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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages
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अध्यापयिष्यामि तु यं तस्य विद्या फलिष्यति ॥ २० ॥
तुमने जो मुझे यह कहा कि तुम्हारी विद्या सफल नहीं होगी, सो ठीक है; किंतु मैं जिसे यह विद्या पढ़ा दूँगा, उसकी विद्या तो सफल होगी ही ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा द्विजश्रेष्ठो देवयानीं कचस्तदा ।
त्रिदशेशालयं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः ॥ २१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! द्विजश्रेष्ठ कच देवयानीसे ऐसा कहकर तत्काल बड़ी उतावलीके साथ इन्द्रलोकको चले गये ॥ २१ ॥

तमागतमभिप्रेक्ष्य देवा इन्द्रपुरोगमाः ।
बृहस्पतिं सभाज्येदं कचं वचनमब्रुवन् ॥ २२ ॥
उन्हें आया देख इन्द्रादि देवता बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हो कचसे यह वचन बोले ॥ २२ ॥

देवा ऊचुः

यत् त्वयास्मद्धितं कर्म कृतं वै परमाद्भुतम् ।
न ते यशः प्रणशिता भागभाक् च भविष्यसि ॥ २३ ॥
**देवता बोले—**ब्रह्मन्! तुमने हमारे हितके लिये यह बड़ा अद्भुत कार्य किया है, अतः तुम्हारे यशका कभी लोप नहीं होगा और तुम यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी होओगे ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक
सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 592)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यजीके साथ वार्तालाप

वैशम्पायन उवाच

कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः ।
कचादधीत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब कच मृतसंजीवनी विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कचसे उस विद्याको पढ़कर कृतार्थ हो गये ॥ १ ॥

सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन् ।
कालस्ते विक्रमस्याद्य जहि शत्रून् पुरन्दर ॥ २ ॥
फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा—'पुरन्दर! अब आपके लिये पराक्रम करनेका समय आ गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये' ॥ २ ॥

एवमुक्तस्तु सहितैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदा ।
तथेत्युक्त्वा प्रचक्राम सोऽपश्यत वने स्त्रियः ॥ ३ ॥
संगठित होकर आये हुए देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर भूलोकमें आये। वहाँ एक वनमें उन्होंने बहुत-सी स्त्रियोंको देखा ॥ ३ ॥

क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे ।
वायुभूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत् ॥ ४ ॥
वह वन चैत्ररथ नामक देवोद्यानके समान मनोहर था। उसमें वे कन्याएँ जलक्रीड़ा कर रही थीं। इन्द्रने वायुका रूप धारण करके उनके सारे कपड़े परस्पर मिला दिये ॥ ४ ॥

ततो जलात् समुत्तीर्य कन्यास्ताः सहितास्तदा ।
वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथासन्नान्यनेकशः ॥ ५ ॥
तत्र वासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा ।
व्यतिमिश्रमजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः ॥ ६ ॥
तब वे सभी कन्याएँ एक साथ जलसे निकलकर अपने-अपने अनेक प्रकारके वस्त्र, जो निकट ही रखे हुए थे; लेने लगीं। उस सम्मिश्रणमें शर्मिष्ठाने देवयानीका वस्त्र ले लिया। शर्मिष्ठा वृषपर्वाकी पुत्री थी; दोनोंके वस्त्र मिल गये हैं, इस बातका उसे पता नहीं था ॥ ५-६ ॥

ततस्तयोर्मिथस्तत्र विरोधः समजायत ।

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देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते ।। ७ ।।
राजेन्द्र! उस समय वस्त्रोंकी अदला-बदलीको लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा दोनोंमें वहाँ परस्पर बड़ा भारी विरोध खड़ा हो गया ।। ७ ।।

देवयान्युवाच

कस्माद् गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि ।
समुदाचारहीनाया न ते साधु भविष्यति ।। ८ ।।
**देवयानी बोली—**अरी दानवकी बेटी! मेरी शिष्या होकर तू मेरा वस्त्र कैसे ले रही है? तू सज्जनोंके उत्तम आचारसे शून्य है, अतः तेरा भला न होगा ।। ८ ।।

शर्मिष्ठोवाच

आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम ।
स्तौति वन्दीव चाभीक्ष्णं नीचेः स्थित्वा विनीतवत् ।। ९ ।।
**शर्मिष्ठाने कहा—**अरी! मेरे पिता बैठे हों या सो रहे हों, उस समय तेरा पिता विनयशील सेवकके समान नीचे खड़ा होकर बार-बार वन्दीजनोंकी भाँति उनकी स्तुति करता है ।। ९ ।।
याचतस्त्वं हि दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः ।
सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः ।। १० ।।
आदुन्वस्व विदुन्वस्व द्रुह्य कुप्यस्व याचकि ।
अनायुधा सायुधाया रिक्ता क्षुभ्यसि भिक्षुकि ।
लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न हि त्वां गणयाम्यहम् ।। ११ ।।
तू भिखमंगेकी बेटी है, तेरा बाप स्तुति करता और दान लेता है। मैं उनकी बेटी हूँ, जिनकी स्तुति की जाती है, जो दूसरोंको दान देते हैं और स्वयं किसीसे कुछ भी नहीं लेते हैं। अरी भिक्षुकि! तू छाती पीट-पीटकर रो अथवा धूलमें लोट-लोटकर कष्ट भोग। मुझसे द्रोह रख या क्रोध कर (इसकी परवा नहीं है)। भिखमंगिन! तू खाली हाथ है, तेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र भी नहीं है और देख ले, मेरे पास हथियार है। इसलिये तू मेरे ऊपर व्यर्थ ही क्रोध कर रही है। यदि लड़ना ही चाहती है, तो इधरसे भी डटकर सामना करनेवाला मुझ-जैसा योद्धा तुझे मिल जायगा। मैं तुझे कुछ भी नहीं गिनती ।। १०-११ ।।
(प्रतिकूलं वदसि चेदितः प्रभृति याचकि ।
आकृष्य मम दासीभिः प्रस्थाप्यसि बहिर्बहिः ।।)
भिक्षुकी! अबसे यदि मेरे विरुद्ध कोई बात कहेगी, तो अपनी दासियोंसे घसीटवाकर तुझे यहाँसे बाहर निकलवा दूँगी।

