रकर्षणाकर्षणयोरभ्याकर्षविकर्षणैः ॥ २५ ॥
वे घूँसों और घुटनोंसे एक-दूसरेको मारने लगे। दोनों एक-दूसरेको दूरतक ठेल ले जाते, नीचे गिरानेका प्रयत्न करते, कभी अपनी ओर खींचते और कभी अगल-बगलसे पैंतरें देकर गिरानेकी चेष्टा करते थे ॥ २५ ॥
आचकर्षतुरन्योन्यं मुष्टिभिश्चापि जघ्नतुः ।
ततश्चटचटाशब्दः सुघोरो ह्यभवत् तयोः ॥ २६ ॥
पाषाणसम्पातनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः ।
मुहूर्तं तौ तदान्योन्यं समरे पर्यकर्षताम् ॥ २७ ॥
इस प्रकार वे एक-दूसरेको खींचते और मुक्कोंसे मारते थे। उस समय घूँसोंकी मारसे दोनोंके शरीरोंपर अत्यन्त भयंकर 'चट-चट' शब्द हो रहा था। वे परस्पर इस प्रकार प्रहार कर रहे थे, मानो पत्थर टकरा रहे हों। लगभग दो घड़ीतक दोनों उस युद्धमें एक-दूसरेको खींचते और ठेलते रहे ॥ २६-२७ ॥
ततो भीमः समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां शल्यमाहवे ।
अपातयत् कुरुश्रेष्ठो ब्राह्मणा जहसुस्तदा ॥ २८ ॥

Page 1326Permalink

तदनन्तर कुरुश्रेष्ठ भीमसेनने दोनों हाथोंसे शल्यको ऊपर उठाकर उस युद्धभूमिमें पटक दिया। यह देख ब्राह्मणलोग हँसने लगे ॥ २८ ॥ तत्राश्चर्यं भीमसेनश्चकार पुरुषर्षभः । यच्छल्यं पातितं भूमौ नावधीद् बलिनं बली ॥ २९ ॥ कुरुश्रेष्ठ बलवान् भीमसेनने एक आश्चर्यकी बात यह की कि महाबली शल्यको पृथ्वीपर पटककर भी मार नहीं डाला ॥ २९ ॥ पातिते भीमसेनेन शल्ये कर्णे च शङ्किते । शङ्किताः सर्वराजानः परिवव्रुर्वृकोदरम् ॥ ३० ॥ भीमसेनके द्वारा शल्यके पछाड़ दिये जाने और अर्जुनसे कर्णके डर जानेपर सभी राजा (युद्धका विचार छोड़) शंकित हो भीमसेनको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ३० ॥ ऊचुश्च सहितास्तत्र साध्विमौ ब्राह्मणर्षभौ । विज्ञायेतां क्वजन्मानौ क्वनिवासौ तथैव च ॥ ३१ ॥ और एक साथ ही बोल उठे—‘अहो! ये दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण धन्य हैं। पता तो लगाओ, इनकी जन्मभूमि कहाँ है तथा ये रहनेवाले कहाँके हैं? ॥ ३१ ॥ को हि राधासुतं कर्णं शक्तो योधयितुं रणे । अन्यत्र रामाद् द्रोणाद् वा पाण्डवाद् वा किरीटिनः ॥ ३२ ॥ ‘परशुराम, द्रोण अथवा पाण्डुनन्दन अर्जुनके सिवा दूसरा ऐसा कौन है, जो युद्धमें राधानन्दन कर्णका सामना कर सके ॥ ३२ ॥ कृष्णाद् वा देवकीपुत्रात् कृपाद् वापि शरद्वतः । को वा दुर्योधनं शक्तः प्रतियोधयितुं रणे ॥ ३३ ॥ ‘(इसी प्रकार) देवकीनन्दन श्रीकृष्ण अथवा शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यके सिवा दूसरा कौन है, जो समरभूमिमें दुर्योधनके साथ लोहा ले सके ॥ ३३ ॥ तथैव मद्राधिपतिं शल्यं बलवतां वरम् । बलदेवाद्दृते वीरात् पाण्डवाद् वा वृकोदरात् ॥ ३४ ॥ वीराद् दुर्योधनाद् वान्यः शक्तः पातयितुं रणे । क्रियतामवहारोऽस्माद् युद्धाद् ब्राह्मणसंवृतात् ॥ ३५ ॥ ‘बलवानोंमें श्रेष्ठ मद्रराज शल्यको भी वीरवर बलदेव, पाण्डुनन्दन भीमसेन अथवा वीर दुर्योधनको छोड़कर दूसरा कौन रणभूमिमें गिरा सकता है। अतः ब्राह्मणोंसे घिरे हुए इस युद्धक्षेत्रसे हमलोगोंको हट जाना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ ब्राह्मणा हि सदा रक्ष्याः सापराधापि नित्यदा । अथैनानुपलभ्येह पुनर्योत्स्याम हृष्टवत् ॥ ३६ ॥

