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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages
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अष्टक बोले— महाराज! मेरा विश्वास है कि आप पारलौकिक धर्मके ज्ञाता हैं। मैं आपसे एक बात पूछता हूँ—क्या अन्तरिक्ष या स्वर्गलोकमें मुझे प्राप्त होनेवाले पुण्यलोक भी हैं? यदि हों तो (उनके प्रभावसे) आप नीचे न गिरें, आपका पतन न हो ॥ ९ ॥

ययातिरुवाच

यावत् पृथिव्यां विहितं गवाश्वं
सहारण्यैः पशुभिः पार्वतैश्च ।
तावल्लोका दिवि ते संस्थिता वै
तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह ॥ १० ॥

ययातिने कहा— नरेन्द्रसिंह! इस पृथ्वीपर जंगली और पर्वतीय पशुओंके साथ जितने गाय, घोड़े आदि पशु रहते हैं, स्वर्गमें तुम्हारे लिये उतने ही लोक विद्यमान हैं। तुम इसे निश्चय जानो ॥ १० ॥

अष्टक उवाच

तांस्ते ददामि मा प्रपत प्रपातं
ये मे लोका दिवि राजेन्द्र सन्ति ।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-
स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः ॥ ११ ॥

अष्टक बोले— राजेन्द्र! स्वर्गमें मेरे लिये जो लोक विद्यमान हैं, वे सब आपको देता हूँ; परंतु आपका पतन न हो। अन्तरिक्ष या द्युलोकमें मेरे लिये जो स्थान हैं, उनमें आप शीघ्र ही मोहरहित होकर चले जायें ॥ ११ ॥

ययातिरुवाच

नास्मद्विधो ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च
प्रतिग्रहे वर्तते राजमुख्य ।
यथा प्रदेयं सततं द्विजेभ्य-
स्तथाददं पूर्वमहं नरेन्द्र ॥ १२ ॥

ययातिने कहा— नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण ही प्रतिग्रह लेता है। मेरे-जैसा क्षत्रिय कदापि नहीं। नरेन्द्र! जैसे दान करना चाहिये, उस विधिसे पहले मैंने भी सदा उत्तम ब्राह्मणोंको बहुत दान दिये हैं ॥ १२ ॥

नाब्राह्मणः कृपणो जातु जीवेद्
याच्ञापि स्याद् ब्राह्मणी वीरपत्नी ।
सोऽहं नैवाकृतपूर्वं चरेयं
विधित्समानः किमु तत्र साधु ॥ १३ ॥

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जो ब्राह्मण नहीं है, उसे दीन याचक बनकर कभी जीवन नहीं बिताना चाहिये। याचना तो विद्यासे दिग्विजय करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणकी पत्नी है अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको ही याचना करनेका अधिकार है। मुझे उत्तम सत्कर्म करनेकी इच्छा है; अतः ऐसा कोई कार्य कैसे कर सकता हूँ, जो पहले कभी नहीं किया हो ।। १३ ।।

प्रतर्दन उवाच

पृच्छामि त्वां स्पृहणीयरूप प्रतर्दनोऽहं यदि मे सन्ति लोकाः । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ।। १४ ।। **प्रतर्दन बोले—**वांछनीय रूपवाले श्रेष्ठ पुरुष! मैं प्रतर्दन हूँ और आपसे पूछता हूँ, यदि अन्तरिक्ष अथवा स्वर्गमें मेरे भी लोक हों तो बताइये। मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ।। १४ ।।

ययातिरुवाच

सन्ति लोका बहवस्ते नरेन्द्र अप्येकैकः सप्तसप्ताप्यहानि । मधुच्युतो घृतपृक्ता विशोका- स्ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति ।। १५ ।। **ययातिने कहा—**नरेन्द्र! आपके तो बहुत लोक हैं, यदि एक-एक लोकमें सात-सात दिन रहा जाय तो भी उनका अन्त नहीं है। वे सब-के-सब अमृतके झरने बहाते हैं एवं घृत (तेज)-से युक्त हैं। उनमें शोकका सर्वथा अभाव है। वे सभी लोक आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।। १५ ।।

