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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages
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‘पृथ्वीपर असुरोंका वध करना देवताओंका कार्य है और वह हम सबके लिये करनेयोग्य है। अतः उस कार्यकी सिद्धिके लिये यह वर्चा भी वहाँ अवश्य जायगा। परंतु दीर्घकालतक वहाँ नहीं रह सकेगा ॥ ११५ ॥

ऐन्द्रिर्नरस्तु भविता यस्य नारायणः सखा ।
सोऽर्जुनेत्यभिविख्यातः पाण्डोः पुत्रः प्रतापवान् ॥ ११६ ॥
‘भगवान् नर, जिनके सखा भगवान् नारायण हैं, इन्द्रके अंशसे भूतलमें अवतीर्ण होंगे। वहाँ उनका नाम अर्जुन होगा और वे पाण्डुके प्रतापी पुत्र माने जायँगे ॥ ११६ ॥

तस्यायं भविता पुत्रो बालो भुवि महारथः ।
ततः षोडश वर्षाणि स्थास्यत्यमरसत्तमाः ॥ ११७ ॥
‘श्रेष्ठ देवगण! पृथ्वीपर यह वर्चा उन्हीं अर्जुनका पुत्र होगा, जो बाल्यावस्थामें ही महारथी माना जायगा। जन्म लेनेके बाद सोलह वर्षकी अवस्थातक यह वहाँ रहेगा ॥ ११७ ॥

अस्य षोडशवर्षस्य स संग्रामो भविष्यति ।
यत्रांशा वः करिष्यन्ति कर्म वीरनिषूदनम् ॥ ११८ ॥
‘इसके सोलहवें वर्षमें वह महाभारत-युद्ध होगा, जिसमें आपलोगोंके अंशसे उत्पन्न हुए वीर-पुरुष शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला अद्भुत पराक्रम कर दिखायेंगे ॥ ११८ ॥

नरनारायणाभ्यां तु स संग्रामो विना कृतः ।
चक्रव्यूहं समास्थाय योध्यिष्यन्ति वः सुराः ॥ ११९ ॥
विमुखाञ्छात्रवान् सर्वान् कारयिष्यति मे सुतः ।
बालः प्रविश्य च व्यूहमभेद्यं विचरिष्यति ॥ १२० ॥
‘देवताओ! एक दिन जब कि उस युद्धमें नर और नारायण (अर्जुन और श्रीकृष्ण) उपस्थित न रहेंगे, उस समय शत्रुपक्षके लोग चक्रव्यूहकी रचना करके आप-लोगोंके साथ युद्ध करेंगे। उस युद्धमें मेरा यह पुत्र समस्त शत्रु-सैनिकोंको युद्धसे मार भगायेगा और बालक होनेपर भी उस अभेद्य व्यूहमें घुसकर निर्भय विचरण करेगा ॥ ११९-१२० ॥

महारथानां वीराणां कदनं च करिष्यति ।
सर्वेषामेव शत्रूणां चतुर्थांशं नयिष्यति ॥ १२१ ॥
दिनार्धेन महाबाहुः प्रेतराजपुरं प्रति ।
ततो महारथैर्वीरैः समेत्य बहुशो रणे ॥ १२२ ॥
दिनक्षये महाबाहुर्मया भूयः समेष्यति ।
एकं वंशकरं पुत्रं वीरं वै जनयिष्यति ॥ १२३ ॥
प्रणष्टं भारतं वंशं स भूयो धारयिष्यति ।
एतत् सोमवचः श्रुत्वा तथास्त्विति दिवौकसः ॥ १२४ ॥
प्रत्यूचुः सहिताः सर्वे ताराधिपमपूजयन् ।

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एवं ते कथितं राजंस्तव जन्म पितुः पितुः ॥ १२५ ॥ ‘तथा बड़े-बड़े महारथी वीरोंका संहार कर डालेगा। आधे दिनमें ही महाबाहु अभिमन्यु समस्त शत्रुओंके एक चौथाई भागको यमलोक पहुँचा देगा। तदनन्तर बहुत-से महारथी एक साथ ही उसपर टूट पड़ेंगे और वह महाबाहु उन सबका सामना करते हुए संध्या होते-होते पुनः मुझसे आ मिलेगा। वह एक ही वंशप्रवर्तक वीर पुत्रको जन्म देगा, जो नष्ट हुए भरतकुलको पुनः धारण करेगा।’ सोमका यह वचन सुनकर समस्त देवताओंने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी बात मान ली और सबने चन्द्रमाका पूजन किया। राजा जनमेजय! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पिताके पिताका जन्म-रहस्य बताया है ॥ १२१—१२५ ॥

अग्नेर्भागं तु विद्धि त्वं धृष्टद्युम्नं महारथम्।
शिखण्डिनमथो राजन् स्त्रीपूर्वं विद्धि राक्षसम् ॥ १२६ ॥
महाराज! महारथी धृष्टद्युम्नको तुम अग्निका भाग समझो। शिखण्डी राक्षसके अंशसे उत्पन्न हुआ था। वह पहले कन्यारूपमें उत्पन्न होकर पुनः पुरुष हो गया था ॥ १२६ ॥

द्रौपदेयाश्च ये पञ्च बभूवुर्भरतर्षभ।
विश्वान् देवगणान् विद्धि संजातान् भरतर्षभ ॥ १२७ ॥
भरतर्षभ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि द्रौपदीके जो पाँच पुत्र थे, उनके रूपमें पाँच विश्वेदेवगण ही प्रकट हुए थे ॥ १२७ ॥

प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः श्रुतकीर्तिस्तथापरः।
नाकुलिस्तु शतानीकः श्रुतसेनश्च वीर्यवान् ॥ १२८ ॥
उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ति, नकुलनन्दन शतानीक तथा पराक्रमी श्रुतसेन ॥ १२८ ॥

शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताभवत्।
तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणासदृशी भुवि ॥ १२९ ॥
वसुदेवजीके पिताका नाम था शूरसेन। वे यदुवंशके एक श्रेष्ठ पुरुष थे। उनके पृथा नामवाली एक कन्या हुई, जिसके समान रूपवती स्त्री इस पृथ्वीपर दूसरी नहीं थी ॥ १२९ ॥

पितुः स्वस्रीयपुत्राय सोऽनपत्याय वीर्यवान्।
अग्रमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यस्य वै तदा ॥ १३० ॥
उग्रसेनके फुफेरे भाई कुन्तिभोज संतानहीन थे। पराक्रमी शूरसेनने पहले कभी उनके सामने यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं अपनी पहली संतान आपको दे दूँगा’ ॥ १३० ॥

