महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
जनताकी भीड़से बाहर निकलनेपर शत्रुओंने उन्हें अच्छी तरह देखा। आगे-आगे वे
दोनों नरवीर थे और उनके पीछे-पीछे द्रौपदी चली जा रही थी। द्रौपदीके साथ वहाँ उन
दोनोंकी बड़ी शोभा हो रही थी ।। ४२ ।।
पौर्णमास्यां घनैर्मुत्तौ चन्द्रसूर्याविवोदितौ ।
तेषां माता बहुविधं विनाशं पर्यचिन्तयत् ।। ४३ ।।
अनागच्छत्सु पुत्रेषु भैक्षकालेऽभिगच्छति ।
धार्तराष्ट्रैर्हता न स्युर्विज्ञाय कुरुपुङ्गवाः ।। ४४ ।।
मायान्वितैर्वा रक्षोभिः सुघोरैर्दृढवैरिभिः ।
विपरीतं मतं जातं व्यासस्यापि महात्मनः ।। ४५ ।।
वे ऐसे लगते थे, जैसे पूर्णमासी तिथिको मेघोंकी घटासे निकलकर चन्द्रमा और सूर्य
प्रकाशित हो रहे हों। इधर भिक्षाका समय बीत जानेपर भी जब पुत्र नहीं लौटे, तब उनकी
माता कुन्तीदेवी स्नेहवश अनेक प्रकारकी चिन्ताओंमें डूबकर उनके विनाशकी आशंका
करने लगीं— 'कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि धृतराष्ट्रके पुत्रोंने कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको पहचानकर
उनकी हत्या कर डाली हो? अथवा दृढ़तापूर्वक वैरभावको मनमें रखनेवाले महाभयंकर
मायावी राक्षसोंने तो मेरे बच्चोंको नहीं मार डाला? क्या महात्मा व्यासके भी निश्चित मतके
विपरीत कोई बात हो गयी?' ।। ४३-४५ ।।
इत्येवं चिन्तयामास सुतस्नेहावृता पृथा ।
ततः सुप्तजनप्राये दुर्दिने मेघसम्प्लुते ।। ४६ ।।
महत्यथापराह्ने तु घनैः सूर्य इवावृतः ।
ब्राह्मणैः प्राविशत् तत्र जिष्णुर्भार्गववेश्म तत् ।। ४७ ।।
इस प्रकार पुत्रस्नेहमें पगी कुन्तीदेवी जब चिन्तामें मग्न हो रही थीं, आकाशमें मेघोंकी
भारी घटा घिर आनेके कारण जब दुर्दिन-सा हो रहा था और जनता सब काम छोड़कर
सोये हुएकी भाँति अपने-अपने घरोंपर निश्चेष्ट होकर बैठी थी, उसी समय दिनके तीसरे
पहरमें बादलोंसे घिरे हुए सूर्यके समान ब्राह्मणमण्डलीसे घिरे हुए अर्जुनने वहाँ उस
कुम्हारके घरमें प्रवेश किया ।। ४६-४७ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि पाण्डवप्रत्यागमने
एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें पाण्डवप्रत्यागमनविषयक एक
सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८९ ।।
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१९०-
नवत्यधिकशततमोऽध्यायः
कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट
वैशम्पायन उवाच
गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां
पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ ।
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीतौ
भिक्षेत्यथावेदयतां नराग्र्यौ ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मनुष्योंमें श्रेष्ठ महानुभाव कुन्तीपुत्र भीमसेन और अर्जुन कुम्हारके घरमें प्रवेश करके अत्यन्त प्रसन्न हो माताको द्रौपदीकी प्राप्ति सूचित करते हुए बोले—'माँ! हमलोग भिक्षा लाये हैं' ॥ १ ॥
कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्रौ
प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे ।
पश्चाच्च कुन्ती प्रसमीक्ष्य कृष्णां
कष्टं मया भाषितमित्युवाच ॥ २ ॥
उस समय कुन्तीदेवी कुटियाके भीतर थीं। उन्होंने अपने पुत्रोंको देखे बिना ही उत्तर दे दिया—'(भिक्षा लाये हो तो) तुम सभी भाई मिलकर उसे पाओ।' तत्पश्चात् द्रौपदीको देखकर कुन्तीने चिन्तित होकर कहा—'हाय! मेरे मुँहसे बड़ी अनुचित बात निकल गयी' ॥ २ ॥
साधर्मभीता परिचिन्तयन्ती
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीताम् ।
पाणौ गृहीत्वोपजगाम कुन्ती
युधिष्ठिरं वाक्यमुवाच चेदम् ॥ ३ ॥
कुन्तीदेवी अधर्मके भयसे बड़ी चिन्तामें पड़ गयीं; (परंतु मनोनुकूल पतिकी प्राप्तिसे) द्रौपदीके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। कुन्तीदेवी द्रौपदीका हाथ पकड़कर युधिष्ठिरके पास गयीं और उनसे उन्होंने यह बात कही— ॥ ३ ॥
कुन्त्युवाच
इयं तु कन्या द्रुपदस्य राज्ञः