Page 1327Permalink

‘क्योंकि ब्राह्मण अपराधी हों, तो भी सदा ही उनकी रक्षा करनी चाहिये। पहले इनका ठीक-ठीक परिचय ले लें, फिर (ये चाहें तो) हम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करेंगे' ।। ३६ ।।

तांस्तथावादिनः सर्वान् प्रसमीक्ष्य क्षितीश्वरान् । अथान्यान् पुरुषांश्चापि कृत्वा तत् कर्म संयुगे ।। ३७ ।।

उन सब राजाओं तथा अन्य लोगोंको ऐसी बातें करते देख और युद्धमें वह महान् पराक्रम दिखाकर भीमसेन और अर्जुन बड़े प्रसन्न थे ।। ३७ ।।

वैशम्पायन उवाच

तत् कर्म भीमस्य समीक्ष्य कृष्णः कुन्तीसुतौ तौ परिशङ्कमानः । निवारयामास महीपतींस्तान् धर्मेण लब्धेत्यनुनीय सर्वान् ।। ३८ ।।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीमसेनका वह अद्भुत कार्य देख भगवान् श्रीकृष्णने यह सोचते हुए कि ये दोनों भाई कुन्तीकुमार भीमसेन और अर्जुन ही हैं, उन सब राजाओंको यह समझाकर कि ‘इन्होंने धर्मपूर्वक द्रौपदीको प्राप्त किया है’ अनुनयपूर्वक युद्धसे रोका ।। ३८ ।।

एवं ते विनिवृत्तास्तु युद्धाद् युद्धविशारदाः । यथावासं ययुः सर्वे विस्मिता राजसत्तमाः ।। ३९ ।।

इस प्रकार श्रीकृष्णके समझानेसे वे सभी युद्धकुशल श्रेष्ठ नरेश युद्धसे निवृत्त हो गये और विस्मित होकर अपने-अपने डेरोंको चले गये ।। ३९ ।।

वृत्तो ब्रह्मोत्तरो रङ्गः पाञ्चाली ब्राह्मणैर्वृता । इति ब्रुवन्तः प्रययुर्ये तत्रासन् समागताः ।। ४० ।।

वहाँ जो दर्शक एकत्र हुए थे, वे ‘इस रंग-मण्डपके उत्सवसे ब्राह्मणोंकी श्रेष्ठता सिद्ध हुई; पांचालराजकुमारी द्रौपदीको ब्राह्मणोंने प्राप्त किया', यों कहते हुए (अपने-अपने निवासस्थानको) चले गये ।। ४० ।।

ब्राह्मणैस्तु प्रतिच्छन्नौ रौरवाजिनवासिभिः । कृच्छ्रेण जग्मतुस्तौ तु भीमसेनधनंजयौ ।। ४१ ।।

रुरुमृगके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले ब्राह्मणोंसे घिरे होनेके कारण भीमसेन और अर्जुन बड़ी कठिनाईसे आगे बढ़ पाते थे ।। ४१ ।।

विमुक्तौ जनसम्बाधाच्छत्रुभिः परिवीक्षितौ । कृष्णयानुगतौ तत्र नृवीरौ तौ विरेजतुः ।। ४२ ।।

Page 1328Permalink

जनताकी भीड़से बाहर निकलनेपर शत्रुओंने उन्हें अच्छी तरह देखा। आगे-आगे वे

दोनों नरवीर थे और उनके पीछे-पीछे द्रौपदी चली जा रही थी। द्रौपदीके साथ वहाँ उन

दोनोंकी बड़ी शोभा हो रही थी ।। ४२ ।।

पौर्णमास्यां घनैर्मुत्तौ चन्द्रसूर्याविवोदितौ ।

तेषां माता बहुविधं विनाशं पर्यचिन्तयत् ।। ४३ ।।

अनागच्छत्सु पुत्रेषु भैक्षकालेऽभिगच्छति ।

धार्तराष्ट्रैर्हता न स्युर्विज्ञाय कुरुपुङ्गवाः ।। ४४ ।।

मायान्वितैर्वा रक्षोभिः सुघोरैर्दृढवैरिभिः ।

विपरीतं मतं जातं व्यासस्यापि महात्मनः ।। ४५ ।।

वे ऐसे लगते थे, जैसे पूर्णमासी तिथिको मेघोंकी घटासे निकलकर चन्द्रमा और सूर्य

प्रकाशित हो रहे हों। इधर भिक्षाका समय बीत जानेपर भी जब पुत्र नहीं लौटे, तब उनकी

माता कुन्तीदेवी स्नेहवश अनेक प्रकारकी चिन्ताओंमें डूबकर उनके विनाशकी आशंका

करने लगीं— 'कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि धृतराष्ट्रके पुत्रोंने कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको पहचानकर