अग्रजातेति तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षया।
अददात् कुन्तिभोजाय स तां दुहितरं तदा ॥ १३१ ॥
तदनन्तर सबसे पहले उनके यहाँ कन्या ही उत्पन्न हुई। शूरसेनने अनुग्रहकी इच्छासे राजा कुन्तिभोजको अपनी वह पुत्री पृथा प्रथम संतान होनेके कारण गोद दे दी ॥ १३१ ॥

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सा नियुक्ता पितुर्गृहे ब्राह्मणातिथिपूजने । उग्रं पर्यचरद् घोरं ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ १३२ ॥ निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः । तमुग्रं शंसितात्मानं सर्वयत्नैर्अतोषयत् ॥ १३३ ॥ पिताके घरपर रहते समय पृथाको ब्राह्मणों और अतिथियोंके स्वागत-सत्कारका कार्य सौंपा गया था। एक दिन उसने कठोर व्रतका पालन करनेवाले भयंकर क्रोधी तथा उग्र प्रकृतिवाले एक ब्राह्मण महर्षिकी, जो धर्मके विषयमें अपने निश्चयको छिपाये रखते थे और लोग जिन्हें दुर्वासाके नामसे जानते हैं, सेवा की। वे ऊपरसे तो उग्र स्वभावके थे, परंतु उनका हृदय महान् होनेके कारण सबके द्वारा प्रशंसित था। पृथाने पूरा प्रयत्न करके अपनी सेवाओंद्वारा मुनिको संतुष्ट किया ॥ १३२-१३३ ॥ तुष्टोऽभिचारसंयुक्तमाचचक्षे यथाविधि । उवाच चैनां भगवान् प्रीतोऽस्मि सुभगे तव ॥ १३४ ॥ भगवान् दुर्वासाने संतुष्ट होकर पृथाको प्रयोग-विधिसहित एक मन्त्रका विधिपूर्वक उपदेश किया और कहा—'सुभगे! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १३४ ॥ यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तस्य तस्य प्रसादात् त्वं देवि पुत्राञ्जनिष्यसि ॥ १३५ ॥ 'देवि! तुम इस मन्त्रद्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, उसी-उसीके कृपाप्रसादसे पुत्र उत्पन्न करोगी' ॥ १३५ ॥ एवमुक्ता च सा बाला तदा कौतूहलान्विता । कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ॥ १३६ ॥ दुर्वासाके ऐसा कहनेपर वह सती-साध्वी यशस्विनी बाला यद्यपि अभी कुमारी कन्या थी, तो भी कौतूहलवश उसने भगवान् सूर्यका आवाहन किया ॥ १३६ ॥ प्रकाशकर्ता भगवांस्तस्यां गर्भं दधौ तदा । अजीजनत् सुतं चास्यां सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥ १३७ ॥ तब सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश फैलानेवाले भगवान् सूर्यने कुन्तीके उदरमें गर्भ स्थापित किया और उस गर्भसे एक ऐसे पुत्रको जन्म दिया, जो समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था ॥ १३७ ॥ सकुण्डलं सकवचं देवगर्भश्रियान्वितम् । दिवाकरसमं दीप्त्या चारुसर्वाङ्गभूषितम् ॥ १३८ ॥ वह कुण्डल और कवचके साथ ही प्रकट हुआ था। देवताओंके बालकोंमें जो सहज कान्ति होती है, उसीसे वह सुशोभित था। अपने तेजसे वह सूर्यके समान जान पड़ता था। उसके सभी अंग मनोहर थे, जो उसके सम्पूर्ण शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १३८ ॥ निगूहमाना जातं वै बन्धुपक्षभयात् तदा ।

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उत्ससर्ज जले कुन्ती तं कुमारं यशस्विनम् ॥ १३९ ॥ उस समय कुन्तीने पिता-माता आदि बान्धव-पक्षके भयसे उस यशस्वी कुमारको छिपाकर एक पेटीमें रखकर जलमें छोड़ दिया ॥ १३९ ॥ तमुत्सृष्टं जले गर्भं राधाभर्ता महायशाः । राधायाः कल्पयामास पुत्रं सोऽधिरथस्तदा ॥ १४० ॥ जलमें छोड़े हुए उस बालकको राधाके पति महायशस्वी अधिरथ सूतने लेकर राधाकी गोदमें दे दिया और उसे राधाका पुत्र बना लिया ॥ १४० ॥ चक्रतुर्नामधेयं च तस्य बालस्य तावुभौ । दम्पती वसुषेणेति दिक्षु सर्वासु विश्रुतम् ॥ १४१ ॥ उन दोनों दम्पतिने उस बालकका नाम वसुषेण रखा। वह सम्पूर्ण दिशाओंमें भलीभाँति विख्यात था ॥ १४१ ॥ संवर्धमानो बलवान् सर्वास्त्रेषूत्तमोऽभवत् । वेदाङ्गानि च सर्वाणि जजाप जयतां वरः ॥ १४२ ॥ बड़ा होनेपर वह बलवान् बालक सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंको चलानेकी कलामें उत्तम हुआ। उस विजयी वीरने सम्पूर्ण वेदांगोंका अध्ययन कर लिया ॥ १४२ ॥ यस्मिन् काले जपन्नास्ते धीमान् सत्यपराक्रमः । नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत् तस्मिन् काले महात्मनः ॥ १४३ ॥ वसुषेण (कर्ण) बड़ा बुद्धिमान् और सत्यपराक्रमी था। जिस समय वह जपमें लगा होता, उस समय उस महात्माके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं थी, जिसे वह ब्राह्मणोंके माँगनेपर न दे डाले ॥ १४३ ॥ तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा पुत्रार्थे भूतभावनः । ययाचे कुण्डले वीरं कवचं च सहाङ्गजम् ॥ १४४ ॥ भूतभावन इन्द्रने अपने पुत्र अर्जुनके हितके लिये ब्राह्मणका रूप धारण करके वीर कर्णसे दोनों कुण्डल तथा उसके शरीरके साथ ही उत्पन्न हुआ कवच माँगा ॥ १४४ ॥ उत्कृत्य कर्णो ह्यददात् कवचं कुण्डले तथा । शक्तिं शक्रो ददौ तस्मै विस्मितश्चेदमब्रवीत् ॥ १४५ ॥ देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । यस्मिन् क्षेप्स्यसि दुर्धर्ष स एको न भविष्यति ॥ १४६ ॥ कर्णने अपने शरीरमें चिपके हुए कवच और कुण्डलोंको उधेड़कर दे दिया। इन्द्रने विस्मित होकर कर्णको एक शक्ति प्रदान की और कहा—'दुर्धर्ष वीर! तुम देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंमेंसे जिसपर भी इस शक्तिको चलाओगे, वह एक व्यक्ति निश्चय ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा' ॥ १४५-१४६ ॥ पुरा नाम च तस्यासीद् वसुषेण इति क्षितौ ।