तवानुजाभ्यां मयि संनिविष्टा ।
यथोचितं पुत्र मयापि चोक्तं
समेत्य भुङ्क्तेति नृप प्रमादात् ॥ ४ ॥
कुन्तीने कहा— बेटा! यह राजा द्रुपदकी कन्या द्रौपदी है। तुम्हारे छोटे भाई भीमसेन और अर्जुनने इसे भिक्षा कहकर मुझे समर्पित किया और मैंने भी (इसे देखे बिना ही) भूलसे (भिक्षा ही समझकर) अनुरूप उत्तर दे दिया—'तुम सब लोग मिलकर इसे पाओ' ॥ ४ ॥
मया कथं नानृतमुक्तमद्य
भवेत् कुरूणामृषभ ब्रवीहि ।
पाञ्चालराजस्य सुतामधर्मो
न चोपवर्तेत न विभ्रमेच्च ॥ ५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! बताओ, अब कैसे मेरी बात झूठी न हो? और क्या किया जाय, जिससे इस पांचालराज-कुमारी कृष्णाको न तो पाप लगे और न नीच योनियोंमें ही भटकना पड़े ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
स एवमुक्तो मतिमान् नृवीरो
मात्रा मुहूर्तं तु विचिन्त्य राजा ।
कुन्तीं समाश्वास्य कुरुप्रवीरो
धनंजयं वाक्यमिदं बभाषे ॥ ६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कुरुश्रेष्ठ नरवीर राजा युधिष्ठिर बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने माताकी यह बात सुनकर दो घड़ीतक (मन-ही-मन) कुछ विचार किया। फिर कुन्तीदेवीको भलीभाँति आश्वासन देकर उन्होंने धनंजयसे यह बात कही— ॥ ६ ॥ त्वया जिता फाल्गुन याज्ञसेनी त्वयैव शोभिष्यति राजपुत्री । प्रज्वाल्यतामग्निरमित्रसाह गृहाण पाणिं विधिवत् त्वमस्याः ॥ ७ ॥ ‘अर्जुन! तुमने द्रौपदीको जीता है, तुम्हारे ही साथ इस राजकुमारीकी शोभा होगी। शत्रुओंका सामना करनेवाले वीर! तुम अग्नि प्रज्वलित करो और (अग्निदेवके साक्ष्यमें) विधिपूर्वक इस राजकन्याका पाणिग्रहण करो’ ॥ ७ ॥
अर्जुन उवाच
मा मां नरेन्द्र त्वमधर्मभाजं कृथा न धर्मोऽयमशिष्टदृष्टः । भवान् निवेश्यः प्रथमं ततोऽयं भीमो महाबाहुरचिन्त्यकर्मा ॥ ८ ॥ अहं ततो नकुलोऽनन्तरं मे पश्चादयं सहदेवस्तरस्वी । वृकोदरोऽहं च यमौ च राज- न्नियं च कन्या भवतो नियोज्याः ॥ ९ ॥ **अर्जुन बोले—**नरेन्द्र! आप मुझे अधर्मका भागी न बनाइये। (बड़े भाईके अविवाहित रहते छोटे भाईका विवाह हो जाय,) यह धर्म नहीं है; ऐसा व्यवहार तो अनार्योंमें देखा गया है। पहले आपका विवाह होना चाहिये; तत्पश्चात् अचिन्त्यकर्मा महाबाहु भीमसेनका और फिर मेरा। तत्पश्चात् नकुल फिर वेगवान् सहदेव विवाह कर सकते हैं। राजन्! भैया भीमसेन, मैं नकुल-सहदेव तथा यह राजकन्या—सभी आपकी आज्ञाके अधीन हैं ॥ ८-९ ॥ एवं गते यत् करणीयमत्र धर्म्यं यशस्यं कुरु तद् विचिन्त्य । पाञ्चालराजस्य हितं च यत् स्यात् प्रशाधि सर्वे स्म वशे स्थितास्ते ॥ १० ॥ ऐसी दशामें आप यहाँ अपनी बुद्धिसे विचार करके जो धर्म और यशके अनुकूल तथा पांचालराजके लिये भी हितकर कार्य हो, वह कीजिये और उसके लिये हमें आज्ञा दीजिये।
हम सब लोग आपके अधीन हैं ।। १० ।।
वैशम्पायन उवाच
जिष्णोर्वचनमाज्ञाय भक्तिस्नेहसमन्वितम् ।
दृष्टिं निवेशयामासुः पाञ्चाल्यां पाण्डुनन्दनाः ।। ११ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**अर्जुनके ये भक्तिभाव तथा स्नेहसे भरे वचन सुननेके बाद समस्त पाण्डवोंने पांचालराजकुमारी द्रौपदीकी ओर देखा ।। ११ ।।
दृष्ट्वा ते तत्र पश्यन्तीं सर्वे कृष्णां यशस्विनीम् ।
सम्प्रेक्ष्यान्योन्यमासीना हृदयैस्तामधारयन् ।। १२ ।।
यशस्विनी कृष्णा भी उन सबको देख रही थी। वहाँ बैठे हुए पाण्डवोंने द्रौपदीको देखकर आपसमें भी एक-दूसरेपर दृष्टिपात किया और सबने अपने हृदयमें द्रुपदराजकुमारीको बसा लिया ।। १२ ।।
तेषां तु द्रौपदीं दृष्ट्वा सर्वेषाममितौजसाम् ।
सम्प्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रादुरासीन्मनोभवः ।। १३ ।।
द्रुपदकुमारीपर दृष्टि पड़ते ही उन सभी अमिततेजस्वी पाण्डुपुत्रोंकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मथकर मन्मथ प्रकट हो गया ।। १३ ।।
काम्यं हि रूपं पाञ्चाल्या विधात्रा विहितं स्वयं ।
बभूवाधिकमन्याभ्यः सर्वभूतमनोहरम् ।। १४ ।।