वैशम्पायन उवाच

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समुच्छ्रयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि ॥ १२ ॥
शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे ततः स्वपुरमागमत् ।
हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया ॥ १३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! देवयानीने सच्ची बातें कहकर अपनी उच्चता और महत्ता सिद्ध कर दी और शर्मिष्ठाके शरीरसे अपने वस्त्रको खींचने लगी। यह देख शर्मिष्ठाने उसे कुएँमें ढकेल दिया और अब यह मर गयी होगी, ऐसा समझकर पापमय विचारवाली शर्मिष्ठा नगरको लौट आयी ॥ १२-१३ ॥

अनवेक्ष्य ययौ वेश्म क्रोधवेगपरायणा ।
अथ तं देशमभ्यागाद् ययातिर्नहुषात्मजः ॥ १४ ॥
वह क्रोधके आवेशमें थी, अतः देवयानीकी ओर देखे बिना ही घर लौट गयी। तदनन्तर नहुषपुत्र ययाति उस स्थानपर आये ॥ १४ ॥

श्रान्तयुग्यः श्रान्तहयो मृगलिप्सुः पिपासितः ।
स नाहुषः प्रेक्षमाण उदपानं गतोदकम् ॥ १५ ॥
उनके रथके वाहन तथा अन्य घोड़े भी थक गये थे। वे एक हिंसक पशुको पकड़नेके लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्याससे कष्ट पा रहे थे। ययाति उस जलशून्य कूपको देखने लगे ॥ १५ ॥

ददर्श राजा तां तत्र कन्यामग्निशिखामिव ।
तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्याममरवर्णिनीम् ॥ १६ ॥
वहाँ उन्हें अग्नि-शिखाके समान तेजस्विनी एक कन्या दिखायी दी, जो देवांगनाके समान सुन्दरी थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही राजाने उससे पूछा ॥ १६ ॥

सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना ।
का त्वं ताम्रनखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला ॥ १७ ॥
नृपश्रेष्ठ ययातिने पहले परम मधुर वचनोंद्वारा शान्तभावसे उसे आश्वासन दिया और कहा—'तुम कौन हो? तुम्हारे नख लाल-लाल हैं। तुम षोडशी जान पड़ती हो। तुम्हारे कानोंके मणिमय कुण्डल अत्यन्त सुन्दर और चमकीले हैं ॥ १७ ॥

दीर्घं ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छोचसि चातुरा ।
कथं च पतितास्यस्मिन् कूपे वीरुत्तृणावृते ॥ १८ ॥
दुहिता चैव कस्य त्वं वद सत्यं सुमध्यमे ।
'तुम किसी अत्यन्त घोर चिन्तामें पड़ी हो। आतुर होकर शोक क्यों कर रही हो? तृण और लताओंसे ढके हुए इस कुएँमें कैसे गिर पड़ी? तुम किसकी पुत्री हो? सुमध्यमे! ठीक-ठीक बताओ' ॥ १८ १/२ ॥

देवयान्युवाच

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योऽसौ देवैर्हतान् दैत्यानुत्थापयति विद्यया ॥ १९ ॥
तस्य शुक्रस्य कन्याहं स मां नूनं न बुध्यते ।
देवयानी बोली— जो देवताओंद्वारा मारे गये दैत्योंको अपनी विद्याके बलसे जिलाया करते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यकी मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही उन्हें इस बातका पता नहीं होगा कि मैं इस दुरवस्थामें पड़ी हूँ ॥ १९ ½ ॥
(पृच्छसे मां कस्त्वमसि रूपवीर्यबलान्वितः ।
ब्रूह्यात्रागमनं किं वा श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
रूप, वीर्य और बलसे सम्पन्न तुम कौन हो, जो मेरा परिचय पूछते हो। यहाँ तुम्हारे आगमनका क्या कारण है, बताओ। मैं यह सब ठीक-ठीक सुनना चाहती हूँ।

ययातिरुवाच

ययातिर्नाहुषोऽहं तु श्रान्तोऽद्य मृगलिप्सया ।
कूपे तृणावृते भद्रे दृष्टवानस्मि त्वामिह ॥)
ययातिने कहा— भद्रे! मैं राजा नहुषका पुत्र ययाति हूँ। एक हिंसक पशुको मारनेकी इच्छासे इधर आ निकला। थका-माँदा प्यास बुझानेके लिये यहाँ आया और तिनकोंसे ढके हुए इस कूपमें गिरी हुई तुमपर मेरी दृष्टि पड़ गयी।
एष मे दक्षिणो राजन् पाणिस्ताम्रनखाङ्गुलिः ॥ २० ॥
समुद्धर गृहीत्वा मां कुलीनस्त्वं हि मे मतः ।
जानामि त्वां हि संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम् ॥ २१ ॥
तस्मान्मां पतितामस्मात् कूपादुद्धर्तुमर्हसि ।
(देवयानी बोली—) महाराज! लाल नख और अंगुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुएँसे मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूँ, आप उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी मालूम है कि आप परम शान्त स्वभाववाले, पराक्रमी तथा यशस्वी वीर हैं। इसलिये इस कुएँमें गिरी हुई मुझ अबलाका आप यहाँसे उद्धार कीजिये ॥ २०-२१ ½ ॥