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ततो वैकर्तनः कर्णः कर्मणा तेन सोऽभवत् ॥ १४७ ॥
पहले कर्णका नाम इस पृथ्वीपर वसुषेण था। फिर कवच और कुण्डल काटनेके कारण वह वैकर्तन नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १४७ ॥
आमुक्तकवचो वीरो यस्तु जज्ञे महायशाः ।
स कर्ण इति विख्यातः पृथायाः प्रथमः सुतः ॥ १४८ ॥
जो महायशस्वी वीर कवच धारण किये हुए ही उत्पन्न हुआ, वह पृथाका प्रथम पुत्र कर्ण नामसे ही सर्वत्र विख्यात था ॥ १४८ ॥
स तु सूतकुले वीरो ववृधे राजसत्तम ।
कर्णं नरवरश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥ १४९ ॥
महाराज! वह वीर सूतकुलमें पाला-पोसा जाकर बड़ा हुआ था। नरश्रेष्ठ कर्ण सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था ॥ १४९ ॥
दुर्योधनस्य सचिवं मित्रं शत्रुविनाशनम् ।
दिवाकरस्य तं विद्धि राजन्नंशमनुत्तमम् ॥ १५० ॥
वह दुर्योधनका मन्त्री और मित्र होनेके साथ ही उसके शत्रुओंका नाश करनेवाला था। राजन्! तुम कर्णको साक्षात् सूर्यदेवका सर्वोत्तम अंश जानो ॥ १५० ॥
यस्तु नारायणो नाम देवदेवः सनातनः ।
तस्यांशो मानुषेष्वासीद् वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १५१ ॥
देवताओंके भी देवता जो सनातन पुरुष भगवान् नारायण हैं, उन्हींके अंशस्वरूप प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए थे ॥ १५१ ॥
शेषस्यांशश्च नागस्य बलदेवो महाबलः ।
सनत्कुमारं प्रद्युम्नं विद्धि राजन् महौजसम् ॥ १५२ ॥
महाबली बलदेवजी शेषनागके अंश थे। राजन्! महातेजस्वी प्रद्युम्नको तुम सनत्कुमारका अंश जानो ॥ १५२ ॥
एवमन्ये मनुष्येन्द्रा बहवोंऽशा दिवौकसाम् ।
जज्ञिरे वसुदेवस्य कुले कुलविवर्धनाः ॥ १५३ ॥
इस प्रकार वसुदेवजीके कुलमें बहुत-से दूसरे-दूसरे नरेन्द्र उत्पन्न हुए, जो देवताओंके अंश थे। वे सभी अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले थे ॥ १५३ ॥
गणस्त्वप्सरसां यो वै मया राजन् प्रकीर्तितः ।
तस्य भागः क्षितौ जज्ञे नियोगाद् वासवस्य ह ॥ १५४ ॥
महाराज! मैंने अप्सराओंके जिस समुदायका वर्णन किया है, उसका अंश भी इन्द्रके आदेशसे इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ था ॥ १५४ ॥
तानि षोडश देवीनां सहस्राणि नराधिप ।
बभूवुर्मानुषे लोके वासुदेवपरिग्रहः ॥ १५५ ॥

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नरेश्वर! वे अप्सराएँ मनुष्यलोकमें सोलह हजार देवियोंके रूपमें उत्पन्न हुई थीं, जो सब-की-सब भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियाँ हुईं ।। १५५ ।। श्रियस्तु भागः संजज्ञे रत्यर्थं पृथिवीतले । भीष्मकस्य कुले साध्वी रुक्मिणी नाम नामतः ।। १५६ ।। नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करनेके लिये भूतलपर विदर्भराज भीष्मकके कुलमें सती-साध्वी रुक्मिणीदेवीके नामसे लक्ष्मीजीका ही अंश प्रकट हुआ था ।। १५६ ।। द्रौपदी त्वथ संजज्ञे शचीभागादनिन्दिता । द्रुपदस्य कुले कन्या वेदिमध्यादनिन्दिता ।। १५७ ।। सती-साध्वी द्रौपदी शचीके अंशसे उत्पन्न हुई थी। वह राजा द्रुपदके कुलमें यज्ञकी वेदीके मध्यभागसे एक अनिन्द्य सुन्दरी कुमारी कन्याके रूपमें प्रकट हुई थी ।। १५७ ।। नातिह्रस्वा न महती नीलोत्पलसुगन्धिनी । पद्मायताक्षी सुश्रोणी स्वसिताञ्चितमूर्धजा ।। १५८ ।। वह न तो बहुत छोटी थी और न बहुत बड़ी ही। उसके अंगोंसे नीलकमलकी सुगन्ध फैलती रहती थी। उसके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर और विशाल थे, नितम्बभाग बड़ा ही मनोहर था और उसके काले-काले घुँघराले बालोंका सौन्दर्य भी अद्भुत था ।। १५८ ।। सर्वलक्षणसम्पूर्णा वैदूर्यमणिसंनिभा । पञ्चानां पुरुषेन्द्राणां चित्तप्रमथनी रहः ।। १५९ ।। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा वैदूर्य मणिके समान कान्तिमती थी। एकान्तमें रहकर वह पाँचों पुरुषप्रवर पाण्डवोंके मनको मुग्ध किये रहती थी ।। १५९ ।। सिद्धिर्धृतिश्च ये देव्यौ पञ्चानां मातरौ तु ते । कुन्ती माद्री च जज्ञाते मतिस्तु सुबलात्मजा ।। १६० ।। सिद्धि और धृति नामवाली जो दो देवियाँ हैं, वे ही पाँचों पाण्डवोंकी दोनों माताओं—कुन्ती और माद्रीके रूपमें उत्पन्न हुई थीं। सुबल-नरेशकी पुत्री गान्धारीके रूपमें साक्षात् मतिदेवी ही प्रकट हुई थीं ।। १६० ।। इति देवासुराणां ते गन्धर्वाप्सरसां तथा । अंशावतरणं राजन् राक्षसानां च कीर्तितम् ।। १६१ ।। ये पृथिव्यां समुद्भूता राजानो युद्ध दुर्मदाः । महात्मानो यदूनां च ये जाता विपुले कुले ।। १६२ ।। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मया ते परिकीर्तिताः । धन्यं यशस्यं पुत्रीयमायुष्यं विजयावहम् । इदमंशावतरणं श्रोतव्यमनसूयता ।। १६३ ।।

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राजन्! इस प्रकार तुम्हें देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, अप्सराओं तथा राक्षसोंके अंशोंका अवतरण बताया गया। युद्धमें उन्मत्त रहनेवाले जो-जो राजा इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुए थे और जो-जो महात्मा क्षत्रिय यादवोंके विशाल कुलमें प्रकट हुए थे, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य जो भी रहे हैं, उन सबके स्वरूपका परिचय मैंने तुम्हें दे दिया है। मनुष्यको चाहिये कि वह दोष-दृष्टिका त्याग करके इस अंशावतरणके प्रसंगको सुने। यह धन, यश, पुत्र, आयु तथा विजयकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ १६१—१६३ ॥