उनकी हत्या कर डाली हो? अथवा दृढ़तापूर्वक वैरभावको मनमें रखनेवाले महाभयंकर

मायावी राक्षसोंने तो मेरे बच्चोंको नहीं मार डाला? क्या महात्मा व्यासके भी निश्चित मतके

विपरीत कोई बात हो गयी?' ।। ४३-४५ ।।

इत्येवं चिन्तयामास सुतस्नेहावृता पृथा ।

ततः सुप्तजनप्राये दुर्दिने मेघसम्प्लुते ।। ४६ ।।

महत्यथापराह्ने तु घनैः सूर्य इवावृतः ।

ब्राह्मणैः प्राविशत् तत्र जिष्णुर्भार्गववेश्म तत् ।। ४७ ।।

इस प्रकार पुत्रस्नेहमें पगी कुन्तीदेवी जब चिन्तामें मग्न हो रही थीं, आकाशमें मेघोंकी

भारी घटा घिर आनेके कारण जब दुर्दिन-सा हो रहा था और जनता सब काम छोड़कर

सोये हुएकी भाँति अपने-अपने घरोंपर निश्चेष्ट होकर बैठी थी, उसी समय दिनके तीसरे

पहरमें बादलोंसे घिरे हुए सूर्यके समान ब्राह्मणमण्डलीसे घिरे हुए अर्जुनने वहाँ उस

कुम्हारके घरमें प्रवेश किया ।। ४६-४७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि पाण्डवप्रत्यागमने

एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें पाण्डवप्रत्यागमनविषयक एक

सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८९ ।।

FDFD O EDFD

१९०-

Page 1329Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

नवत्यधिकशततमोऽध्यायः

कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट

वैशम्पायन उवाच

गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां
पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ ।
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीतौ
भिक्षेत्यथावेदयतां नराग्र्यौ ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मनुष्योंमें श्रेष्ठ महानुभाव कुन्तीपुत्र भीमसेन और अर्जुन कुम्हारके घरमें प्रवेश करके अत्यन्त प्रसन्न हो माताको द्रौपदीकी प्राप्ति सूचित करते हुए बोले—'माँ! हमलोग भिक्षा लाये हैं' ॥ १ ॥

कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौ
प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ।
पश्चाच्च कुन्ती प्रसमीक्ष्य कृष्णां
कष्टं मया भाषितमित्युवाच ॥ २ ॥

उस समय कुन्तीदेवी कुटियाके भीतर थीं। उन्होंने अपने पुत्रोंको देखे बिना ही उत्तर दे दिया—'(भिक्षा लाये हो तो) तुम सभी भाई मिलकर उसे पाओ।' तत्पश्चात् द्रौपदीको देखकर कुन्तीने चिन्तित होकर कहा—'हाय! मेरे मुँहसे बड़ी अनुचित बात निकल गयी' ॥ २ ॥

साधर्मभीता परिचिन्तयन्ती
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीताम् ।
पाणौ गृहीत्वोपजगाम कुन्ती
युधिष्ठिरं वाक्यमुवाच चेदम् ॥ ३ ॥

कुन्तीदेवी अधर्मके भयसे बड़ी चिन्तामें पड़ गयीं; (परंतु मनोनुकूल पतिकी प्राप्तिसे) द्रौपदीके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। कुन्तीदेवी द्रौपदीका हाथ पकड़कर युधिष्ठिरके पास गयीं और उनसे उन्होंने यह बात कही— ॥ ३ ॥

कुन्त्युवाच

इयं तु कन्या द्रुपदस्य राज्ञः
तवानुजाभ्यां मयि संनिविष्टा ।

Page 1330Permalink

यथोचितं पुत्र मयापि चोक्तं
समेत्य भुङ्क्तेति नृप प्रमादात् ॥ ४ ॥
कुन्तीने कहा— बेटा! यह राजा द्रुपदकी कन्या द्रौपदी है। तुम्हारे छोटे भाई भीमसेन और अर्जुनने इसे भिक्षा कहकर मुझे समर्पित किया और मैंने भी (इसे देखे बिना ही) भूलसे (भिक्षा ही समझकर) अनुरूप उत्तर दे दिया—'तुम सब लोग मिलकर इसे पाओ' ॥ ४ ॥