वैशम्पायन उवाच

तामथो ब्राह्मणीं राजा विज्ञाय नहुषात्मजः ॥ २२ ॥
गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुज्जहार ततोऽवटात् ।
उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात् कूपान्नराधिपः ॥ २३ ॥
(गच्छ भद्रे यथाकामं न भयं विद्यते तव ।
इत्युच्यमाना नृपतिं देवयानी तमुत्तरम् ॥
उवाच मां त्वमादाय गच्छ शीघ्रं प्रियो हि मे ।
गृहीताहं त्वया पाणौ तस्माद् भर्त्ता भविष्यसि ॥

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इत्येवमुक्तो नृपतिराह क्षत्रकुलोद्भवः । त्वं भद्रे ब्राह्मणी तस्मान्मया नार्हसि सङ्गमम् ॥ सर्वलोकगुरुः काव्यस्त्वं तस्य दुहितासि वै । तस्मादपि भयं मेऽद्य तस्मात् कल्याणि नार्हसि ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर नहुषपुत्र राजा ययातिने देवयानीको ब्राह्मणकन्या जानकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथमें ले उसे उस कुएँसे बाहर निकाला। वेगपूर्वक कुएँसे बाहर करके राजा ययाति उससे बोले—'भद्रे! अब जहाँ इच्छा हो जाओ। तुम्हें कोई भय नहीं है।' राजा ययातिके ऐसा कहनेपर देवयानीने उन्हें उत्तर देते हुए कहा—'तुम मुझे शीघ्र अपने साथ ले चलो; क्योंकि तुम मेरे प्रियतम हो। तुमने मेरा हाथ पकड़ा है, अतः तुम्हीं मेरे पति होओगे।' देवयानीके ऐसा कहनेपर राजा बोले—'भद्रे! मैं क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और तुम ब्राह्मणकन्या हो। अतः मेरे साथ तुम्हारा समागम नहीं होना चाहिये। कल्याणी! भगवान् शुक्राचार्य सम्पूर्ण जगत्‌के गुरु हैं और तुम उनकी पुत्री हो, अतः मुझे उनसे भी डर लगता है। तुम मुझ-जैसे तुच्छ पुरुषके योग्य कदापि नहीं हो'।

देवयान्युवाच

यदि मद्धचनादद्य मां नेच्छसि नराधिप । त्वामेव वरये पित्रा पश्चाज्ज्ञास्यसि गच्छसि ॥) **देवयानी बोली—**नरेश्वर! यदि तुम मेरे कहनेसे आज मुझे साथ ले जाना नहीं चाहते, तो मैं पिताजीके द्वारा भी तुम्हारा ही वरण करूँगी। फिर तुम मुझे अपने योग्य मानोगे और साथ ले चलोगे।

आमन्त्रयित्वा सुश्रोणीं ययातिः स्वपुरं ययौ । गते तु नाहुषे तस्मिन् देवयान्यप्यनिन्दिता ॥ २४ ॥ (क्वचिदार्ता च रुदती वृक्षमाश्रित्य तिष्ठति । ततश्चिरायमाणायां दुहितर्याह भार्गवः ॥ धात्रि त्वमानय क्षिप्रं देवयानीं शुचिस्मिताम् । इत्युक्तमात्रे सा धात्री त्वरिताऽऽह्वयितुं गता ॥ यत्र यत्र सखीभिः सा गता पदममार्गत । सा ददर्श तथा दीनां श्रमार्तां रुदतीं स्थिताम् ॥ (वैशम्पायनजी कहते हैं—) तदनन्तर सुन्दरी देवयानीकी अनुमति लेकर राजा ययाति अपने नगरको चले गये। नहुषनन्दन ययातिके चले जानेपर सती-साध्वी देवयानी आर्त-भावसे रोती हुई कहीं किसी वृक्षका सहारा लेकर खड़ी रही। जब पुत्रीके घर लौटनेमें विलम्ब हुआ, तब शुक्राचार्यने धायसे कहा—'धाय! तू पवित्र हास्यवाली मेरी बेटी देवयानीको शीघ्र यहाँ बुला ला।' उनके इतना कहते ही धाय तुरंत उसे बुलाने चली गयी।

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जहाँ-जहाँ देवयानी सखियोंके साथ गयी थी, वहाँ-वहाँ उसका पदचिह्न खोजती हुई धाय गयी और उसने पूर्वोक्त रूपसे श्रमपीड़ित एवं दीन होकर रोती हुई देवयानीको देखा।

धात्र्युवाच

वृत्तं ते किमिदं भद्रे शीघ्रं वद पिताऽऽह्वयत् ।
धात्रीमाह समाहूय शर्मिष्ठावृजिनं कृतम् ॥)
उवाच शोकसंतप्ता घूर्णिकामागतां पुरः ।
**तब धायने पूछा—**भद्रे! यह तुम्हारा क्या हाल है? शीघ्र बताओ। तुम्हारे पिताजीने तुम्हें बुलाया है। इसपर देवयानीने धायको अपने निकट बुलाकर शर्मिष्ठाद्वारा किये हुए अपराधको बताया। वह शोकसे संतप्त हो अपने सामने आयी हुई धाय घूर्णिकासे बोली।