प्रतर्दन उवाच

तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता- स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः ।। १६ ।। **प्रतर्दन बोले—**महाराज! वे सभी लोक मैं आपको देता हूँ, आप नीचे न गिरें। जो मेरे लोक हैं वे सब आपके हो जायँ। वे अन्तरिक्षमें हों या स्वर्गमें, आप शीघ्र मोहरहित होकर उनमें चले जाइये ।। १६ ।।

ययातिरुवाच

न तुल्यतेजाः सुकृतं कामयेत

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योगक्षेमं पार्थिव पार्थिवः सन्। दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां- श्चरेन्नृशंसं न हि जातु राजा ॥ १७ ॥ **ययातिने कहा—**राजन्! कोई भी राजा समान तेजस्वी होकर दूसरेसे पुण्य तथा योगक्षेमकी इच्छा न करे। विद्वान् राजा दैववश भारी आपत्तिमें पड़ जानेपर भी कोई पापमय कार्य न करे ॥ १७ ॥

धर्म्यं मार्गं यतमानो यशस्यं कुर्यान्नृपो धर्ममवेक्षमाणः । न मद्विधो धर्मबुद्धिः प्रजानन् कुर्यादेवं कृपणं मां यथाऽऽत्थ ॥ १८ ॥ धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाको उचित है कि वह प्रयत्नपूर्वक धर्म और यशके मार्गपर ही चले। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हो उस मेरे-जैसे मनुष्यको जान-बूझकर ऐसा दीनतापूर्ण कार्य नहीं करना चाहिये, जिसके लिये आप मुझसे कह रहे हैं ॥ १८ ॥

कुर्यादपूर्वं न कृतं यदन्यै- र्विधित्समानः किमु तत्र साधु । (धर्माधर्मौ सुनिश्चित्य सम्यक् कार्याकार्येष्वप्रमत्तश्चरेद् यः । स वै धीमान् सत्यसन्धः कृतात्मा राजा भवेल्लोकपालो महिम्ना ॥ यदा भवेत् संशयो धर्मकार्ये कामार्थे वा यत्र विन्दन्ति सम्यक् । कार्यं तत्र प्रथमं धर्मकार्यं न तौ कुर्यादर्थकामौ स धर्मः ॥) ब्रुवाणमेनं नृपतिं ययातिं नृपोत्तमो वसुमानब्रवीत् तम् ॥ १९ ॥ जो शुभ कर्म करनेकी इच्छा रखता है, वह ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसे अन्य राजाओंने नहीं किया हो। जो धर्म और अधर्मका भलीभाँति निश्चय करके कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सावधान होकर विचरता है, वही राजा बुद्धिमान्, सत्यप्रतिज्ञ और मनस्वी है। वह अपनी महिमासे लोकपाल होता है। जब धर्मकार्यमें संशय हो अथवा जहाँ न्यायतः काम और अर्थ दोनों आकर प्राप्त हों, वहाँ पहले धर्मकार्यका ही सम्पादन करना चाहिये, अर्थ और कामका नहीं। यही धर्म है। इस प्रकारकी बातें कहनेवाले राजा ययातिसे नृपश्रेष्ठ वसुमान् बोले ॥ १९ ॥

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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 682)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिनवतितमोऽध्यायः

राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना

वसुमानुवाच

पृच्छामि त्वां वसुमानौषदश्वि-
र्यद्यस्ति लोको दिवि मे नरेन्द्र ।
यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन्
क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ १ ॥

वसुमान्‌ने कहा— नरेन्द्र! मैं उषदश्वका पुत्र वसुमान् हूँ और आपसे पूछ रहा हूँ। यदि स्वर्ग या अन्तरिक्षमें मेरे लिये भी कोई विख्यात लोक हों तो बताइये। महात्मन्! मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ १ ॥

ययातिरुवाच

यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च
यत्तेजसा तपते भानुमांश्च ।
लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै
ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति ॥ २ ॥

ययातिने कहा— राजन्! पृथ्वी, आकाश और दिशाओंके जितने प्रदेशको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे तपाते और प्रकाशित करते हैं; उतने लोक तुम्हारे लिये स्वर्गमें स्थित हैं। वे अन्तवान् न होकर चिरस्थायी हैं और आपकी प्रतीक्षा करते हैं ॥ २ ॥