मया कथं नानृतमुक्तमद्य
भवेत् कुरूणामृषभ ब्रवीहि ।
पाञ्चालराजस्य सुतामधर्मो
न चोपवर्तेत न विभ्रमेच्च ॥ ५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! बताओ, अब कैसे मेरी बात झूठी न हो? और क्या किया जाय, जिससे इस पांचालराज-कुमारी कृष्णाको न तो पाप लगे और न नीच योनियोंमें ही भटकना पड़े ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

स एवमुक्तो मतिमान् नृवीरो
मात्रा मुहूर्तं तु विचिन्त्य राजा ।
कुन्तीं समाश्वास्य कुरुप्रवीरो

Page 1331Permalink

धनंजयं वाक्यमिदं बभाषे ॥ ६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कुरुश्रेष्ठ नरवीर राजा युधिष्ठिर बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने माताकी यह बात सुनकर दो घड़ीतक (मन-ही-मन) कुछ विचार किया। फिर कुन्तीदेवीको भलीभाँति आश्वासन देकर उन्होंने धनंजयसे यह बात कही— ॥ ६ ॥ त्वया जिता फाल्गुन याज्ञसेनी त्वयैव शोभिष्यति राजपुत्री । प्रज्वाल्यतामग्निरमित्रसाह गृहाण पाणिं विधिवत् त्वमस्याः ॥ ७ ॥ ‘अर्जुन! तुमने द्रौपदीको जीता है, तुम्हारे ही साथ इस राजकुमारीकी शोभा होगी। शत्रुओंका सामना करनेवाले वीर! तुम अग्नि प्रज्वलित करो और (अग्निदेवके साक्ष्यमें) विधिपूर्वक इस राजकन्याका पाणिग्रहण करो’ ॥ ७ ॥

अर्जुन उवाच

मा मां नरेन्द्र त्वमधर्मभाजं कृथा न धर्मोऽयमशिष्टदृष्टः । भवान् निवेश्यः प्रथमं ततोऽयं भीमो महाबाहुरचिन्त्यकर्मा ॥ ८ ॥ अहं ततो नकुलोऽनन्तरं मे पश्चादयं सहदेवस्तरस्वी । वृकोदरोऽहं च यमौ च राज- न्नियं च कन्या भवतो नियोज्याः ॥ ९ ॥ **अर्जुन बोले—**नरेन्द्र! आप मुझे अधर्मका भागी न बनाइये। (बड़े भाईके अविवाहित रहते छोटे भाईका विवाह हो जाय,) यह धर्म नहीं है; ऐसा व्यवहार तो अनार्योंमें देखा गया है। पहले आपका विवाह होना चाहिये; तत्पश्चात् अचिन्त्यकर्मा महाबाहु भीमसेनका और फिर मेरा। तत्पश्चात् नकुल फिर वेगवान् सहदेव विवाह कर सकते हैं। राजन्! भैया भीमसेन, मैं नकुल-सहदेव तथा यह राजकन्या—सभी आपकी आज्ञाके अधीन हैं ॥ ८-९ ॥ एवं गते यत् करणीयमत्र धर्म्यं यशस्यं कुरु तद् विचिन्त्य । पाञ्चालराजस्य हितं च यत् स्यात् प्रशाधि सर्वे स्म वशे स्थितास्ते ॥ १० ॥ ऐसी दशामें आप यहाँ अपनी बुद्धिसे विचार करके जो धर्म और यशके अनुकूल तथा पांचालराजके लिये भी हितकर कार्य हो, वह कीजिये और उसके लिये हमें आज्ञा दीजिये।