देवयान्युवाच

त्वरितं घूर्णिके गच्छ शीघ्रमाचक्ष्व मे पितुः ॥ २५ ॥
नेदानीं सम्प्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः ।
**देवयानीने कहा—**घूर्णिके! तुम वेगपूर्वक जाओ और शीघ्र मेरे पिताजीसे कह दो—'अब मैं वृषपर्वाके नगरमें पैर नहीं रखूँगी' ॥ २२-२५ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

सा तत्र त्वरितं गत्वा घूर्णिकासुरमन्दिरम् ॥ २६ ॥
दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं सम्भ्रमाविष्टचेतना ।
आचचक्षे महाप्राज्ञं देवयानीं वने हताम् ॥ २७ ॥
शर्मिष्ठया महाभाग दुहित्रा वृषपर्वणः ।
श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तत्र शर्मिष्ठया हताम् ॥ २८ ॥
त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने ।
दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो वने ॥ २९ ॥
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत् ।
आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः ॥ ३० ॥
मन्ये दुश्चरितं तेऽस्ति यस्येयं निष्कृतिः कृता ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! देवयानीकी बात सुनकर घूर्णिका तुरंत असुरराजके महलमें गयी और वहाँ शुक्राचार्यको देखकर सम्भ्रमपूर्ण चित्तसे वह बात बतला दी। महाभाग! उसने महाप्राज्ञ शुक्राचार्यको यह बताया कि 'वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाके द्वारा देवयानी वनमें मृततुल्य कर दी गयी है।' अपनी पुत्रीको शर्मिष्ठा-द्वारा मृततुल्य की गयी सुनकर शुक्राचार्य बड़ी उतावलीके साथ निकले और दुःखी होकर उसे वनमें ढूँढ़ने लगे। तदनन्तर वनमें अपनी बेटी देवयानीको देखकर शुक्राचार्यने दोनों

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भुजाओंसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया और दुःखी होकर कहा—'बेटी! सब लोग अपने ही दोष और गुणोंसे—अशुभ या शुभ कर्मोंसे दुःख एवं सुखमें पड़ते हैं। मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका बदला तुम्हें इस रूपमें मिला है' ।। २६-३० १/२ ।।

देवयान्युवाच

निष्कृतिर्मेऽस्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम ।। ३१ ।।
**देवयानी बोली—**पिताजी! मुझे अपने कर्मोंका फल मिले या न मिले, आप मेरी बात ध्यान देकर सुनिये ।। ३१ ।।

शर्मिष्ठया यदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः ।
सत्यं किलैतत् सा प्राह दैत्यानामसि गायनः ।। ३२ ।।
वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्या यह सच है? वह कहती है—'आप भाटोंकी तरह दैत्योंके गुण गाया करते हैं' ।। ३२ ।।

एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।
वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम् ।। ३३ ।।
वृषपर्वाकी लाड़िली शर्मिष्ठा क्रोधसे लाल आँखें करके आज मुझसे इस प्रकार अत्यन्त तीखे और कठोर वचन कह रही थी— ।। ३३ ।।

स्तुवतो दुहिता नित्यं याचतः प्रतिगृह्णतः ।
अहं तु स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः ।। ३४ ।।
'देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, नित्य भीख माँगनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी है और मैं तो उन महाराजकी पुत्री हूँ, जिनकी तुम्हारे पिता स्तुति करते हैं, जो स्वयं दान देते हैं और लेते एक धेला भी नहीं हैं' ।। ३४ ।।

इदं मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः ।
क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णा पुनः पुनः ।। ३५ ।।
वृषपर्वाकी बेटी शर्मिष्ठाने आज मुझसे ऐसी बात कही है। कहते समय उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह भारी घमंडसे भरी हुई थी और उसने एक बार ही नहीं, अपितु बार-बार उपर्युक्त बातें दुहरायी हैं ।। ३५ ।।

यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णतः ।
प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता तु सखी मया ।। ३६ ।।
तात! यदि सचमुच मैं स्तुति करनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी हूँ, तो मैं शर्मिष्ठाको अपनी सेवाओंद्वारा प्रसन्न करूँगी। यह बात मैंने अपनी सखीसे कह दी थी ।। ३६ ।।

(उक्ताप्येवं भृशं क्रुद्धा मां गृह्य विजने वने ।
कूपे प्रक्षेपयामास प्रक्षिप्यैव गृहं ययौ ॥)

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मेरे ऐसा कहनेपर भी अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई शर्मिष्ठाने उस निर्जन वनमें मुझे पकड़कर कुएँमें ढकेल दिया, उसके बाद वह अपने घर चली गयी।

शुक्र उवाच

स्तुवतो दुहिता न त्वं याचतः प्रतिगृह्णतः ।
अस्तोतुः स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि ॥ ३७ ॥
**शुक्राचार्यने कहा—**देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, भीख माँगनेवाले या दान लेनेवालेकी बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मणकी पुत्री है, जो किसीकी स्तुति नहीं करता और जिसकी सब लोग स्तुति करते हैं ॥ ३७ ॥

वृषपर्वैव तद् वेद शक्रो राजा च नाहुषः ।
अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम ॥ ३८ ॥
इस बातको वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं। निर्द्वन्द्व अचिन्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है ॥ ३८ ॥