वसुमानुवाच

तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं
ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु ।
क्रीणीष्वैतांस्तृणकेनापि राजन्
प्रतिग्रहस्ते यदि धीमन् प्रदुष्टः ॥ ३ ॥

वसुमान् बोले— राजन्! वे सभी लोक मैं आपके लिये देता हूँ, आप नीचे न गिरें। मेरे लिये जितने पुण्यलोक हैं, वे सब आपके हो जायँ। धीमन्! यदि आपको प्रतिग्रह लेनेमें दोष दिखायी देता हो तो एक मुट्ठी तिनका मुझे मूल्यके रूपमें देकर मेरे इन सभी लोकोंको खरीद लें ॥ ३ ॥

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ययातिरुवाच

न मिथ्याहं विक्रयं वै स्मरामि
वृथा गृहीतं शिशुकाच्छङ्कमानः ।
कुर्यां न चैवाकृतपूर्वमन्यै-
र्विधित्समानः किमु तत्र साधु ॥ ४ ॥

**ययातिने कहा—**मैंने इस प्रकार कभी झूठ-मूठकी खरीद-बिक्री की हो अथवा छलपूर्वक व्यर्थ कोई वस्तु ली हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। मैं कालचक्रसे शंकित रहता हूँ। जिसे पूर्ववर्ती अन्य महापुरुषोंने नहीं किया वह कार्य मैं भी नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि मैं सत्कर्म करना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

वसुमानुवाच

तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्
मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते ।
अहं न तान् वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र
सर्वे लोकास्तव ते वै भवन्तु ॥ ५ ॥

**वसुमान् बोले—**राजन्! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वतः अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। नरेन्द्र! निश्चय जानिये, मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे सब आपके ही अधिकारमें रहें ॥ ५ ॥

शिबिरुवाच

पृच्छामि त्वां शिबिरौशीनरोऽहं
ममापि लोका यदि सन्तीह तात ।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः
क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ ६ ॥

**शिबिने कहा—**तात! मैं उशीनरका पुत्र शिबि आपसे पूछता हूँ। यदि अन्तरिक्ष या स्वर्गमें मेरे भी पुण्यलोक हों, तो बताइये; क्योंकि मैं आपको उक्त धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ ६ ॥

ययातिरुवाच

यत् त्वं वाचा हृदयेनापि साधून्
परीप्समानान् नावमंस्था नरेन्द्र ।
तेनानन्ता दिवि लोकाः श्रितास्ते
विद्युद्रूपाः स्वनवन्तो महान्तः ॥ ७ ॥

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**ययाति बोले—**नरेन्द्र! जो-जो साधु पुरुष तुमसे कुछ माँगनेके लिये आये, उनका तुमने वाणीसे कौन कहे, मनसे भी अपमान नहीं किया। इस कारण स्वर्गमें तुम्हारे लिये अनन्त लोक विद्यमान हैं, जो विद्युत्के समान तेजोमय, भाँति-भाँतिके सुमधुर शब्दोंसे युक्त तथा महान् हैं ।। ७ ।।

शिबिरुवाच

तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्
मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते ।
न चाहं तान् प्रतिपत्स्ये ह दत्त्वा
यत्र गत्वा नानुशोचन्ति धीराः ॥ ८ ॥
**शिबिने कहा—**महाराज! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वयं अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। उन सबको देकर निश्चय ही मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे लोक ऐसे हैं, जहाँ जाकर धीर पुरुष कभी शोक नहीं करते ।। ८ ।।

ययातिरुवाच

यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभाव-
स्ते चाप्यनन्ता नरदेव लोकाः ।
तथाद्य लोके न रमेऽन्यदत्ते
तस्माच्छिबे नाभिनन्दामि देयम् ॥ ९ ॥
**ययाति बोले—**नरदेव शिबि! जिस प्रकार तुम इन्द्रके समान प्रभावशाली हो, उसी प्रकार तुम्हारे वे लोक भी अनन्त हैं; तथापि दूसरेके दिये हुए लोकमें मैं विहार नहीं कर सकता, इसीलिये तुम्हारे दिये हुएका अभिनन्दन नहीं करता ।। ९ ।।