अंशावतरणं श्रुत्वा देवगन्धर्वरक्षसाम् ।
प्रभवाप्ययवित् प्राज्ञो न कृच्छ्रेष्ववसीदति ॥ १६४ ॥

देवता, गन्धर्व तथा राक्षसोंके इस अंशावतरणको सुनकर विश्वकी उत्पत्ति और प्रलयके अधिष्ठान परमात्माके स्वरूपको जाननेवाला प्राज्ञ पुरुष बड़ी-बड़ी विपत्तियोंमें भी दुःखी नहीं होता ॥ १६४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अंशावतरणसमाप्तौ
सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अंशावतरणसमाप्तिविषयक सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥


* ‘अत्रि’ शब्दसे यहाँ सूर्यको ग्रहण किया गया है। नीलकण्ठने भी यही अर्थ लिया है।

राजा दुष्यन्तकी अद्भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन

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अष्टषष्टितमोऽध्यायः

राजा दुष्यन्तकी अद्भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन

जनमेजय उवाच

त्वत्तः श्रुतमिदं ब्रह्मन् देवदानवरक्षसाम् ।
अंशावतरणं सम्यग् गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥ १ ॥
जनमेजय बोले— ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे देवता, दानव, राक्षस, गन्धर्व तथा अप्सराओंके अंशावतरणका वर्णन अच्छी तरह सुन लिया ॥ १ ॥

इमं तु भूय इच्छामि कुरूणां वंशमादितः ।
कथ्यमानं त्वया विप्र विप्रर्षिगणसंनिधौ ॥ २ ॥
विप्रवर! अब इन ब्रह्मर्षियोंके समीप आपके द्वारा वर्णित कुरुवंशका वृत्तान्त पुनः आदिसे ही सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

पौरवाणां वंशकरो दुष्यन्तो नाम वीर्यवान् ।
पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता भरतसत्तम ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भरतवंशशिरोमणे! पूरुवंशका विस्तार करनेवाले एक राजा हो गये हैं, जिनका नाम था दुष्यन्त। वे महान् पराक्रमी तथा चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समूची पृथ्वीके पालक थे ॥ ३ ॥

चतुर्भागं भुवः कृत्स्नं यो भुङ्क्ते मनुजेश्वरः ।
समुद्रावरणांश्चापि देशान् स समितिंजयः ॥ ४ ॥
आम्लेच्छावधिकान् सर्वान् स भुङ्क्ते रिपुमर्दनः ।
रत्नाकरसमुद्रान्तांश्चातुर्वर्ण्यजनावृतान् ॥ ५ ॥
राजा दुष्यन्त पृथ्वीके चारों भागोंका तथा समुद्रसे आवृत सम्पूर्ण देशोंका भी पूर्णरूपसे पालन करते थे। उन्होंने अनेक युद्धोंमें विजय पायी थी। रत्नाकर समुद्रतक फैले हुए, चारों वर्णके लोगोंसे भरे-पूरे तथा म्लेच्छ देशकी सीमासे मिले-जुले सम्पूर्ण भूभागोंका वे शत्रुमर्दन नरेश अकेले ही शासन तथा संरक्षण करते थे ॥ ४-५ ॥

न वर्णसंकरकरो न कृष्याकरकृज्जनः ।
न पापकृत् कश्चिदासीत् तस्मिन् राजनि शासति ॥ ६ ॥
उस राजाके शासनकालमें कोई मनुष्य वर्णसंकर संतान उत्पन्न नहीं करता था; पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अनाज पैदा करती थी और सारी भूमि ही रत्नोंकी खान बनी हुई थी,

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इसलिये कोई भी खेती करने या रत्नोंकी खानका पता लगानेकी चेष्टा नहीं करता था। पाप करनेवाला तो उस राज्यमें कोई था ही नहीं।। ६ ।।
धर्मे रतिं सेवमाना धर्मार्थावभिपेदिरे ।
तदा नरा नरव्याघ्र तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥ ७ ॥
नासीच्चौरभयं तात न क्षुधाभयमण्वपि ।
नासीद् व्याधिभयं चापि तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥ ८ ॥
नरश्रेष्ठ! सभी लोग धर्ममें अनुराग रखते और उसीका सेवन करते थे। अतः धर्म और अर्थ दोनों ही उन्हें स्वतः प्राप्त हो जाते थे। तात! राजा दुष्यन्त जब इस देशके शासक थे, उस समय कहीं चोरोंका भय नहीं था। भूखका भय तो नाममात्रको भी नहीं था। इस देशपर दुष्यन्तके शासनकालमें रोग-व्याधिका डर तो बिलकुल ही नहीं रह गया था ।। ७-८ ।।
स्वधर्मे रेमिरे वर्णा दैवे कर्मणि निःस्पृहाः ।
तमाश्रित्य महीपालमासंश्चैवाकुतोभयाः ॥ ९ ॥
सब वर्णोंके लोग अपने-अपने धर्मके पालनमें रत रहते थे। देवाराधन आदि कर्मोंको निष्कामभावसे ही करते थे। राजा दुष्यन्तका आश्रय लेकर समस्त प्रजा निर्भय हो गयी थी ।। ९ ।।
कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि रसवन्ति च ।
सर्वरत्नसमृद्धा च मही पशुमती तथा ॥ १० ॥
मेघ समयपर पानी बरसाता और अनाज रसयुक्त होते थे। पृथ्वी सब प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न तथा पशु-धनसे परिपूर्ण थी ।। १० ।।
स्वकर्मनिरता विप्रा नानृतं तेषु विद्यते ।
स चाद्भुतमहावीर्यो वज्रसंहननो युवा ॥ ११ ॥
ब्राह्मण अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंमें तत्पर थे। उनमें झूठ एवं छल-कपट आदिका अभाव था। राजा दुष्यन्त स्वयं भी नवयुवक थे। उनका शरीर वज्रके सदृश दृढ़ था। वे अद्भुत एवं महान् पराक्रमसे सम्पन्न थे ।। ११ ।।
उद्यम्य मन्दरं दोर्भ्यां वहेत् सवनकाननम् ।
चतुष्पथगदायुद्धे सर्वप्रहरणेषु च ॥ १२ ॥
नागपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च बभूव परिनिष्ठितः ।
बले विष्णुसमश्चासीत् तेजसा भास्करोपमः ॥ १३ ॥
वे अपने दोनों हाथोंद्वारा उपवनों और काननोंसहित मन्दराचलको उठाकर ले जानेकी शक्ति रखते थे। गदायुद्धके प्रक्षेप¹, विक्षेप², परिक्षेप³, और अभिक्षेप४—इन चारों प्रकारोंमें कुशल तथा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्यामें अत्यन्त निपुण थे। घोड़े और हाथीकी पीठपर बैठनेकी कलामें वे अत्यन्त प्रवीण थे। बलमें भगवान् विष्णुके समान और तेजमें भगवान् सूर्यके सदृश थे ।। १२-१३ ।।