यच्च किंचित् सर्वगतं भूमौ वा यदि वा दिवि ।
तस्याहमीश्वरो नित्यं तुष्टेनोक्तः स्वयम्भुवा ॥ ३९ ॥
ब्रह्माजीने संतुष्ट होकर मुझे वरदान दिया है; उसके अनुसार इस भूतलपर, देवलोकमें अथवा सब प्राणियोंमें जो कुछ भी है, उन सबका मैं सदा-सर्वदा स्वामी हूँ ॥ ३९ ॥

अहं जलं विमुञ्चामि प्रजानां हितकाम्यया ।
पुष्णाम्योषधयः सर्वा इति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४० ॥
मैं ही प्रजाओंके हितके लिये पानी बरसाता हूँ और मैं ही सम्पूर्ण ओषधियोंका पोषण करता हूँ, यह तुमसे सच्ची बात कह रहा हूँ ॥ ४० ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं विषादमापन्नां मन्युना सम्प्रपीडिताम् ।
वचनैर्मधुरैः श्लक्ष्णैः सान्त्वयामास तां पिता ॥ ४१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! देवयानी इस प्रकार विषादमें डूबकर क्रोध और ग्लानिसे अत्यन्त कष्ट पा रही थी, उस समय पिताने सुन्दर मधुर वचनोंद्वारा उसे समझाया ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्यानेऽष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ५४ श्लोक हैं)

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अध्याय (पृष्ठ 601)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनाशीतितमोऽध्यायः

शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष

शुक्र उवाच

(मम विद्या हि निर्द्वन्द्वा ऐश्वर्यं हि फलं मम ।
दैन्यं शाठ्यं च जैह्म्यं च नास्ति मे यदधर्मतः ॥)
यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षते ।
देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम् ॥ १ ॥
यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा ।
स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते ॥ २ ॥

शुक्राचार्यने कहा—बेटी! मेरी विद्या द्वन्द्वरहित है। मेरा ऐश्वर्य ही उसका फल है। मुझमें दीनता, शठता, कुटिलता और अधर्मपूर्ण बर्ताव नहीं है। देवयानी! जो मनुष्य सदा दूसरोंके कठोर वचन (दूसरोंद्वारा की हुई अपनी निन्दा)-को सह लेता है, उसने इस सम्पूर्ण जगत्‌पर विजय प्राप्त कर ली, ऐसा समझो। जो उभरे हुए क्रोधको घोड़ेके समान वशमें कर लेता है, वही सत्पुरुषोंद्वारा सच्चा सारथि कहा गया है। किंतु जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं ॥ १-२ ॥

यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन निरस्यति ।
देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम् ॥ ३ ॥

देवयानी! जो उत्पन्न हुए क्रोधको अक्रोध (क्षमाभाव)-के द्वारा मनसे निकाल देता है, समझ लो, उसने सम्पूर्ण जगत्‌को जीत लिया ॥ ३ ॥

यः समुत्पतितं क्रोधं क्षमयेह निरस्यति ।
यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते ॥ ४ ॥

जैसे साँप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्य उभड़नेवाले क्रोधको यहाँ क्षमाद्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है ॥ ४ ॥

यः संधारयते मन्युं योऽतिवादांस्तितिक्षते ।
यश्च तप्तो न तपति दृढं सोऽर्थस्य भाजनम् ॥ ५ ॥

जो क्रोधको रोक लेता है, निन्दा सह लेता है और दूसरेके सतानेपर भी दुःखी नहीं होता, वही सब पुरुषार्थोंका सुदृढ़ पात्र है ॥ ५ ॥

यो यजेदपरिश्रान्तो मासि मासि शतं समाः ।
न क्रुद्ध्येद् यश्च सर्वस्य तयोरक्रोधनोऽधिकः ॥ ६ ॥

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जो मनुष्य सौ वर्षोंतक प्रत्येक मासमें बिना किसी थकावटके निरन्तर यज्ञ करता रहता है और दूसरा जो किसीपर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनोंमें क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ है ॥ ६ ॥ (क्रुद्धस्य निष्फलान्येव दानयज्ञतपांसि च । तस्मादक्रोधने यज्ञस्तपो दानं महाफलम् ॥ न पूतो न तपस्वी च न यज्वा न च कर्मवित् । क्रोधस्य यो वशं गच्छेत् तस्य लोकद्वयं न च ॥ पुत्रभृत्यसुहृन्मित्रभार्या धर्मश्च सत्यता । तस्यैतान्यपयास्यन्ति क्रोधशीलस्य निश्चितम् ॥) यत् कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युरचेतसः । न तत् प्राज्ञोऽनुकुर्वीत न विदुस्ते बलाबलम् ॥ ७ ॥ क्रोधीके यज्ञ, दान और तप—सभी निष्फल होते हैं। अतः जो क्रोध नहीं करता, उसी पुरुषके यज्ञ, तप और दान महान् फल देनेवाले होते हैं। जो क्रोधके वशीभूत हो जाता है, वह कभी पवित्र नहीं होता तथा तपस्या भी नहीं कर सकता। उसके द्वारा यज्ञका अनुष्ठान भी सम्भव नहीं है और वह कर्मके रहस्यको भी नहीं जानता। इतना ही नहीं, उसके लोक और परलोक दोनों ही नष्ट हो जाते हैं। जो स्वभावसे ही क्रोधी है, उसके पुत्र, भृत्य, सुहृद्, मित्र, पत्नी, धर्म और सत्य—ये सभी निश्चय ही उसे छोड़कर दूर चले जायँगे। अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते ॥ ७ ॥