विधाताने पांचालीका कमनीय रूप स्वयं ही रचा और सँवारा था। वह संसारकी अन्य स्त्रियोंसे बहुत अधिक आकर्षक और समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेनेवाला था ।। १४ ।।
तेषामाकारभावज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
द्वैपायनवचः कृत्स्नं सस्मार मनुजर्षभः ।। १५ ।।
मनुष्योंमें श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने उनकी आकृति देखकर ही उनके मनका भाव समझ लिया। फिर उन्हें द्वैपायन वेदव्यासजीके सारे वचनोंका स्मरण हो आया ।। १५ ।।
अब्रवीत् सहितान् भ्रातॄन् मिथोभेदभयान्नृपः ।
सर्वेषां द्रौपदी भार्या भविष्यति हि नः शुभा ।। १६ ।।
द्रौपदीको लेकर हम सब भाइयोंमें फूट ना पड़ जाय, इस भयसे राजाने अपने सभी बन्धुओंसे कहा—‘कल्याणमयी द्रौपदी हम सब लोगोंकी पत्नी होगी’ ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
भ्रातुर्वचस्तत् प्रसमीक्ष्य सर्वे
ज्येष्ठस्य पाण्डोस्तनयास्तदानीम् ।
तमेवार्थं ध्यायमाना मनोभिः
सर्वे च ते तस्थुरदीनसत्त्वाः ।। १७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय अपने बड़े भाईका यह वचन सुनकर उदार हृदयवाले समस्त पाण्डव मन-ही-मन उसीका चिन्तन करते हुए चुपचाप बैठे रह गये ।। १७ ।।
वृष्णिप्रवीरस्तु कुरुप्रवीरा-
नाशंसमानः सहरौहिणेयः ।
जगाम तां भार्गवकर्मशालां
यत्रासते ते पुरुषप्रवीराः ॥ १८ ॥
इधर वृष्णिवंशियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण रोहिणीनन्दन बलरामजीके साथ कुरुकुलके प्रमुख वीर पाण्डवोंको पहचानकर कुम्हारके घरमें, जहाँ वे नरश्रेष्ठ निवास करते थे, मिलनेके लिये गये ।। १८ ।।
तत्रोपविष्टं पृथुदीर्घबाहुं
ददर्श कृष्णः सहरौहिणेयः ।
अजातशत्रुं परिवार्य तांश्चा-
प्युपोपविष्टाञ्ज्वलनप्रकाशान् ॥ १९ ॥
वहाँ बलरामसहित श्रीकृष्णने मोटी और विशाल भुजाओंसे सुशोभित अजातशत्रु युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर बैठे हुए अग्निके समान तेजस्वी अन्य चारों भाइयोंको देखा ।। १९ ।।
ततोऽब्रवीद् वासुदेवोऽभिगम्य
कुन्तीसुतं धर्मभृतां वरिष्ठम् ।
कृष्णोऽहमस्मीति निपीड्य पादौ
युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ॥ २० ॥
वहाँ जाकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे 'मैं श्रीकृष्ण हूँ' यों कहकर अजमीढवंशी राजा युधिष्ठिरके दोनों चरणोंका स्पर्श किया ।। २० ।।
तथैव तस्याप्यनु रौहिणेय-
स्तौ चापि हृष्टाः कुरवोऽभ्यनन्दन् ।
पितृष्वसुश्चापि यदुप्रवीरा-
वगृह्णतां भारतमुख्य पादौ ॥ २१ ॥
उन्हींके साथ उसी प्रकार बलरामजीने भी (अपना नाम बताकर) उनके चरण छूए। पाण्डव भी उन दोनोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए। जनमेजय! फिर उन यदुवीरोंने अपनी बूआ कुन्तीके भी चरणोंका स्पर्श किया ।। २१ ।।
अजातशत्रुश्च कुरुप्रवीरः
पप्रच्छ कृष्णं कुशलं विलोक्य ।
कथं वयं वासुदेव त्वयेह
गूढा वसन्तो विदिताश्च सर्वे ॥ २२ ॥
कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर अजातशत्रु युधिष्ठिरने श्रीकृष्णको देखकर कुशल-समाचार पूछा और कहा—'वसुदेवनन्दन! हम तो यहाँ छिपकर रहते हैं, फिर आपने हम सब लोगोंको कैसे पहचान लिया?' ॥ २२ ॥
तमब्रवीद् वासुदेवः प्रहस्य
गूढोऽप्यग्निज्ञायित एव राजन् ।
तं विक्रमं पाण्डवेयानतीत्य
कोऽन्यः कर्ता विद्यते मानुषेषु ॥ २३ ॥
तब भगवान् वासुदेवने हँसकर उत्तर दिया—'राजन्! आग कितनी ही छिपी क्यों न हो, वह पहचानमें आ ही जाती है। भला, पाण्डवोंको छोड़कर मनुष्योंमें कौन ऐसा है, जो वैसा अद्भुत कर्म कर दिखाता ॥ २३ ॥
दिष्ट्या सर्वे पावकाद् विप्रमुक्ता
यूयं घोरात् पाण्डवाः शत्रुसाहाः ।
दिष्ट्या पापो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः
सहामात्यो न सकामोऽभविष्यत् ॥ २४ ॥
'बड़े सौभाग्यकी बात है कि शत्रुओंका सामना करनेकी शक्ति रखनेवाले आप सभी पाण्डव उस भयंकर अग्निकाण्डसे जीवित बच गये। पापी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अपने मन्त्रियोंसहित इस षड्यन्त्रमें सफल न हो सका, यह भी सौभाग्यकी ही बात है ॥ २४ ॥