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अक्षोभ्यत्वेऽर्णवसमः सहिष्णुत्वे धरासमः ।
सम्मतः स महीपालः प्रसन्नपुरराष्ट्रवान् ।। १४ ।।
भूयो धर्मपरैर्भावैर्मुदितं जनमादिशत् ।। १५ ।।
वे समुद्रके समान अक्षोभ्य और पृथ्वीके समान सहनशील थे। महाराज दुष्यन्तका सर्वत्र सम्मान था। उनके नगर तथा राष्ट्रके लोग सदा प्रसन्न रहते थे। वे अत्यन्त धर्मयुक्त भावनासे सदा प्रसन्न रहनेवाली प्रजाका शासन करते थे ।। १४-१५ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने
अष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।।


१. दूरवर्ती शत्रुपर गदा फेंकना 'प्रक्षेप' कहलाता है। २. समीपवर्ती शत्रुपर गदाकी कोटिसे प्रहार करना 'विक्षेप' कहा गया है। ३. जब शत्रु बहुत हों तो सब ओर गदाको घुमाते हुए शत्रुओंपर उसका प्रहार करना 'परिक्षेप' है। ४. गदाके अग्रभागसे मारना 'अभिक्षेप' कहलाता है।

अध्याय (पृष्ठ 500)

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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

दुष्यन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना

जनमेजय उवाच

सम्भवं भरतस्याहं चरितं च महामतेः ।
शकुन्तलायाश्चोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
जनमेजय बोले— ब्रह्मन्! मैं परम बुद्धिमान् भरतकी उत्पत्ति और चरित्रको तथा शकुन्तलाकी उत्पत्तिके प्रसंगको भी यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

दुष्यन्तेन च वीरेण यथा प्राप्ता शकुन्तला ।
तं वै पुरुषसिंहस्य भगवन् विस्तारं त्वहम् ॥ २ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वज्ञ सर्वं मतिमतां वर ।
भगवन्! वीरवर दुष्यन्तने शकुन्तलाको कैसे प्राप्त किया? मैं पुरुषसिंह दुष्यन्तके उस चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। तत्त्वज्ञ मुने! आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। अतः ये सब बातें बताइये ॥ २ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

स कदाचिन्महाबाहुः प्रभूतबलवाहनः ॥ ३ ॥
वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृतः ।
बलेन चतुरङ्गेण वृतः परमवल्गुना ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत-से सैनिक और सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी-घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक गहन वनकी ओर चले ॥ ३-४ ॥

खड्गशक्तिधरैर्वीरैर्गदामुसलपाणिभिः ।
प्रासतोमरहस्तैश्च ययौ योधशतैर्वृतः ॥ ५ ॥
जब राजाने यात्रा की, उस समय खड्ग, शक्ति, गदा, मुसल, प्रास और तोमर हाथमें लिये सैकड़ों योद्धा उन्हें घेरे हुए थे ॥ ५ ॥

सिंहनादैश्च योधानां शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।
रथनेमिस्वनैश्चैव सनागवरबृंहितैः ॥ ६ ॥
नानायुधधरैश्चापि नानावेषधरैस्तथा ।
ह्रेषितस्वनमिश्रैश्च क्ष्वेडितास्फोटितस्वनैः ॥ ७ ॥
आसीत् किलकिलाशब्दस्तस्मिन् गच्छति पार्थिवे ।

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प्रासादवरशृङ्गस्थाः परया नृपशोभया ।। ८ ।। ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम् । शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् ।। ९ ।। महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी ।। ६—९ ।।

पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र वज्रपाणिं स्म मेनिरे । अयं स पुरुषव्याघ्रो रणे वसुपराक्रमः ।। १० ।। यस्य बाहुबलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृद्गणाः । वहाँ देखती हुई स्त्रियोंने उन्हें वज्रपाणि इन्द्रके समान समझा और आपसमें वे इस प्रकार बातें करने लगीं—'सखियो! देखो तो सही, ये ही वे पुरुषसिंह महाराज दुष्यन्त हैं, जो संग्रामभूमिमें वसुओंके समान पराक्रम दिखाते हैं, जिनके बाहुबलमें पड़कर शत्रुओंका अस्तित्व मिट जाता है' ।। १० १/२ ।।

इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ताः स्त्रियः प्रेम्णा नराधिपम् ।। ११ ।। तुष्टुवुः पुष्पवृष्टींश्च ससृजुस्तस्य मूर्धनि । तत्र तत्र च विप्रेन्द्रैः स्तूयमानः समन्ततः ।। १२ ।। ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। यत्र-तत्र खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति-प्रशंसा करते थे ।। ११-१२ ।।

निर्ययौ परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया । तं देवराजप्रतिमं मत्तवारणधुर्गतम् ।। १३ ।। द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे । ददृशुर्वर्धमानास्ते आशीर्भिश्श्च जयेन च ।। १४ ।। इस प्रकार महाराज वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नगरसे बाहर निकले। वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। मतवाले हाथीकी पीठपर बैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोंके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे ।। १३-१४ ।।

सुदूरमनुजग्मुस्तं पौरजानपदास्तथा ।

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न्यवर्तन्त ततः पश्चादनुज्ञाता नृपेण ह ॥ १५ ॥ नगर और जनपदके लोग बहुत दूरतक उनके पीछे-पीछे गये। फिर महाराजकी आज्ञा होनेपर लौट आये ॥ १५ ॥

सुपर्णप्रतिमेनाथ रथेन वसुधाधिपः । महीमापूरयामास घोषेण त्रिदिवं तथा ॥ १६ ॥ स गच्छन् ददृशे धीमान् नन्दनप्रतिमं वनम् । बिल्वार्कखदिराकीर्णं कपित्थधवसंकुलम् ॥ १७ ॥ उनका रथ गरुडके समान वेगशाली था। उसके द्वारा यात्रा करनेवाले नरेशने घरघराहटकी आवाजसे पृथ्वी और आकाशको गुँजा दिया। जाते-जाते बुद्धिमान् दुष्यन्तने एक नन्दनवनके समान मनोहर वन देखा, जो बेल, आक, खैर, कैथ और धव (बाकली) आदि वृक्षोंसे भरपूर था ॥ १६-१७ ॥

विषमं पर्वतस्रस्तैरश्मभिश्च समावृतम् । निर्जलं निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम् ॥ १८ ॥ पर्वतकी चोटीसे गिरे हुए बहुत-से शिला-खण्ड वहाँ इधर-उधर पड़े थे। ऊँची-नीची भूमिके कारण वह वन बड़ा दुर्गम जान पड़ता था। अनेक योजनतक फैले हुए उस वनमें कहीं जल या मनुष्यका पता नहीं चलता था ॥ १८ ॥