अष्टक उवाच

न चेदेकैकशो राजँल्लोकान् नः प्रतिनन्दसि ।
सर्वे प्रदाय भवते गन्तारो नरकं वयम् ॥ १० ॥
**अष्टकने कहा—**राजन्! यदि आप हममेंसे एक-एकके दिये हुए लोकोंको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण नहीं करते तो हम सब लोग अपने पुण्यलोक आपकी सेवामें अर्पित करके नरक (भूलोक)-में जानेको तैयार हैं ।। १० ।।

ययातिरुवाच

यदर्होऽहं तद् यतध्वं सन्तः सत्याभिनन्दिनः ।
अहं तन्नाभिजानामि यत् कृतं न मया पुरा ॥ ११ ॥
**ययाति बोले—**मैं जिसके योग्य हूँ, उसीके लिये यत्न करो; क्योंकि साधु पुरुष सत्यका ही अभिनन्दन करते हैं। मैंने पूर्वकालमें जो कर्म नहीं किया, उसे अब भी

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करनेयोग्य नहीं समझता ॥ ११ ॥

अष्टक उवाच

कस्यैते प्रतिदृश्यन्ते रथाः पञ्च हिरण्मयाः । यानारुह्य नरो लोकानभिवाञ्छति शाश्वतान् ॥ १२ ॥ **अष्टकने कहा—**आकाशमें ये किसके पाँच सुवर्णमय रथ दिखायी देते हैं, जिनपर आरूढ़ होकर मनुष्य सनातन लोकोंमें जानेकी इच्छा करता है ॥ १२ ॥

ययातिरुवाच

युष्मानेते वहिष्यन्ति रथाः पञ्च हिरण्मयाः । उच्चैः सन्तः प्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखा इव ॥ १३ ॥ **ययाति बोले—**ऊपर आकाशमें स्थित प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान जो पाँच सुवर्णमय रथ प्रकाशित हो रहे हैं, ये आपलोगोंको ही स्वर्गमें ले जायँगे ॥ १३ ॥

(वैशम्पायन उवाच)

(एतस्मिन्नन्तरे चैव माधवी तु तपोधना । मृगचर्मपरीताङ्गी परिणामे मृगव्रतम् ॥ मृगैः सह चरन्ती सा मृगाहारविचेष्टिता । यज्ञवाटं मृगगणैः प्रविश्य भृशविस्मिता ॥ आघ्रायन्ती धूमगन्धं मृगैरैव चचार सा । **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इसी समय तपस्विनी माधवी उधर आ निकली। उसने मृगचर्मसे अपने सब अंगोंको ढक रखा था। वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर वह मृगोंके साथ विचरती हुई मृगव्रतका पालन कर रही थी। उसकी भोजन-सामग्री और चेष्टा मृगोंके ही तुल्य थी। वह मृगोंके झुंडके साथ यज्ञमण्डपमें प्रवेश करके अत्यन्त विस्मित हुई और यज्ञीय धूमकी सुगन्ध लेती हुई मृगोंके साथ वहाँ विचरने लगी।

यज्ञवाटमटन्ती सा पुत्रांस्तानपराजितान् ॥ पश्यन्ती यज्ञमाहात्म्यं मुदं लेभे च माधवी । यज्ञशालामें घूम-घूमकर अपने अपराजित पुत्रोंको देखती और यज्ञकी महिमाका अनुभव करती हुई माधवी बहुत प्रसन्न हुई।

असंस्पृशन्तं वसुधां ययातिं नाहुषं तदा ॥ दिविष्ठं प्राप्तमाज्ञाय ववन्दे पितरं तदा । ततो वसुमनाः* पृच्छन् मातरं वै तपस्विनीम् ॥ उसने देखा, स्वर्गवासी नहुषनन्दन महाराज ययाति आये हैं, परंतु पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे हैं (आकाशमें ही स्थित हैं)। अपने पिताको पहचानकर माधवीने उन्हें प्रणाम किया।

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तब वसुमनाने अपनी तपस्विनी मातासे प्रश्न करते हुए कहा।

वसुमना उवाच

भवत्या यत् कृतमिदं वन्दनं वरवर्णिनि ।
कोऽयं देवोऽथवा राजा यदि जानासि मे वद ॥
**वसुमना बोले—**माँ! तुम श्रेष्ठ वर्णकी देवी हो। तुमने इन महापुरुषको प्रणाम किया है। ये कौन हैं? कोई देवता हैं या राजा? यदि जानती हो तो मुझे बताओ।