भद्रं वोऽस्तु निहितं यद् गुहायां विवर्धध्वं ज्वलना इवैधमानाः । मा वो विदुः पार्थिवाः केचिदेव यास्यावहे शिबिरायैव तावत् ॥ सोऽनुज्ञातः पाण्डवेनाव्ययश्रीः प्रायाच्छीघ्रं बलदेवेन सार्धम् ॥ २५ ॥
'हमारे अन्तःकरणमें जो कल्याणकी भावना निहित है, वह आपको प्राप्त हो। आपलोग सदा प्रज्वलित अग्निकी भाँति बढ़ते रहें। अभी आपलोगोंको कोई भी राजा पहचान न सकें, इसलिये हमलोग भी अपने शिविरको ही लौट जायँगे।' यों कहकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले अक्षय शोभासे सम्पन्न भगवान् श्रीकृष्ण बलदेवजीके साथ शीघ्र वहाँसे चल दिये ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि रामकृष्णगमने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें बलराम और श्रीकृष्णका आगमनविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९० ॥
१९१-
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
धृष्टद्युम्नका गुप्तरूपसे वहाँका सब हाल देखकर राजा द्रुपदके पास आना तथा द्रौपदीके विषयमें द्रुपदका प्रश्न
वैशम्पायन उवाच
धृष्टद्युम्नस्तु पाञ्चाल्यः पृष्ठतः कुरुनन्दनौ ।
अन्वगच्छत् तदा यान्तौ भार्गवस्य निवेशने ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब कुरु-नन्दन भीमसेन और अर्जुन कुम्हारके घर जा रहे थे, उसी समय पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न गुप्तरूपसे उनके पीछे लग गये ॥ १ ॥
सोऽज्ञायमानः पुरुषानवधाय समन्ततः ।
स्वयमारात्निलीनोऽभूद् भार्गवस्य निवेशने ॥ २ ॥
उन्होंने चारों ओर अपने सेवकोंको बैठा दिया और स्वयं भी अज्ञातरूपसे कुम्हारके घरके पास ही छिपे रहे ॥ २ ॥
सायं च भीमस्तु रिपुप्रमाथी
जिष्णुर्यमौ चापि महानुभावौ ।
भैक्षं चरित्वा तु युधिष्ठिराय
निवेदयाञ्चक्रुरदीनसत्त्वाः ॥ ३ ॥
सायंकाल होनेपर शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले भीमसेन, अर्जुन और महानुभाव नकुल-सहदेवने भिक्षा लाकर युधिष्ठिरको निवेदन की। इन सबका अन्तःकरण उदार था ॥ ३ ॥
ततस्तु कुन्ती द्रुपदात्मजां ता-
मुवाच काले वचनं वदान्या ।
त्वमग्रमादाय कुरुष्व भद्रे
बलिं च विप्राय च देहि भिक्षाम् ॥ ४ ॥
तब उदारहृदया कुन्तीने उस समय द्रौपदीसे कहा—‘भद्रे! तुम भोजनका प्रथम भाग लेकर उससे देवताओंको बलि अर्पण करो तथा ब्राह्मणको भिक्षा दो ॥ ४ ॥
ये चान्नमिच्छन्ति ददस्व तेभ्यः
परिश्रिता ये परितो मनुष्याः ।
ततश्च शेषं प्रविभज्य शीघ्र-
मर्धं चतुर्धा मम चात्मनश्च ॥ ५ ॥
'तथा अपने आस-पास जो दूसरे मनुष्य आश्रितभावसे रहते और भोजन चाहते हैं, उन्हें भी अन्न परोसो। तदनन्तर जो शेष बच जाय, उसके शीघ्र ही इस प्रकार विभाग करो। अन्नका आधा भाग एकके लिये रखो, फिर शेषके छ: भाग करके चार भाइयोंके लिये चार भाग अलग-अलग रख दो, उसके बाद मेरे लिये और अपने लिये भी एक-एक भाग पृथक्-पृथक् परोस दो ।। ५ ।।
अर्धं तु भीमाय च देहि भद्रे
य एष नागर्षभतुल्यरूपः ।
गौरो युवा संहननोपपन्न
एषो हि वीरो बहुभुक् सदैव ।। ६ ।।
'कल्याणी! ये जो गजराजके समान शरीरवाले हृष्ट-पुष्ट गोरे युवक बैठे हैं, इनका नाम भीम है, इन्हें अन्नका आधा भाग दे दो। वीरवर भीम सदासे ही अधिक भोजन करनेवाले हैं' ।। ६ ।।
सा हृष्टरूपेव तु राजपुत्री
तस्या वचः साधु विशङ्कमाना ।
यथावदुक्तं प्रचकार साध्वी
ते चापि सर्वे बुभुजुस्तदन्नम् ।। ७ ।।
सासकी आज्ञाका पालन करनेमें ही अपना कल्याण मानती हुई साध्वी राजकुमारी द्रौपदीने अत्यन्त प्रसन्न होकर कुन्तीदेवीने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही किया। सबने उस अन्नका भोजन किया ।। ७ ।।
कुशैस्तु भूमौ शयनं चकार
माद्रीपुत्रः सहदेवस्तरस्वी ।
यथा स्वकीयान्यजिनानि सर्वे
संस्तीर्य वीराः सुषुपुर्धरण्याम् ।। ८ ।।
तदनन्तर वेगवान् वीर माद्रीकुमार सहदेवने धरतीपर कुशकी शय्या बिछा दी। फिर समस्त पाण्डव वीर अपने-अपने मृगचर्म बिछाकर भूमिपर ही सोये ।। ८ ।।