Page 1332Permalink

हम सब लोग आपके अधीन हैं ।। १० ।।

वैशम्पायन उवाच

जिष्णोर्वचनमाज्ञाय भक्तिस्नेहसमन्वितम् ।
दृष्टिं निवेशयामासुः पाञ्चाल्यां पाण्डुनन्दनाः ।। ११ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**अर्जुनके ये भक्तिभाव तथा स्नेहसे भरे वचन सुननेके बाद समस्त पाण्डवोंने पांचालराजकुमारी द्रौपदीकी ओर देखा ।। ११ ।।
दृष्ट्वा ते तत्र पश्यन्तीं सर्वे कृष्णां यशस्विनीम् ।
सम्प्रेक्ष्यान्योन्यमासीना हृदयैस्तामधारयन् ।। १२ ।।
यशस्विनी कृष्णा भी उन सबको देख रही थी। वहाँ बैठे हुए पाण्डवोंने द्रौपदीको देखकर आपसमें भी एक-दूसरेपर दृष्टिपात किया और सबने अपने हृदयमें द्रुपदराजकुमारीको बसा लिया ।। १२ ।।
तेषां तु द्रौपदीं दृष्ट्वा सर्वेषाममितौजसाम् ।
सम्प्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रादुरासीन्मनोभवः ।। १३ ।।
द्रुपदकुमारीपर दृष्टि पड़ते ही उन सभी अमिततेजस्वी पाण्डुपुत्रोंकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मथकर मन्मथ प्रकट हो गया ।। १३ ।।
काम्यं हि रूपं पाञ्चाल्या विधात्रा विहितं स्वयं ।
बभूवाधिकमन्याभ्यः सर्वभूतमनोहरम् ।। १४ ।।
विधाताने पांचालीका कमनीय रूप स्वयं ही रचा और सँवारा था। वह संसारकी अन्य स्त्रियोंसे बहुत अधिक आकर्षक और समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेनेवाला था ।। १४ ।।
तेषामाकारभावज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
द्वैपायनवचः कृत्स्नं सस्मार मनुजर्षभः ।। १५ ।।
मनुष्योंमें श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने उनकी आकृति देखकर ही उनके मनका भाव समझ लिया। फिर उन्हें द्वैपायन वेदव्यासजीके सारे वचनोंका स्मरण हो आया ।। १५ ।।
अब्रवीत् सहितान् भ्रातॄन् मिथोभेदभयान्नृपः ।
सर्वेषां द्रौपदी भार्या भविष्यति हि नः शुभा ।। १६ ।।
द्रौपदीको लेकर हम सब भाइयोंमें फूट ना पड़ जाय, इस भयसे राजाने अपने सभी बन्धुओंसे कहा—‘कल्याणमयी द्रौपदी हम सब लोगोंकी पत्नी होगी’ ।। १६ ।।

वैशम्पायन उवाच

भ्रातुर्वचस्तत् प्रसमीक्ष्य सर्वे
ज्येष्ठस्य पाण्डोस्तनयास्तदानीम् ।
तमेवार्थं ध्यायमाना मनोभिः
सर्वे च ते तस्थुरदीनसत्त्वाः ।। १७ ।।

Page 1333Permalink

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय अपने बड़े भाईका यह वचन सुनकर उदार हृदयवाले समस्त पाण्डव मन-ही-मन उसीका चिन्तन करते हुए चुपचाप बैठे रह गये ।। १७ ।।
वृष्णिप्रवीरस्तु कुरुप्रवीरा-
नाशंसमानः सहरौहिणेयः ।
जगाम तां भार्गवकर्मशालां
यत्रासते ते पुरुषप्रवीराः ॥ १८ ॥
इधर वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण रोहिणीनन्दन बलरामजीके साथ कुरुकुलके प्रमुख वीर पाण्डवोंको पहचानकर कुम्हारके घरमें, जहाँ वे नरश्रेष्ठ निवास करते थे, मिलनेके लिये गये ।। १८ ।।
तत्रोपविष्टं पृथुदीर्घबाहुं
ददर्श कृष्णः सहरौहिणेयः ।
अजातशत्रुं परिवार्य तांश्चा-
प्युपोपविष्टाञ्ज्वलनप्रकाशान् ॥ १९ ॥
वहाँ बलरामसहित श्रीकृष्णने मोटी और विशाल भुजाओंसे सुशोभित अजातशत्रु युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर बैठे हुए अग्निके समान तेजस्वी अन्य चारों भाइयोंको देखा ।। १९ ।।
ततोऽब्रवीद् वासुदेवोऽभिगम्य
कुन्तीसुतं धर्मभृतां वरिष्ठम् ।
कृष्णोऽहमस्मीति निपीड्य पादौ
युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ॥ २० ॥
वहाँ जाकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे 'मैं श्रीकृष्ण हूँ' यों कहकर अजमीढवंशी राजा युधिष्ठिरके दोनों चरणोंका स्पर्श किया ।। २० ।।
तथैव तस्याप्यनु रौहिणेय-
स्तौ चापि हृष्टाः कुरवोऽभ्यनन्दन् ।
पितृष्वसुश्चापि यदुप्रवीरा-
वगृह्णतां भारतमुख्य पादौ ॥ २१ ॥
उन्हींके साथ उसी प्रकार बलरामजीने भी (अपना नाम बताकर) उनके चरण छूए। पाण्डव भी उन दोनोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए। जनमेजय! फिर उन यदुवीरोंने अपनी बूआ कुन्तीके भी चरणोंका स्पर्श किया ।। २१ ।।
अजातशत्रुश्च कुरुप्रवीरः
पप्रच्छ कृष्णं कुशलं विलोक्य ।