देवयान्युवाच

वेदाहं तात बालापि धर्माणां यदिहान्तरम् । अक्रोधे चातिवादे च वेद चापि बलाबलम् ॥ ८ ॥ देवयानीने कहा—पिताजी! यद्यपि मैं अभी बालिका हूँ फिर भी धर्म-अधर्मका अन्तर समझती हूँ। क्षमा और निन्दाकी सबलता और निर्बलताका भी मुझे ज्ञान है ॥ ८ ॥ शिष्यस्याशिष्यवृत्तेस्तु न क्षन्तव्यं बुभूषता । तस्मात् संकीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते ॥ ९ ॥ परंतु जो शिष्य होकर भी शिष्योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहनेवाले गुरुको उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इन संकीर्ण आचार-विचारवाले दानवोंके बीच निवास करना अब मुझे अच्छा नहीं लगता ॥ ९ ॥ पुमांसो ये हि निन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च । न तेषु निवसेत् प्राज्ञः श्रेयोऽर्थी पापबुद्धिषु ॥ १० ॥

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जो पुरुष दूसरोंके सदाचार और कुलकी निन्दा करते हैं, उन पापपूर्ण विचारवाले मनुष्योंमें कल्याणकी इच्छावाले विद्वान् पुरुषको नहीं रहना चाहिये ॥ १० ॥ ये त्वेनमभिजानन्ति वृत्तेनाभिजनेन वा । तेषु साधुषु वस्तव्यं स वासः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ११ ॥ जो लोग आचार, व्यवहार अथवा कुलीनताकी प्रशंसा करते हों, उन साधु पुरुषोंमें ही निवास करना चाहिये और वही निवास श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ ११ ॥ (सुयन्त्रिता वरा नित्यं विहीनाश्च धनैर्नराः । दुर्वृत्ताः पापकर्माणश्चाण्डाला धनिनोऽपि वा ॥ अकारणाद् ये द्विषन्ति परिवादं वदन्ति च । न तत्रास्य निवासोऽस्ति पाप्मभिः पापतां व्रजेत् ॥ सुकृते दुष्कृते वापि यत्र सज्जति यो नरः । ध्रुवं रतिर्भवेत् तत्र तस्माद् दोषं न रोचयेत् ॥) वाग् दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः । मम मथ्नाति हृदयमग्निकाम इवारणिम् ॥ १२ ॥ धनहीन मनुष्य भी यदि सदा अपने मनपर संयम रखें तो वे श्रेष्ठ हैं और धनवान् भी यदि दुराचारी तथा पापकर्मों हों, तो वे चाण्डालके समान हैं। जो अकारण किसीके साथ द्वेष करते हैं और दूसरोंकी निन्दा करते रहते हैं, उनके बीचमें सत्पुरुषका निवास नहीं होना चाहिये; क्योंकि पापियोंके संगसे मनुष्य पापात्मा हो जाता है। मनुष्य पाप अथवा पुण्य जिसमें भी आसक्त होता है, उसीमें उसकी दृढ़ प्रीति हो जाती है, इसलिये पापकर्ममें प्रीति नहीं करनी चाहिये। तात! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको मथ रहा है। ठीक उसी तरह, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है ॥ १२ ॥ न ह्यतो दुष्करतरं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु । (निःसंशयो विशेषेण परुषं मर्मकृन्तनम् । सुहृन्मित्रजनास्तेषु सौहृदं न च कुर्वते ॥) यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्रीः पर्युपासते । मरणं शोभनं तस्य इति विद्वज्जना विदुः ॥ १३ ॥ इससे बढ़कर महान् दुःखकी बात मैं अपने लिये तीनों लोकोंमें और कुछ नहीं मानती हूँ। इसमें संदेह नहीं कि कटुवचन मर्मस्थलोंको विदीर्ण करनेवाला होता है। कटुवादी मनुष्योंसे उनके सगे-सम्बन्धी और मित्र भी प्रेम नहीं करते हैं। जो श्रीहीन होकर शत्रुओंकी चमकती हुई लक्ष्मीकी उपासना करता है, उस मनुष्यका तो मर जाना ही अच्छा है; ऐसा विद्वान् पुरुष अनुभव करते हैं ॥ १३ ॥ (अवमानमवाप्नोति शनैर्नीचेषु सङ्गतः ।

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वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । शनैर्दुःखं शस्त्रविषाग्निजातं तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु ॥ संरोहति शरैर्विद्धं वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥)

नीच पुरुषोंके संगसे मनुष्य धीरे-धीरे अपमानित हो जाता है। मुखसे जो कटुवचनरूपी बाण छूटते हैं, उनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोकमें डूबा रहता है। शस्त्र, विष और अग्निसे प्राप्त होनेवाला दुःख शनैः-शनैः अनुभवमें आता है (परंतु कटुवचन तत्काल ही अत्यन्त कष्ट देने लगता है)। अतः विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह दूसरोंपर वाग्बाण न छोड़े। बाणसे बिंधा हुआ वृक्ष और फरसेसे काटा हुआ जंगल फिर पनप जाता है, परंतु वाणीद्वारा जो भयानक कटु वचन निकलता है, उससे घायल हुए हृदयका घाव फिर नहीं भरता।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १० १/३ श्लोक मिलाकर कुल २३ १/३ श्लोक हैं)

शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको

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अशीतितमोऽध्यायः

शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना

वैशम्पायन उवाच

ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह ।
वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! देवयानीकी बात सुनकर भृगुश्रेष्ठ शुक्राचार्य बड़े क्रोधमें भरकर वृषपर्वाके समीप गये। वह राजसिंहासनपर बैठा हुआ था। शुक्राचार्यजीने बिना कुछ सोचे-विचारे उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ १ ॥

नाधर्मश्चरितो राजन् सद्यः फलति गौरिव ।
शनैरावर्त्यमानो हि कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥ २ ॥
'राजन्! जो अधर्म किया जाता है, उसका फल तुरंत नहीं मिलता। जैसे गायकी सेवा करनेपर धीरे-धीरे कुछ कालके बाद वह ब्याती और दूध देती है अथवा धरतीको जोत-बोकर बीज डालनेसे कुछ कालके बाद पौधा उगता और यथासमय फल देता है, उसी प्रकार किया जानेवाला अधर्म धीरे-धीरे कर्ताकी जड़ काट देता है ॥ २ ॥

पुत्रेषु वा नप्तृषु वा न चेदात्मनि पश्यति ।
फलत्येव ध्रुवं पापं गुरु भुक्तमिवोदरे ॥ ३ ॥
'यदि वह (पापसे उपार्जित द्रव्यका) दुष्परिणाम अपने ऊपर नहीं दिखायी देता तो उस अन्यायोपार्जित द्रव्यका उपभोग करनेके कारण पुत्रों अथवा नाती-पोतोंपर अवश्य प्रकट होता है। जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है' ॥ ३ ॥

(अधीयानं हितं राजन् क्षमावन्तं जितेन्द्रियम् ।)
यदघातयिथा विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा ।
अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषुं मद्गृहे रतम् ॥ ४ ॥
'राजन्! अंगिराके पौत्र कच विशुद्ध ब्राह्मण हैं। वे स्वाध्याय-परायण, हितैषी, क्षमावान् और जितेन्द्रिय हैं, स्वभावसे ही निष्पाप और धर्मज्ञ हैं तथा उन दिनों मेरे घरमें रहकर निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न थे, परंतु तुमने उनका बार-बार वध करवाया था ॥ ४ ॥

वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम ।

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वृषपर्वन् निबोधेदं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम् । स्थातुं त्वद्विषये राजन् न शक्ष्यामि त्वया सह ॥ ५ ॥ ‘वृषपर्वन्! ध्यान देकर मेरी यह बात सुन लो, तुम्हारे द्वारा पहले वधके अयोग्य ब्राह्मणका वध किया गया है और अब मेरी पुत्री देवयानीका भी वध करनेके लिये उसे कुएँमें ढकेला गया है। इन दोनों हत्याओंके कारण मैं तुमको और तुम्हारे भाई-बन्धुओंको त्याग दूँगा। राजन्! तुम्हारे राज्यमें और तुम्हारे साथ मैं एक क्षण भी नहीं ठहर सकूँगा ॥ ५ ॥ अहो मामभिजानासि दैत्य मिथ्याप्रलापिनम् । यथेममात्मनो दोषं न नियच्छस्युपेक्षसे ॥ ६ ॥ ‘दैत्यराज! बड़े आश्चर्यकी बात है कि तुमने मुझे मिथ्यावादी समझ लिया। तभी तो तुम अपने इस दोषको दूर नहीं करते और लापरवाही दिखाते हो’ ॥ ६ ॥

वृषपर्वोवाच

(यदि ब्रह्मन् घातयामि यदि वाऽऽक्रोशयाम्यहम् । शर्मिष्ठया देवयानीं तेन गच्छाम्यसद्गतिम् ॥) वृषपर्वा बोले—ब्रह्मन्! यदि मैं शर्मिष्ठासे देवयानीको पिटवाता या तिरस्कृत करवाता होऊँ तो इस पापसे मुझे सद्गति न मिले। नाधर्मं न मृषावादं त्वयि जानामि भार्गव । त्वयि धर्मश्च सत्यं च तत् प्रसीदतु नो भवान् ॥ ७ ॥ यद्यस्मानपहाय त्वमितो गच्छसि भार्गव । समुद्रं सम्प्रवेक्ष्यामो नान्यदस्ति परायणम् ॥ ८ ॥ भृगुनन्दन! आपपर अधर्म अथवा मिथ्याभाषणका दोष मैंने कभी लगाया हो, यह मैं नहीं जानता। आपमें तो सदा धर्म और सत्य प्रतिष्ठित हैं। अतः आप हमलोगोंपर कृपा करके प्रसन्न होइये। भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं तो हम सब लोग समुद्रमें समा जायँगे; हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ॥ ७-८ ॥ (यद्येव देवान् गच्छेस्त्वं मां च त्यक्त्वा ग्रहाधिप । सर्वत्यागं ततः कृत्वा प्रविशामि हुताशनम् ॥) ग्रहेश्वर! यदि आप मुझे छोड़कर देवताओंके पक्षमें चले जायँगे तो मैं भी सर्वस्व त्याग कर जलती आगमें कूद पडूँगा।

शुक्र उवाच

समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा द्रवतासुराः । दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे ॥ ९ ॥

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**शुक्राचार्यने कहा—**असुरो! तुमलोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ; मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ ९ ॥
प्रसाद्यतां देवयानी जीवितं यत्र मे स्थितम् ।
योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः ॥ १० ॥
तुम देवयानीको प्रसन्न करो, क्योंकि उसीमें मेरे प्राण बसते हैं। उसके प्रसन्न हो जानेपर इन्द्रके पुरोहित बृहस्पतिकी भाँति मैं तुम्हारे योगक्षेमका वहन करता रहूँगा ॥ १० ॥