अगस्त्यशास्तामभितो दिशं तु
शिरांसि तेषां कुरुसत्तमानाम् ।
कुन्ती पुरस्तात् तु बभूव तेषां
पादान्तरे चाथ बभूव कृष्णा ।। ९ ।।
अशेत भूमौ सह पाण्डुपुत्रैः
पादोपधानीव कृता कुशेषु ।
न तत्र दुःखं मनसापि तस्या
न चावमेने कुरुपुङ्गवांस्तान् ।। १० ।।
उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंके सिर दक्षिण दिशाकी ओर थे। कुन्ती उनके मस्तककी ओर और द्रौपदी पैरोंकी ओर पृथ्वीपर ही पाण्डवोंके साथ सोयी, मानो उन कुशासनोंपर वह उनके पैरोंकी तकिया बन गयी। वहाँ उस परिस्थितिमें रहकर भी द्रौपदीके मनमें तनिक भी दुःख नहीं हुआ और उसने उन कुरुश्रेष्ठ वीरोंका किंचिन्मात्र भी तिरस्कार नहीं किया॥ ९-१०॥
ते तत्र शूराः कथयाम्बभूवुः
कथा विचित्राः पृतनाधिकाराः।
अस्त्राणि दिव्यानि रथांश्च नागान्
खड्गान् गदाश्चापि परश्वधांश्च॥ ११॥
वे शूरवीर पाण्डव वहाँ सेनापतियोंके योग्य अद्भुत कथाएँ कहने लगे। उन्होंने नाना प्रकारके दिव्यास्त्रों, रथों, हाथियों, तलवारों, गदाओं और फरसोंके विषयमें भी चर्चाएँ कीं॥ ११॥
तेषां कथास्ताः परिकीर्त्यमानाः
पाञ्चालराजस्य सुतस्तदानीम्।
शुश्राव कृष्णां च तदा विषण्णां
ते चापि सर्वे ददृशुर्मनुष्याः॥ १२॥
उनकी कही हुई वे सभी बातें उस समय पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने सुनीं और उन सभी लोगोंने वहाँ सोयी हुई द्रौपदीको भी देखा॥ १२॥
धृष्टद्युम्नो राजपुत्रस्तु सर्वं
वृत्तं तेषां कथितं चैव रात्रौ।
सर्वं राज्ञे द्रुपदायाखिलेन
निवेदयिष्यंस्त्वरितो जगाम॥ १३॥
तदनन्तर राजकुमार धृष्टद्युम्न रातमें पाण्डवोंका इतिहास तथा उनकी कही हुई सारी बातें राजा द्रुपदको पूर्णरूपसे सुनानेके लिये बड़ी उतावलीके साथ राजभवनमें गये॥ १३॥
पाञ्चालराजस्तु विषण्णरूप-
स्तान् पाण्डवानप्रतिविन्दमानः।
धृष्टद्युम्नं पर्यपृच्छन्महात्मा
क्व सा गता केन नीता च कृष्णा॥ १४॥
पांचालराज द्रुपद पाण्डवोंका पता न पानेके कारण बहुत खिन्न थे। धृष्टद्युम्नके आनेपर महात्मा द्रुपदने उससे पूछा—'बेटा! मेरी पुत्री कृष्णा कहाँ गयी? कौन उसे ले गया?॥ १४॥
कच्चिन्न शूद्रेण न हीनजेन
वैश्येन वा करदेनोपपन्ना । कच्चित् पदं मूर्ध्नि न पङ्कदिग्धं कच्चिन्न माला पतिता श्मशाने ॥ १५ ॥
‘कहीं किसी शूद्रने अथवा नीच जातिके पुरुषद्वारा ऊँची जातिकी स्त्रीसे उत्पन्न मनुष्यने या कर देनेवाले वैश्यने तो मेरी पुत्रीको प्राप्त नहीं कर लिया? और इस प्रकार उन्होंने मेरे सिरपर अपना कीचड़से सना पाँव तो नहीं रख दिया? मालाके समान सुकुमारी और हृदयपर धारण करनेयोग्य मेरी लाडली पुत्री श्मशानके समान अपवित्र किसी पुरुषके हाथमें तो नहीं पड़ गयी? ॥ १५ ॥
कच्चित् सवर्णप्रवरो मनुष्य उद्रिक्तवर्णोऽप्युत एव कच्चित् । कच्चिन्न वामो मम मूर्ध्नि पादः कृष्णाभिमर्शेन कृतोऽद्य पुत्र ॥ १६ ॥
‘क्या द्रौपदीको पानेवाला मनुष्य अपने समान वर्ण (क्षत्रियकुल)-का ही कोई श्रेष्ठ पुरुष है? अथवा वह अपनेसे भी श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलका है?’ बेटा! मेरी कृष्णाका स्पर्श कर किसी निम्नवर्णवाले मनुष्यने आज मेरे मस्तकपर अपना बायाँ पैर तो नहीं रख दिया? ॥ १६ ॥
कच्चिन्न तप्स्ये परमप्रतीतः संयुज्य पार्थेन नरर्षभेण । वदस्व तत्त्वेन महानुभाव कोऽसौ विजेता दुहितुर्ममाद्य ॥ १७ ॥
‘क्या ऐसा सौभाग्य होगा कि मैं नरश्रेष्ठ अर्जुनसे द्रौपदीका विवाह करके अत्यन्त प्रसन्न होऊँ और कभी भी संतप्त न हो सकूँ? महानुभाव पुत्र! ठीक-ठीक बताओ, आज जिसने मेरी पुत्रीको जीता है, वह पुरुष कौन है? ॥ १७ ॥
विचित्रवीर्यस्य सुतस्य कच्चित् कुरुप्रवीरस्य ध्रियन्ति पुत्राः । कच्चित् तु पार्थेन यवीयसाद्य धनुर्गृहीतं निहतं च लक्ष्यम् ॥ १८ ॥
‘क्या कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर विचित्रवीर्यकुमार पाण्डुके शूरवीर पुत्र अभी जीवित हैं? क्या आज कुन्तीके सबसे छोटे पुत्र अर्जुनने ही उस धनुषको उठाया और लक्ष्यको मार गिराया था?’ ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि धृष्टद्युम्नप्रत्यागमने एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें धृष्टद्युम्नका प्रत्यागमनविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९१ ॥