Page 1334Permalink

कथं वयं वासुदेव त्वयेह
गूढा वसन्तो विदिताश्च सर्वे ॥ २२ ॥

कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर अजातशत्रु युधिष्ठिरने श्रीकृष्णको देखकर कुशल-समाचार पूछा और कहा—'वसुदेवनन्दन! हम तो यहाँ छिपकर रहते हैं, फिर आपने हम सब लोगोंको कैसे पहचान लिया?' ॥ २२ ॥

तमब्रवीद् वासुदेवः प्रहस्य
गूढोऽप्यग्निज्ञायित एव राजन् ।
तं विक्रमं पाण्डवेयानतीत्य
कोऽन्यः कर्ता विद्यते मानुषेषु ॥ २३ ॥

तब भगवान् वासुदेवने हँसकर उत्तर दिया—'राजन्! आग कितनी ही छिपी क्यों न हो, वह पहचानमें आ ही जाती है। भला, पाण्डवोंको छोड़कर मनुष्योंमें कौन ऐसा है, जो वैसा अद्भुत कर्म कर दिखाता ॥ २३ ॥

दिष्ट्या सर्वे पावकाद् विप्रमुक्ता
यूयं घोरात् पाण्डवाः शत्रुसाहाः ।
दिष्ट्या पापो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः
सहामात्यो न सकामोऽभविष्यत् ॥ २४ ॥

Page 1335Permalink

'बड़े सौभाग्यकी बात है कि शत्रुओंका सामना करनेकी शक्ति रखनेवाले आप सभी पाण्डव उस भयंकर अग्निकाण्डसे जीवित बच गये। पापी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अपने मन्त्रियोंसहित इस षड्यन्त्रमें सफल न हो सका, यह भी सौभाग्यकी ही बात है ॥ २४ ॥

भद्रं वोऽस्तु निहितं यद् गुहायां विवर्धध्वं ज्वलना इवैधमानाः । मा वो विदुः पार्थिवाः केचिदेव यास्यावहे शिबिरायैव तावत् ॥ सोऽनुज्ञातः पाण्डवेनाव्ययश्रीः प्रायाच्छीघ्रं बलदेवेन सार्धम् ॥ २५ ॥

'हमारे अन्तःकरणमें जो कल्याणकी भावना निहित है, वह आपको प्राप्त हो। आपलोग सदा प्रज्वलित अग्निकी भाँति बढ़ते रहें। अभी आपलोगोंको कोई भी राजा पहचान न सकें, इसलिये हमलोग भी अपने शिविरको ही लौट जायँगे।' यों कहकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले अक्षय शोभासे सम्पन्न भगवान् श्रीकृष्ण बलदेवजीके साथ शीघ्र वहाँसे चल दिये ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि रामकृष्णगमने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें बलराम और श्रीकृष्णका आगमनविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९० ॥

१९१-

Page 1336Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

धृष्टद्युम्नका गुप्तरूपसे वहाँका सब हाल देखकर राजा द्रुपदके पास आना तथा द्रौपदीके विषयमें द्रुपदका प्रश्न

वैशम्पायन उवाच

धृष्टद्युम्नस्तु पाञ्चाल्यः पृष्ठतः कुरुनन्दनौ ।
अन्वगच्छत् तदा यान्तौ भार्गवस्य निवेशने ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब कुरु-नन्दन भीमसेन और अर्जुन कुम्हारके घर जा रहे थे, उसी समय पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न गुप्तरूपसे उनके पीछे लग गये ॥ १ ॥

सोऽज्ञायमानः पुरुषानवधाय समन्ततः ।
स्वयमारात्निलीनोऽभूद् भार्गवस्य निवेशने ॥ २ ॥
उन्होंने चारों ओर अपने सेवकोंको बैठा दिया और स्वयं भी अज्ञातरूपसे कुम्हारके घरके पास ही छिपे रहे ॥ २ ॥

सायं च भीमस्तु रिपुप्रमाथी
जिष्णुर्यमौ चापि महानुभावौ ।
भैक्षं चरित्वा तु युधिष्ठिराय
निवेदयाञ्चक्रुरदीनसत्त्वाः ॥ ३ ॥
सायंकाल होनेपर शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले भीमसेन, अर्जुन और महानुभाव नकुल-सहदेवने भिक्षा लाकर युधिष्ठिरको निवेदन की। इन सबका अन्तःकरण उदार था ॥ ३ ॥