मृगसिंहैर्वृतं घोरैरन्यैश्चापि वनेचरैः । तद् वनं मनुजव्याघ्रः सभृत्यबलवाहनः ॥ १९ ॥ लोडयामास दुष्यन्तः सूदयन् विविधान् मृगान् । बाणगोचरसम्प्राप्तांस्तत्र व्याघ्रगणान् बहून् ॥ २० ॥ पातयामास दुष्यन्तो निर्बिभेद च सायकैः । दूरस्थान् सायकैः कांश्चिदभिनत् स नराधिपः ॥ २१ ॥ अभ्याशमागतांश्चान्यान् खड्गेन निरकृन्तत । कांश्चिदेणान् समाजघ्ने शक्त्या शक्तिमतां वरः ॥ २२ ॥ वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याघ्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया ॥ १९—२२ ॥

गदामण्डलतत्त्वज्ञश्चचारामितविक्रमः । तोमरैरसिभिश्चापि गदामुसलकम्पनैः ॥ २३ ॥

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चचार स विनिघ्नन् वै स्वैरचारान् वनद्विपान् । राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधैश्च समरप्रियैः ॥ २४ ॥ लोड्यमानं महारण्यं तत्यजुः स्म मृगाधिपाः । तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च ॥ २५ ॥ मृगयूथान्यथौत्सुक्याच्छब्दं चक्रुस्ततस्ततः । शुष्काश्चापि नदीर्गत्वा जलनैराश्यकर्शिताः ॥ २६ ॥ व्यायामक्लान्तहृदयाः पतन्ति स्म विचेतसः । क्षुत्पिपासापरीताश्च श्रान्ताश्च पतिता भुवि ॥ २७ ॥ असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अद्भुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े ॥ २३—२७ ॥ केचित् तत्र नरव्याघ्रैरभक्ष्यन्त बुभुक्षितैः । केचिदग्निमथोत्पाद्य संसाध्य च वनेचराः ॥ २८ ॥ भक्षयन्ति स्म मांसानि प्रकृत्य विधिवत् तदा । तत्र केचिद् गजा मत्ता बलिनः शस्त्रविक्षताः ॥ २९ ॥ संकोच्याग्रकरान् भीताः प्रद्रवन्ति स्म वेगिताः । शकृन्मूत्रं सृजन्तश्च क्षरन्तः शोणितं बहु ॥ ३० ॥ वहाँ कितने ही व्याघ्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान् और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे ॥ २८—३० ॥ वन्या गजवरास्तत्र ममृदुर्मनुजान् बहून् । तद् वनं बलमेघेन शरधारेण संवृतम् । व्यरोचत मृगाकीर्णं राज्ञा हतमृगाधिपम् ॥ ३१ ॥

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बड़े-बड़े जंगली हाथियोंने भी वहाँ भागते समय बहुत-से मनुष्योंको कुचल डाला। वहाँ बाणरूपी जलकी धारा बरसानेवाले सैन्यरूपी बादलोंने उस वनरूपी व्योमको सब ओरसे घेर लिया था। महाराज दुष्यन्तने जहाँके सिंहोंको मार डाला था, वह हिंसक पशुओंसे भरा हुआ वन बड़ी शोभा पा रहा था ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक
उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥

तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश

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⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्ततितमोऽध्यायः

तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

ततो मृगसहस्राणि हत्वा सबलवाहनः ।
राजा मृगप्रसङ्गेन वनमन्यद् विवेश ह ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर सेना और सवारियोंके साथ राजा दुष्यन्तने सहस्रों हिंसक पशुओंका वध करके एक हिंसक पशुका ही पीछा करते हुए दूसरे वनमें प्रवेश किया ॥ १ ॥

एक एवोत्तमबलः क्षुत्पिपासाश्रमान्वितः ।
स वनस्यान्तमासाद्य महच्छून्यं समासदत् ॥ २ ॥
उस समय उत्तम बलसे युक्त महाराज दुष्यन्त अकेले ही थे तथा भूख, प्यास और थकावटसे शिथिल हो रहे थे। उस वनके दूसरे छोरमें पहुँचनेपर उन्हें एक बहुत बड़ा ऊसर मैदान मिला, जहाँ वृक्ष आदि नहीं थे ॥ २ ॥

तच्चाप्यतीत्य नृपतिरुत्तमाश्रमसंयुतम् ।
मनःप्रह्लादजननं दृष्टिकान्तमतीव च ॥ ३ ॥
शीतमारुतसंयुक्तं जगामान्यन्महद् वनम् ।
पुष्पितैः पादपैः कीर्णमतीव सुखशाद्वलम् ॥ ४ ॥
उस वृक्षशून्य ऊसर भूमिको लाँघकर महाराज दुष्यन्त दूसरे विशालवनमें जा पहुँचे, जो अनेक उत्तम आश्रमोंसे सुशोभित था। देखनेमें अत्यन्त सुन्दर होनेके साथ ही वह मनमें अद्भुत आनन्दोल्लासकी सृष्टि कर रहा था। उस वनमें शीतल वायु चल रही थी। वहाँके वृक्ष फूलोंसे भरे थे और वनमें सब ओर व्याप्त हो उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँ अत्यन्त सुखद हरी-हरी कोमल घास उगी हुई थी ॥ ३-४ ॥

विपुलं मधुरारावैर्नादितं विहगैस्तथा ।
पुंस्कोकिलनिनादैश्च झिल्लीकगणनादितम् ॥ ५ ॥
वह वन बहुत बड़ा था और मीठी बोली बोलनेवाले विविध विहंगमोंके कलरवोंसे गूँज रहा था। उसमें कहीं कोकिलोंकी कुहू-कुहू सुन पड़ती थी तो कहीं झींगुरोंकी झीनी झनकार गूँज रही थी ॥ ५ ॥

प्रवृद्धविटपैर्वृक्षैः सुखच्छायैः समावृतम् ।
षट्पदाघूर्णिततलं लक्ष्म्या परमया युतम् ॥ ६ ॥

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वहाँ सब ओर बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले विशाल वृक्ष अपनी सुखद शीतल छाया किये हुए थे और उन वृक्षोंके नीचे सब ओर भ्रमर मँडरा रहे थे। इस प्रकार वहाँ सर्वत्र बड़ी भारी शोभा छा रही थी ॥ ६ ॥

नापुष्पः पादपः कश्चिन्नाफलो नापि कण्टकी ।
षट्पदैर्नाप्याकीर्णस्तस्मिन् वै काननेऽभवत् ॥ ७ ॥
उस वनमें एक भी वृक्ष ऐसा नहीं था, जिसमें फूल और फल न लगे हों तथा भौंरे न बैठे हों। काँटेदार वृक्ष तो वहाँ ढूँढ़नेपर भी नहीं मिलता था ॥ ७ ॥