वृषपर्वोवाच
यत् किंचिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव ।
भुवि हस्तिगवाश्वं च तस्य त्वं मम चेश्वरः ॥ ११ ॥
**वृषपर्वा बोले—**भृगुनन्दन! असुरेश्वरोंके पास इस भूतलपर जो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी-घोड़े और गाय आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हैं ॥ ११ ॥

शुक्र उवाच
यत् किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर ।
तस्येश्वरोऽस्मि यद्येषा देवयानी प्रसाद्यताम् ॥ १२ ॥
**शुक्राचार्यने कहा—**महान् असुर! दैत्यराजोंका जो कुछ भी धन-वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तथेत्याह वृषपर्वा महाकविः ।
देवयान्यन्तिकं गत्वा तमर्थं प्राह भार्गवः ॥ १३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर वृषपर्वाने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा मान ली। तदनन्तर दोनों देवयानीके पास गये और महाकवि शुक्राचार्यने वृषपर्वाकी कही हुई सारी बात कह सुनायी ॥ १३ ॥

देवयान्युवाच
यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव ।
नाभिजानामि तत् तेऽहं राजा तु वदतु स्वयम् ॥ १४ ॥
**तब देवयानीने कहा—**तात! यदि आप राजाके धनके स्वामी हैं तो आपके कहनेसे मैं इस बातको नहीं मानूँगी। राजा स्वयं कहें, तो मुझे विश्वास होगा ॥ १४ ॥

वृषपर्वोवाच
यं काममभिकामासि देवयानि शुचिस्मिते ।

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तत् तेऽहं सम्प्रदास्यामि यदि वापि हि दुर्लभम् ।। १५ ।। **वृषपर्वा बोले—**पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि दुर्लभ हो तो भी तुम्हें अवश्य दूँगा ।। १५ ।।

देवयान्युवाच

दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये । अनु मां तत्र गच्छेत् सा यत्र दद्याच्च मे पिता ।। १६ ।। **देवयानीने कहा—**मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी होकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय ।। १६ ।।

वृषपर्वोवाच

उत्तिष्ठ त्वं गच्छ धात्रि शर्मिष्ठां शीघ्रमानय । यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम् ।। १७ ।। **यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा—**धात्री! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जो कामना हो, उसे वह पूर्ण करे ।। १७ ।। (त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥) कुलके हितके लिये एक मनुष्यको त्याग दे। गाँवके भलेके लिये एक कुलको छोड़ दे। जनपदके लिये एक गाँवकी उपेक्षा कर दे और आत्मकल्याणके लिये सारी पृथ्वीको त्याग दे।

वैशम्पायन उवाच

ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठां वाक्यमब्रवीत् । उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह ।। १८ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**तब धायने शर्मिष्ठाके पास जाकर कहा—'भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाओ ।। १८ ।। त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः । सा यं कामयते कामं स कार्योऽद्य त्वयानघे ।। १९ ।। 'पापरहित राजकुमारी! आज बाबा शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों—यजमानोंको त्याग रहे हैं। अतः देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये' ।। १९ ।।

शर्मिष्ठोवाच

यं सा कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम् । यद्येवमाह्वयेच्छुक्रो देवयानीकृते हि माम् ।

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मद्दोषान्मा गमच्छुक्रो देवयानी च मत्कृते ॥ २० ॥ शर्मिष्ठा बोली— यदि इस प्रकार देवयानीके लिये ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं तो देवयानी जो कुछ चाहती है, वह सब आजसे मैं करूँगी। मेरे अपराधसे शुक्राचार्यजी न जायँ और देवयानी भी मेरे कारण अन्यत्र जानेका विचार न करे ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः कन्यासहस्रेण वृता शिबिकया तदा । पितुर्नियोगात् त्वरिता निष्क्राम पुरोत्तमात् ॥ २१ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर पिताकी आज्ञासे राजकुमारी शर्मिष्ठा शिबिकापर आरूढ़ हो तुरंत राजधानीसे बाहर निकली। उस समय वह एक सहस्र कन्याओंसे घिरी हुई थी ॥ २१ ॥

शर्मिष्ठोवाच

अहं दासीसहस्रेण दासी ते परिचारिका । अनु त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ॥ २२ ॥ शर्मिष्ठा बोली— देवयानी! मैं एक सहस्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी ॥ २२ ॥

देवयान्युवाच

स्तुवतो दुहिताहं ते याचतः प्रतिगृह्णतः । स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि ॥ २३ ॥ देवयानीने कहा— अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं; फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी ॥ २३ ॥

शर्मिष्ठोवाच

येन केनचिदार्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत् । अतस्त्वामनुयास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ॥ २४ ॥ शर्मिष्ठा बोली— जिस किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिये। अतः तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः । देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥ २५ ॥

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वैशम्पायनजी कहते हैं— नृपश्रेष्ठ! जब वृषपर्वाकी पुत्रीने दासी होनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानीने अपने पितासे कहा॥ २५॥

देवयान्युवाच

प्रविशामि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम ।
अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते ॥ २६ ॥
देवयानी बोली— पिताजी! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी। द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है॥ २६॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तो दुहित्रा स द्विजश्रेष्ठो महायशाः ।
प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश किया॥ २७॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्यानेऽशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३२ १/३ श्लोक हैं)