ततस्तु कुन्ती द्रुपदात्मजां ता-
मुवाच काले वचनं वदान्या ।
त्वमग्रमादाय कुरुष्व भद्रे
बलिं च विप्राय च देहि भिक्षाम् ॥ ४ ॥
तब उदारहृदया कुन्तीने उस समय द्रौपदीसे कहा—‘भद्रे! तुम भोजनका प्रथम भाग लेकर उससे देवताओंको बलि अर्पण करो तथा ब्राह्मणको भिक्षा दो ॥ ४ ॥

ये चान्नमिच्छन्ति ददस्व तेभ्यः
परिश्रिता ये परितो मनुष्याः ।
ततश्च शेषं प्रविभज्य शीघ्र-
मर्धं चतुर्धा मम चात्मनश्च ॥ ५ ॥

Page 1337Permalink

'तथा अपने आस-पास जो दूसरे मनुष्य आश्रितभावसे रहते और भोजन चाहते हैं, उन्हें भी अन्न परोसो। तदनन्तर जो शेष बच जाय, उसके शीघ्र ही इस प्रकार विभाग करो। अन्नका आधा भाग एकके लिये रखो, फिर शेषके छ: भाग करके चार भाइयोंके लिये चार भाग अलग-अलग रख दो, उसके बाद मेरे लिये और अपने लिये भी एक-एक भाग पृथक्-पृथक् परोस दो ।। ५ ।।

अर्धं तु भीमाय च देहि भद्रे
य एष नागर्षभतुल्यरूपः ।
गौरो युवा संहननोपपन्न
एषो हि वीरो बहुभुक् सदैव ।। ६ ।।
'कल्याणी! ये जो गजराजके समान शरीरवाले हृष्ट-पुष्ट गोरे युवक बैठे हैं, इनका नाम भीम है, इन्हें अन्नका आधा भाग दे दो। वीरवर भीम सदासे ही अधिक भोजन करनेवाले हैं' ।। ६ ।।

सा हृष्टरूपेव तु राजपुत्री
तस्या वचः साधु विशङ्कमाना ।
यथावदुक्तं प्रचकार साध्वी
ते चापि सर्वे बुभुजुस्तदन्नम् ।। ७ ।।
सासकी आज्ञाका पालन करनेमें ही अपना कल्याण मानती हुई साध्वी राजकुमारी द्रौपदीने अत्यन्त प्रसन्न होकर कुन्तीदेवीने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही किया। सबने उस अन्नका भोजन किया ।। ७ ।।

कुशैस्तु भूमौ शयनं चकार
माद्रीपुत्रः सहदेवस्तरस्वी ।
यथा स्वकीयान्यजिनानि सर्वे
संस्तीर्य वीराः सुषुपुर्धरण्याम् ।। ८ ।।
तदनन्तर वेगवान् वीर माद्रीकुमार सहदेवने धरतीपर कुशकी शय्या बिछा दी। फिर समस्त पाण्डव वीर अपने-अपने मृगचर्म बिछाकर भूमिपर ही सोये ।। ८ ।।

अगस्त्यशास्तामभितो दिशं तु
शिरांसि तेषां कुरुसत्तमानाम् ।
कुन्ती पुरस्तात् तु बभूव तेषां
पादान्तरे चाथ बभूव कृष्णा ।। ९ ।।

अशेत भूमौ सह पाण्डुपुत्रैः
पादोपधानीव कृता कुशेषु ।
न तत्र दुःखं मनसापि तस्या
न चावमेने कुरुपुङ्गवांस्तान् ।। १० ।।

Page 1338Permalink

उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंके सिर दक्षिण दिशाकी ओर थे। कुन्ती उनके मस्तककी ओर और द्रौपदी पैरोंकी ओर पृथ्वीपर ही पाण्डवोंके साथ सोयी, मानो उन कुशासनोंपर वह उनके पैरोंकी तकिया बन गयी। वहाँ उस परिस्थितिमें रहकर भी द्रौपदीके मनमें तनिक भी दुःख नहीं हुआ और उसने उन कुरुश्रेष्ठ वीरोंका किंचिन्मात्र भी तिरस्कार नहीं किया॥ ९-१०॥

ते तत्र शूराः कथयाम्बभूवुः
कथा विचित्राः पृतनाधिकाराः।
अस्त्राणि दिव्यानि रथांश्च नागान्
खड्गान् गदाश्चापि परश्वधांश्च॥ ११॥

वे शूरवीर पाण्डव वहाँ सेनापतियोंके योग्य अद्भुत कथाएँ कहने लगे। उन्होंने नाना प्रकारके दिव्यास्त्रों, रथों, हाथियों, तलवारों, गदाओं और फरसोंके विषयमें भी चर्चाएँ कीं॥ ११॥