विहगैर्नादितं पुष्पैरलंकृतमतीव च ।
सर्वर्तुकुसुमैर्वृक्षैः सुखच्छायैः समावृतम् ॥ ८ ॥
सब ओर अनेकानेक पक्षी चहक रहे थे। भाँति-भाँतिके पुष्प उस वनकी अत्यन्त शोभा बढ़ा रहे थे। सभी ऋतुओंमें फूल देनेवाले सुखद छायायुक्त वृक्ष वहाँ चारों ओर फैले हुए थे ॥ ८ ॥

मनोरमं महेष्वासो विवेश वनमुत्तमम् ।
मारुताकलितास्तत्र द्रुमाः कुसुमशाखिनः ॥ ९ ॥
पुष्पवृष्टिं विचित्रां तु व्यसृजंस्ते पुनः पुनः ।
दिवःस्पृशोऽथ संघशः पक्षिभिर्मधुरस्वनैः ॥ १० ॥
महान् धनुर्धर राजा दुष्यन्तने इस प्रकार मनको मोह लेनेवाले उस उत्तम वनमें प्रवेश किया। उस समय फूलोंसे भरी हुई डालियोंवाले वृक्ष वायुके झकोरोंसे हिल-हिलकर उनके ऊपर बार-बार अद्भुत पुष्प-वर्षा करने लगे। वे वृक्ष इतने ऊँचे थे, मानो आकाशको छू लेंगे। उनपर बैठे हुए मीठी बोली बोलनेवाले पक्षियोंके मधुर शब्द वहाँ गूँज रहे थे ॥ ९—१० ॥

विरेजुः पादपास्तत्र विचित्रकुसुमाम्बराः ।
तेषां तत्र प्रवालेषु पुष्पभारावनामिषु ॥ ११ ॥
रुवन्ति रावान् मधुरान् षट्पदा मधुलिप्सवः ।
तत्र प्रदेशांश्च बहून् कुसुमोत्करमण्डितान् ॥ १२ ॥
लतागृहपरिक्षिप्तान् मनसः प्रीतिवर्धनान् ।
सम्पश्यन् सुमहातेजा बभूव मुदितस्तदा ॥ १३ ॥
उस वनमें पुष्परूपी विचित्र वस्त्र धारण करनेवाले वृक्ष अद्भुत शोभा पा रहे थे। फूलोंके भारसे झुके हुए उनके कोमल पल्लवोंपर बैठे हुए मधुलोभी भ्रमर मधुर गुंजार कर रहे थे। राजा दुष्यन्तने वहाँ बहुत-से ऐसे रमणीय प्रदेश देखे जो फूलोंके ढेरसे सुशोभित तथा लतामण्डपोंसे अलंकृत थे। मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले उन मनोहर प्रदेशोंका अवलोकन करके उस समय महातेजस्वी राजाको बड़ा हर्ष हुआ ॥ ११—१३ ॥

परस्पराश्लिष्टशाखैः पादपैः कुसुमान्वितैः ।

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अशोभत वनं तत् तु महेन्द्रध्वजसंनिभैः ॥ १४ ॥ फूलोंसे लदे हुए वृक्ष एक-दूसरेसे अपनी डालियोंको सटाकर मानो गले मिल रहे थे। वे गगनचुम्बी वृक्ष इन्द्रकी ध्वजाके समान जान पड़ते थे और उनके कारण उस वनकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १४ ॥

सिद्धचारणसंघैश्च गन्धर्वाप्सरसां गणैः । सेवितं वनमत्यर्थं मत्तवानरकिन्नरम् ॥ १५ ॥ सिद्ध-चारणसमुदाय तथा गन्धर्व और अप्सराओंके समूह भी उस वनका अत्यन्त सेवन करते थे। वहाँ मतवाले वानर और किन्नर निवास करते थे ॥ १५ ॥

सुखः शीतः सुगन्धी च पुष्परेणुवहोऽनिलः । परिक्रामन् वने वृक्षानुपैतीव रिरंसया ॥ १६ ॥ उस वनमें शीतल, सुगन्ध, सुखदायिनी मन्द वायु फूलोंके पराग वहन करती हुई मानो रमणकी इच्छासे बार-बार वृक्षोंके समीप आती थी ॥ १६ ॥

एवंगुणसमायुक्तं ददर्श स वनं नृपः । नदीकच्छोद्भवं कान्तमुच्छ्रितध्वजसंनिभम् ॥ १७ ॥ वह वन मालिनी नदीके कछारमें फैला हुआ था और ऊँची ध्वजाओंके समान ऊँचे वृक्षोंसे भरा होनेके कारण अत्यन्त मनोहर जान पड़ता था। राजाने इस प्रकार उत्तम गुणोंसे युक्त उस वनका भलीभाँति अवलोकन किया ॥ १७ ॥

प्रेक्षमाणो वनं तत् तु सुप्रहृष्टविहङ्गमम् । आश्रमप्रवरं रम्यं ददर्श च मनोरमम् ॥ १८ ॥ इस प्रकार राजा अभी वनकी शोभा देख ही रहे थे कि उनकी दृष्टि एक उत्तम आश्रमपर पड़ी, जो अत्यन्त रमणीय और मनोरम था। वहाँ बहुत-से पक्षी हर्षोल्लासमें भरकर चहक रहे थे ॥ १८ ॥

नानावृक्षसमाकीर्णं सम्प्रज्वलितपावकम् । तं तदाप्रतिमं श्रीमाना श्रमं प्रत्यपूजयत् ॥ १९ ॥ नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरपूर उस वनमें स्थान-स्थानपर अग्निहोत्रकी आग प्रज्वलित हो रही थी। इस प्रकार उस अनुपम आश्रमका श्रीमान् दुष्यन्त नरेशने मन-ही-मन बड़ा सम्मान किया ॥ १९ ॥

यतिभिर्वालखिल्यैश्च वृतं मुनिगणान्वितम् । अग्न्यगारैश्च बहुभिः पुष्पसंस्तरसंस्तृतम् ॥ २० ॥ वहाँ बहुत-से त्यागी विरागी यति, बालखिल्य ऋषि तथा अन्य मुनिगण निवास करते थे। अनेकानेक अग्निहोत्रगृह उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँ इतने फूल झड़कर गिरे थे कि उनके बिछौने-से बिछ गये थे ॥ २० ॥