(वैवाहिकपर्व)
(वैवाहिकपर्व)
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
धृष्टद्युम्नके द्वारा द्रौपदी तथा पाण्डवोंका हाल सुनकर राजा द्रुपदका उनके पास पुरोहितको भेजना तथा पुरोहित और युधिष्ठिरकी बातचीत
वैशम्पायन उवाच
ततस्तथोक्तः परिहृष्टरूपः पित्रे शशंसार्थ स राजपुत्रः । धृष्टद्युम्नः सोमकानां प्रबर्हो वृत्तं यथा येन हृता च कृष्णा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर सोमकशिरोमणि राजकुमार धृष्टद्युम्न अत्यन्त हर्षमें भरकर वहाँ जो वृत्तान्त हुआ था एवं जो कृष्णाको ले गया, वह कौन था, वह सब समाचार कहने लगे ॥ १ ॥
धृष्टद्युम्न उवाच
योऽसौ युवा व्यायतलोहिताक्षः कृष्णाजिनी देवसमानरूपः । यः कार्मुकाग्र्यं कृतवानधिज्यं लक्ष्यं च यः पातितवान् पृथिव्याम् ॥ २ ॥ असज्जमानश्च ततस्तरस्वी वृतो द्विजाग्र्यैरभिपूज्यमानः । चक्राम वज्रीव दितेः सुतेषु सर्वैश्च देवै ऋषिभिश्च जुष्टः ॥ ३ ॥
धृष्टद्युम्न बोले— महाराज! जिन विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले, कृष्णमृगचर्मधारी तथा देवताके समान मनोहर रूपवाले तरुण वीरने श्रेष्ठ धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी और लक्ष्यको वेधकर पृथ्वीपर गिराया था, वे किसीका भी साथ न करके अकेले ही बड़े वेगसे आगे बढ़े। उस समय बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें घेरे हुए थे और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। सम्पूर्ण देवताओं तथा ऋषियोंसे सेवित देवराज इन्द्र जैसे दैत्योंकी सेनाके भीतर निःशंक
होकर विचरते हैं, उसी प्रकार वे नवयुवक वीर निर्भीक होकर राजाओंके बीचसे निकले ॥ २-३ ॥
कृष्णा प्रगृह्याजिनमन्वयात् तं
नागं यथा नागवधूः प्रहृष्टा ।
अमृष्यमाणेषु नराधिपेषु
क्रुद्धेषु वै तत्र समापतत्सु ॥ ४ ॥
ततोऽपरः पार्थिवसङ्घमध्ये
प्रवृद्धमारुज्य महीप्ररोहम् ।
प्रकालयन्नेव स पार्थिवौघान्
क्रुद्धोऽन्तकः प्राणभृतो यथैव ॥ ५ ॥
उस समय राजकुमारी कृष्णा अत्यन्त प्रसन्न हो उनका मृगचर्म थामकर ठीक उसी तरह उनके पीछे-पीछे जा रही थी, जैसे गजराजके पीछे हथिनी जा रही हो। यह देख राजा लोग सहन न कर सके और क्रोधमें भरकर युद्ध करनेके लिये उसपर चारों ओरसे टूट पड़े। तब एक दूसरा वीर बहुत बड़े वृक्षको उखाड़कर राजाओंकी उस मण्डलीमें कूद पड़ा और जैसे कोपमें भरे हुए यमराज समस्त प्राणियोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार वह उन नरेशोंको मानो कालके गालमें भेजने लगा ॥ ४-५ ॥
तौ पार्थिवानां मिषतां नरेन्द्र
कृष्णामुपादाय गतौ नराग्र्यौ ।
विभ्राजमानाविव चन्द्रसूर्यो
बाह्यां पुराद् भार्गवकर्मशालाम् ॥ ६ ॥
नरेन्द्र! चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाले वे दोनों नरश्रेष्ठ सब राजाओंके देखते-देखते द्रौपदीको साथ ले नगरसे बाहर कुम्हारके घरमें चले गये ॥ ६ ॥
तत्रोपविष्टार्चिरिवानलस्य
तेषां जनित्रीति मम प्रतर्कः ।
तथाविधैरेव नरप्रवीरै-
रुपोपविष्टैस्त्रिभिरग्निकल्पैः ॥ ७ ॥
उस घरमें अग्निशिखाके समान तेजस्विनी एक स्त्री बैठी हुई थीं। मेरा अनुमान है कि वे उन वीरोंकी माता रही होंगी। उनके आस-पास अग्नितुल्य तेजस्वी वैसे ही तीन श्रेष्ठ नरवीर और बैठे हुए थे ॥ ७ ॥
तस्यास्ततस्तावभिवाद्य पादौ
उक्ता च कृष्णा त्वभिवादयेति ।
स्थितां च तत्रैव निवेद्य कृष्णां
भिक्षाप्रचाराय गता नराग्र्याः ॥ ८ ॥
इन दोनों वीरोंने माताके चरणोंमें प्रणाम करके द्रौपदीसे भी उन्हें प्रणाम करनेके लिये कहा। प्रणाम करके वहीं खड़ी हुई कृष्णाको उन्होंने माताको सौंप दिया और स्वयं वे नरश्रेष्ठ वीर भिक्षा लानेके लिये चले गये ॥ ८ ॥
तेषां तु भैक्षं प्रतिगृह्य कृष्णा
दत्त्वा बलिं ब्राह्मणसाच्च कृत्वा ।
तां चैव वृद्धां परिवेष्य तांश्च