तेषां कथास्ताः परिकीर्त्यमानाः
पाञ्चालराजस्य सुतस्तदानीम्।
शुश्राव कृष्णां च तदा विषण्णां
ते चापि सर्वे ददृशुर्मनुष्याः॥ १२॥

उनकी कही हुई वे सभी बातें उस समय पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने सुनीं और उन सभी लोगोंने वहाँ सोयी हुई द्रौपदीको भी देखा॥ १२॥

धृष्टद्युम्नो राजपुत्रस्तु सर्वं
वृत्तं तेषां कथितं चैव रात्रौ।
सर्वं राज्ञे द्रुपदायाखिलेन
निवेदयिष्यंस्त्वरितो जगाम॥ १३॥

तदनन्तर राजकुमार धृष्टद्युम्न रातमें पाण्डवोंका इतिहास तथा उनकी कही हुई सारी बातें राजा द्रुपदको पूर्णरूपसे सुनानेके लिये बड़ी उतावलीके साथ राजभवनमें गये॥ १३॥

पाञ्चालराजस्तु विषण्णरूप-
स्तान् पाण्डवानप्रतिविन्दमानः।
धृष्टद्युम्नं पर्यपृच्छन्महात्मा
क्व सा गता केन नीता च कृष्णा॥ १४॥

पांचालराज द्रुपद पाण्डवोंका पता न पानेके कारण बहुत खिन्न थे। धृष्टद्युम्नके आनेपर महात्मा द्रुपदने उससे पूछा—'बेटा! मेरी पुत्री कृष्णा कहाँ गयी? कौन उसे ले गया?॥ १४॥

कच्चिन्न शूद्रेण न हीनजेन

Page 1339Permalink

वैश्येन वा करदेनोपपन्ना । कच्चित् पदं मूर्ध्नि न पङ्कदिग्धं कच्चिन्न माला पतिता श्मशाने ॥ १५ ॥

‘कहीं किसी शूद्रने अथवा नीच जातिके पुरुषद्वारा ऊँची जातिकी स्त्रीसे उत्पन्न मनुष्यने या कर देनेवाले वैश्यने तो मेरी पुत्रीको प्राप्त नहीं कर लिया? और इस प्रकार उन्होंने मेरे सिरपर अपना कीचड़से सना पाँव तो नहीं रख दिया? मालाके समान सुकुमारी और हृदयपर धारण करनेयोग्य मेरी लाडली पुत्री श्मशानके समान अपवित्र किसी पुरुषके हाथमें तो नहीं पड़ गयी? ॥ १५ ॥

कच्चित् सवर्णप्रवरो मनुष्य उद्रिक्तवर्णोऽप्युत एव कच्चित् । कच्चिन्न वामो मम मूर्ध्नि पादः कृष्णाभिमर्शेन कृतोऽद्य पुत्र ॥ १६ ॥

‘क्या द्रौपदीको पानेवाला मनुष्य अपने समान वर्ण (क्षत्रियकुल)-का ही कोई श्रेष्ठ पुरुष है? अथवा वह अपनेसे भी श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलका है?’ बेटा! मेरी कृष्णाका स्पर्श कर किसी निम्नवर्णवाले मनुष्यने आज मेरे मस्तकपर अपना बायाँ पैर तो नहीं रख दिया? ॥ १६ ॥

कच्चिन्न तप्स्ये परमप्रतीतः संयुज्य पार्थेन नरर्षभेण । वदस्व तत्त्वेन महानुभाव कोऽसौ विजेता दुहितुर्ममाद्य ॥ १७ ॥

‘क्या ऐसा सौभाग्य होगा कि मैं नरश्रेष्ठ अर्जुनसे द्रौपदीका विवाह करके अत्यन्त प्रसन्न होऊँ और कभी भी संतप्त न हो सकूँ? महानुभाव पुत्र! ठीक-ठीक बताओ, आज जिसने मेरी पुत्रीको जीता है, वह पुरुष कौन है? ॥ १७ ॥

विचित्रवीर्यस्य सुतस्य कच्चित् कुरुप्रवीरस्य ध्रियन्ति पुत्राः । कच्चित् तु पार्थेन यवीयसाद्य धनुर्गृहीतं निहतं च लक्ष्यम् ॥ १८ ॥

‘क्या कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर विचित्रवीर्यकुमार पाण्डुके शूरवीर पुत्र अभी जीवित हैं? क्या आज कुन्तीके सबसे छोटे पुत्र अर्जुनने ही उस धनुषको उठाया और लक्ष्यको मार गिराया था?’ ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि धृष्टद्युम्नप्रत्यागमने एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥

Page 1340Permalink

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें धृष्टद्युम्नका प्रत्यागमनविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९१ ॥