महाकच्छैर्बृहद्भिश्च विभ्राजितमतीव च ।

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मालिनीमभितो राजन् नदीं पुण्यां सुखोदकाम् ॥ २१ ॥ बड़े-बड़े तूनके वृक्षोंसे उस आश्रमकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी। राजन्! बीचमें पुण्यसलिला मालिनी नदी बहती थी, जिसका जल बड़ा ही सुखद एवं स्वादिष्ट था। उसके दोनों तटोंपर वह आश्रम फैला हुआ था॥ २१॥ नैकपक्षिगणाकीर्णां तपोवनमनोरमाम् । तत्र व्यालमृगान् सौम्यान् पश्यन् प्रीतिमवाप सः ॥ २२ ॥ मालिनीमें अनेक प्रकारके जलपक्षी निवास करते थे तथा तटवर्ती तपोवनके कारण उसकी मनोहरता और बढ़ गयी थी। वहाँ विषधर सर्प और हिंसक वनजन्तु भी सौम्यभाव (हिंसाशून्य कोमलवृत्ति)-से रहते थे। यह सब देखकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ २२॥ तं चाप्रतिरथः श्रीमाना श्रमं प्रत्यपद्यत । देवलोकप्रतीकाशं सर्वतः सुमनोहरम् ॥ २३ ॥ श्रीमान् दुष्यन्त नरेश अप्रतिरथ वीर थे—उस समय उनकी समानता करनेवाला भूमण्डलमें दूसरा कोई रथी योद्धा नहीं था। वे उक्त आश्रमके समीप जा पहुँचे, जो देवताओंके लोक-सा प्रतीत होता था। वह आश्रम सब ओरसे अत्यन्त मनोहर था॥ २३॥ नदीं चाश्रमसंश्लिष्टां पुण्यतोयां ददर्श सः । सर्वप्राणभृतां तत्र जननीमिव धिष्ठिताम् ॥ २४ ॥ राजाने आश्रमसे सटकर बहनेवाली पुण्यसलिला मालिनी नदीकी ओर भी दृष्टिपात किया; जो वहाँ समस्त प्राणियोंकी जननी-सी विराज रही थी॥ २४॥ सचक्रवाकपुलिनां पुष्पफेनप्रवाहिनीम् । सकिन्नरगणावासां वानरर्क्षनिषेविताम् ॥ २५ ॥ उसके तटपर चकवा-चकई किलोल कर रहे थे। नदीके जलमें बहुत-से फूल इस प्रकार बह रहे थे, मानो फेन हों। उसके तटप्रान्तमें किन्नरोंके निवास-स्थान थे। वानर और रीछ भी उस नदीका सेवन करते थे॥ २५॥ पुण्यस्वाध्यायसंघुष्टां पुलिनैरुपशोभिताम् । मत्तवारणशार्दूलभुजगेन्द्रनिषेविताम् ॥ २६ ॥ अनेक सुन्दर पुलिन मालिनीकी शोभा बढ़ा रहे थे। वेद-शास्त्रोंके पवित्र स्वाध्यायकी ध्वनिसे उस सरिताका निकटवर्ती प्रदेश गूँज रहा था। मतवाले हाथी, सिंह और बड़े-बड़े सर्प भी मालिनीके तटका आश्रय लेकर रहते थे॥ २६॥ तस्यास्तीरे भगवतः काश्यपस्य महात्मनः । आश्रमप्रवरं रम्यं महर्षिगणसेवितम् ॥ २७ ॥ उसके तटपर ही कश्यपगोत्रीय महात्मा कण्वका वह उत्तम एवं रमणीय आश्रम था। वहाँ महर्षियोंके समुदाय निवास करते थे॥ २७॥ नदीमाश्रमसम्बद्धां दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं तथा ।

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चकाराभिप्रवेशाय मतिं स नृपतिस्तदा ॥ २८ ॥ उस मनोहर आश्रम और आश्रमसे सटी हुई नदीको देखकर राजाने उस समय उसमें प्रवेश करनेका विचार किया ॥ २८ ॥

अलंकृतं द्वीपवत्या मालिन्या रम्यतीरया । नरनारायणस्थानं गङ्गयेवोपशोभितम् ॥ २९ ॥ टापुओंसे युक्त तथा सुरम्य तटवाली मालिनी नदीसे सुशोभित वह आश्रम गंगा नदीसे शोभायमान भगवान् नर-नारायणके आश्रम-सा जान पड़ता था ॥ २९ ॥

मत्तबर्हिणसंघुष्टं प्रविवेश महद् वनम् । तत् स चैत्ररथप्रख्यं समुपेत्य नरर्षभः ॥ ३० ॥ अतीवगुणसम्पन्नमनिर्देश्यं च वर्चसा । महर्षिं काश्यपं द्रष्टुमथ कण्वं तपोधनम् ॥ ३१ ॥ ध्वजिनीमश्वसम्बाधां पदातिगजसंकुलाम् । अवस्थाप्य वनद्वारि सेनामिदमुवाच सः ॥ ३२ ॥ तदनन्तर नरश्रेष्ठ दुष्यन्तने अत्यन्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न कश्यपगोत्रीय महर्षि तपोधन कण्वका, जिनके तेजका वाणीद्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता था, दर्शन करनेके लिये कुबेरके चैत्ररथवनके समान मनोहर उस महान् वनमें प्रवेश किया, जहाँ मतवाले मयूर अपनी केकाध्वनि फैला रहे थे। वहाँ पहुँचकर नरेशने रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंसे भरी हुई अपनी चतुरंगिणी सेनाको उस तपोवनके किनारे ठहरा दिया और कहा— ॥ ३०—३२ ॥

मुनिं विरजसं द्रष्टुं गमिष्यामि तपोधनम् । काश्यपं स्थीयतामत्र यावदागमनं मम ॥ ३३ ॥ ‘सेनापति! और सैनिको! मैं रजोगुणरहित तपस्वी महर्षि कश्यपनन्दन कण्वका दर्शन करनेके लिये उनके आश्रममें जाऊँगा। जबतक मैं वहाँसे लौट न आऊँ, तबतक तुमलोग यहीं ठहरो’ ॥ ३३ ॥

तद् वनं नन्दनप्रख्यमासाद्य मनुजेश्वरः । क्षुत्पिपासे जहौ राजा मुदं चावाप पुष्कलाम् ॥ ३४ ॥ इस प्रकार आदेश दे नरेश्वर दुष्यन्तने नन्दनवनके समान सुशोभित उस तपोवनमें पहुँचकर भूख-प्यासको भुला दिया। वहाँ उन्हें बड़ा आनन्द मिला ॥ ३४ ॥

सामात्यो राजलिङ्गानि सोऽपनीय नराधिपः । पुरोहितसहायश्च जगामाश्रममुत्तमम् ॥ ३५ ॥ वे नरेश मुकुट आदि राजचिह्नोंको हटाकर साधारण वेश-भूषामें मन्त्रियों और पुरोहितके साथ उस उत्तम आश्रमके भीतर गये ॥ ३५ ॥

दिदृक्षुस्तत्र तमृषिं तपोराशिवमथाव्ययम् ।