नरप्रवीरान् स्वयमप्यभुङ्क्त ॥ ९ ॥
जब वे लौटे तब उनकी भिक्षामें मिले हुए अन्नको लेकर (उनकी माताके आज्ञानुसार) द्रौपदीने देवताओंको बलि समर्पित की, ब्राह्मणोंको दिया और उन वृद्धा स्त्री तथा उन प्रमुख नरवीरोंको अलग-अलग भोजन परोसकर अन्तमें स्वयं भी बचे हुए अन्नको खाया ॥ ९ ॥
सुप्तास्तु ते पार्थिव सर्व एव
कृष्णा च तेषां चरणोपधाने ।
आसीत् पृथिव्यां शयनं च तेषां
दर्भाजिनाग्रास्तरणोपपन्नम् ॥ १० ॥
राजन्! भोजनके बाद वे सब सो गये। कृष्णा उनके पैरोंके समीप सोयी। धरतीपर ही उनकी शय्या बिछी थी। नीचे कुशकी चटाइयाँ थीं और ऊपर मृगचर्म बिछा हुआ था ॥ १० ॥
ते नर्दमाना इव कालमेघाः
कथा विचित्राः कथयाम्बभूवुः ।
न वैश्यशूद्रौपयिकीः कथास्ता
न च द्विजानां कथयन्ति वीराः ॥ ११ ॥
सोते समय वे वर्षाकालके मेघके समान गम्भीर गर्जना करते हुए आपसमें बड़ी विचित्र बातें करने लगे। वे पाँचों वीर जो बातें कह रहे थे, वे वैश्यों, शूद्रों तथा ब्राह्मणों-जैसी नहीं थीं ॥ ११ ॥
निःसंशयं क्षत्रियपुङ्गवास्ते
यथा हि युद्धं कथयन्ति राजन् ।
आशा हि नो व्यक्तमियं समृद्धा
मुक्तान् हि पार्थाञ्छृणुमोऽग्निदाहात् ॥ १२ ॥
राजन्! जिस प्रकार वे युद्धका वर्णन करते थे, उससे यह मान लेनेमें तनिक भी संदेह नहीं रह जाता कि वे लोग क्षत्रियशिरोमणि हैं। हमने सुना है, कुन्तीके पुत्र लाक्षागृहकी आगमें जलनेसे बच गये हैं। अतः हमारे मनमें जो पाण्डवोंसे सम्बन्ध करनेकी अभिलाषा थी, अवश्य वही सफल हुई जान पड़ती है ॥ १२ ॥
यथा हि लक्ष्यं निहतं धनुश्च सज्यं कृतं तेन तथा प्रसह्य । यथा हि भाषन्ति परस्परं ते छन्ना ध्रुवं ते प्रचरन्ति पार्थाः ॥ १३ ॥ जिस प्रकार उन्होंने धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ायी, जिस तरह दुर्भेद्य लक्ष्यको बेध गिराया और जिस प्रकार वे सभी भाई आपसमें बातें करते हैं, उससे यह निश्चय हो जाता है कि कुन्तीके पुत्र ही ब्राह्मणवेषमें छिपे हुए विचर रहे हैं ॥ १३ ॥
ततः स राजा द्रुपदः प्रहृष्टः पुरोहितं प्रेषयामास तेषाम् । विद्याम युष्मानिति भाषमाणो महात्मानः पाण्डुसुतास्तु कच्चित् ॥ १४ ॥ जनमेजय! इस समाचारसे राजा द्रुपदको बड़ी प्रसन्नता हुई, उन्होंने उसी समय उनके पास अपने पुरोहितको भेजते हुए कहा—'आप उन लोगोंसे कहियेगा कि मैं आपलोगोंका परिचय जानना चाहता हूँ। क्या आपलोग महात्मा पाण्डुके पुत्र हैं?' ॥ १४ ॥
गृहीतवाक्यो नृपतेः पुरोधा गत्वा प्रशंसामभिधाय तेषाम् । वाक्यं समग्रं नृपतेर्यथाव- दुवाच चानुक्रमविक्रमेण ॥ १५ ॥ राजाका अनुरोध मानकर पुरोहितजी गये और उन सबकी प्रशंसा करके राजा द्रुपदके वचनोंको ठीक-ठीक एकके बाद एक करके क्रमशः कहने लगे— ॥ १५ ॥
विज्ञातुमिच्छत्यवनीश्वरो वः पाञ्चालराजो वरदो वरार्हाः । लक्ष्यस्य वेद्धारमिमं हि दृष्ट्वा हर्षस्य नान्तं प्रतिपद्यते सः ॥ १६ ॥ 'वरदानके योग्य वीर पुरुषो! वर देनेमें समर्थ पांचालदेशके राजा द्रुपद आपलोगोंका परिचय जानना चाहते हैं। इन वीर पुरुषको लक्ष्यवेध करते देखकर उन्हें हर्षकी सीमा नहीं रह गयी है ॥ १६ ॥
आख्यात च ज्ञातिकुलानुपूर्वीं पदं शिरस्सु द्विषतां कुरुध्वम् । प्रह्लादयध्वं हृदयं ममेदं पाञ्चालराजस्य च सानुगस्य ॥ १७ ॥ 'आपलोग अपनी जाति और कुल आदिका यथावत् वर्णन करें, शत्रुओंके माथेपर पैर रखें और मेरे तथा अनुचरोंसहित पांचालराजके हृदयको आनन्द प्रदान करें ॥ १७ ॥
पाण्डुर्हि राजा द्रुपदस्य राज्ञः प्रियः सखा चात्मसमो बभूव । तस्यैष कामो दुहिता ममेयं स्नुषां प्रदास्यामि हि कौरवाय ॥ १८ ॥ ‘महाराज पाण्डु राजा द्रुपदके आत्माके समान प्रिय मित्र थे। इसलिये उनकी यह अभिलाषा थी कि मैं अपनी इस पुत्रीका विवाह पाण्डुकुमारसे करूँ। इसे राजा पाण्डुको पुत्रवधूके रूपमें समर्पित करूँ’ ॥ १८ ॥ अयं हि कामो द्रुपदस्य राज्ञो हृदि स्थितो नित्यमनिन्दिताङ्गाः । यदर्जुनो वै पृथुदीर्घबाहु- र्धर्मेण विन्देत सुतां ममैताम् ॥ १९ ॥ सर्वांगसुन्दर शूरवीरो! राजा द्रुपदके हृदयमें नित्य निरन्तर यह कामना रही है कि मोटी एवं विशाल भुजाओंवाले अर्जुन मेरी इस पुत्रीका धर्मपूर्वक पाणि-ग्रहण करें ॥ १९ ॥ कृतं हि तत् स्यात् सुकृतं ममेदं यशश्च पुण्यं च हितं तदेतत् । ‘उनका यह कहना है कि यदि मेरा यह मनोरथ पूर्ण हो जाय, तो मैं समझूँगा कि यह मेरे शुभ कर्मोंका फल प्राप्त हुआ है। यही मेरे लिये यश, पुण्य और हितकी बात होगी’ ॥ १९ १/२ ॥ अथोक्तवाक्यं हि पुरोहितं स्थितं ततो विनीतं समुदीक्ष्य राजा ॥ २० ॥ समीपतो भीममिदं शशास प्रदीयतां पाद्यमर्घ्यं तथास्मै । मान्यः पुरोधा द्रुपदस्य राज्ञ- स्तस्मै प्रयोज्याभ्यधिका हि पूजा ॥ २१ ॥ जब विनयशील पुरोहितजी यह बात कह चुके, तब राजा युधिष्ठिरने उनकी ओर देखकर पास बैठे हुए भीमसेनको यह आज्ञा दी कि ‘इन्हें पाद्य और अर्घ्य समर्पित करो। ये महाराज द्रुपदके माननीय पुरोहित हैं। अतः इनका हमें विशेष आदर-सत्कार करना चाहिये’ ॥ २०-२१ ॥ भीमस्ततस्तत् कृतवान् नरेन्द्र तां चैव पूजां प्रतिगृह्य हर्षात् । सुखोपविष्टं तु पुरोहितं तदा युधिष्ठिरो ब्राह्मणमित्युवाच ॥ २२ ॥
जनमेजय! तब भीमसेनने पाद्य, अर्घ्य निवेदन करके उनका विधिवत् पूजन किया। उनकी दी हुई पूजाको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करके पुरोहितजी जब बड़े सुखसे आसनपर बैठ गये, तब राजा युधिष्ठिरने उन ब्राह्मणदेवतासे इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
पाञ्चालराजेन सुता निसृष्टा स्वधर्मदृष्टेन यथा न कामात् । प्रदिष्टशुल्का द्रुपदेन राज्ञा सा तेन वीरेण तथानुवृत्ता ॥ २३ ॥ ‘ब्रह्मन्! पाञ्चालराज द्रुपदने यह कन्या अपनी इच्छासे नहीं दी है, उन्होंने अपने धर्मके अनुसार लक्ष्यवेधकी शर्त करके अपनी कन्या देनेका निश्चय किया था। उस वीर पुरुषने उसी शर्तको पूर्ण करके यह कन्या प्राप्त की है ॥ २३ ॥ न तत्र वर्णेषु कृता विवक्षा न चापि शीले न कुले न गोत्रे ॥ कृतेन सज्येन हि कार्मुकेण विद्धेन लक्ष्येण हि सा विसृष्टा ॥ २४ ॥ सेयं तथानेन महात्मनेह कृष्णा जिता पार्थिवसङ्घमध्ये ।
नैवंगते सौमकिरद्य राजा संतापमर्हत्यसुखाय कर्तुम् ॥ २५ ॥ ‘राजाने वहाँ वर्ण, शील, कुल और गोत्रके विषयमें कोई अभिप्राय नहीं व्यक्त किया था। धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर लक्ष्यवेध कर देनेपर ही कन्यादानकी घोषणा की थी। इस महात्मा वीरने उसी घोषणाके अनुसार राजाओंकी मण्डलीमें राजकुमारी कृष्णापर विजय पायी है। ऐसी दशामें सोमकवंशी राजा द्रुपदको अब सुखका अभाव करनेवाला संताप नहीं करना चाहिये ॥ २४-२५ ॥
कामश्च योऽसौ द्रुपदस्य राज्ञः स चापि सम्पत्स्यति पार्थिवस्य । सम्प्राप्यरूप्रां हि नरेन्द्रकन्या- मिमामहं ब्राह्मण साधु मन्ये ॥ २६ ॥ ‘ब्राह्मण! राजा द्रुपदकी जो पहलेकी अभिलाषा है, वह भी पूरी होगी। इस राजकन्याको हम सर्वथा ग्रहण करनेयोग्य एवं उत्तम मानते हैं ॥ २६ ॥
न तद् धनुर्मन्दबलेन शक्यं मौर्व्या समायोजयितुं तथा हि । न चाकृतास्त्रेण न हीनजेन लक्ष्यं तथा पातयितुं हि शक्यम् ॥ २७ ॥ ‘कोई बलहीन पुरुष उस विशाल धनुषपर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सकता था। जिसने अस्त्रविद्याकी पूर्ण शिक्षा न पायी हो, ऐसे पुरुषके अथवा किसी नीच कुलके मनुष्यके लिये भी उस लक्ष्यको गिराना असम्भव था ॥ २७ ॥
तस्मान्न तापं दुहितुर्निमित्तं पाञ्चालराजोऽर्हति कर्तुमद्य । न चापि तत्पातनमन्यथेह कर्तुं हि शक्यं भुवि मानवेन ॥ २८ ॥ ‘अतः पांचालराजको अब अपनी पुत्रीके लिये पश्चात्ताप करना उचित नहीं है। इस पृथ्वीपर उस वीरके सिवा ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जो उस लक्ष्यको वेध सके’ ॥ २८ ॥
एवं ब्रुवत्येव युधिष्ठिरे तु पाञ्चालराजस्य समीपतोऽन्यः । तत्राजगामाशु नरो द्वितीयो निवेदयिष्यन्निह सिद्धमन्नम् ॥ २९ ॥ राजा युधिष्ठिर यों कह ही रहे थे कि पांचालराज द्रुपदके पाससे एक दूसरा मनुष्य यह समाचार देनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आया कि ‘राजभवनमें आपलोगोंके लिये भोजन तैयार है’ ॥ २९ ॥