माधव्युवाच

शृणुध्वं सहिताः पुत्रा नाहुषोऽयं पिता मम ।
ययातिर्मम पुत्राणां मातामह इति श्रुतः ॥
पूरुं मे भ्रातरं राज्ये समावेश्य दिवं गतः ।
केन वा कारणेनैव इह प्राप्तो महायशाः ॥
**माधवीने कहा—**पुत्रो! तुम सब लोग एक साथ सुन लो—'ये मेरे पिता नहुषनन्दन महाराज ययाति हैं। मेरे पुत्रोंके सुविख्यात मातामह (नाना) ये ही हैं। इन्होंने मेरे भाई पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोककी यात्रा की थी; परंतु न जाने किस कारणसे ये महायशस्वी महाराज पुनः यहाँ आये हैं'।

वैशम्पायन उवाच

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा स्थानभ्रष्टेति चाब्रवीत् ।
सा पुत्रस्य वचः श्रुत्वा सम्भ्रमाविष्टचेतना ॥
माधवी पितरं प्राह दौहित्रपरिवारितम् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! माताकी यह बात सुनकर वसुमनाने कहा—माँ! ये अपने स्थानसे भ्रष्ट हो गये हैं। पुत्रका यह वचन सुनकर माधवी भ्रान्तचित्त हो उठी और दौहित्रोंसे घिरे हुए अपने पितासे इस प्रकार बोली।

माधव्युवाच

तपसा निर्जिताँल्लोकान् प्रतिगृह्णीष्व मामकान् ।
पुत्राणामिव पौत्राणां धर्मादधिगतं धनम् ॥
स्वार्थमेव वदन्तीह ऋषयो वेदपारगाः ।
तस्माद् दानेन तपसा अस्माकं दिवमाव्रज ॥
**माधवीने कहा—**पिताजी! मैंने तपस्याद्वारा जिन लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है, उन्हें आप ग्रहण करें। पुत्रों और पौत्रोंकी भाँति पुत्री और दौहित्रोंका धर्माचरणसे प्राप्त किया हुआ धन भी अपने ही लिये है, यह वेदवेत्ता ऋषि कहते हैं; अतः आप हमलोगोंके दान एवं तपस्याजनित पुण्यसे स्वर्गलोकमें जाइये।

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ययातिरुवाच

यदि धर्मफलं ह्येतच्छोभनं भविता तथा ।
दुहित्रा चैव दौहित्रैस्तारितोऽहं महात्मभिः ॥
**ययाति बोले—**यदि यह धर्मजनित फल है, तब तो इसका शुभ परिणाम अवश्यम्भावी है। आज मुझे मेरी पुत्री तथा महात्मा दौहित्रोंने तारा है।
तस्मात् पवित्रं दौहित्रमद्यप्रभृति पैतृके ।
भविष्यति न संदेहः पितॄणां प्रीतिवर्धनम् ॥
इसलिये आजसे पितृ-कर्म (श्राद्ध)-में दौहित्र परम पवित्र समझा जायगा। इसमें संशय नहीं कि वह पितरोंका हर्ष बढ़ानेवाला होगा।
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः ।
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥
भोक्तारः परिवेष्टारः श्रावितारः पवित्रकाः ।
श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र मानी जायँगी—दौहित्र, कुतप और तिल। साथ ही इसमें तीन गुण भी प्रशंसित होंगे—पवित्रता, अक्रोध और अत्वरा (उतावलेपनका अभाव)। तथा श्राद्धमें भोजन करनेवाले, परोसनेवाले और (वैदिक या पौराणिक मन्त्रोंका पाठ) सुनानेवाले—ये तीन प्रकारके मनुष्य भी पवित्र माने जायँगे।
दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभवति भास्करे ।
स कालः कुतपो नाम पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥
दिनके आठवें भागमें जब सूर्यका ताप घटने लगता है, उस समयका नाम कुतप है। उसमें पितरोंके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है।
तिलाः पिशाचाद् रक्षन्ति दर्भा रक्षन्ति राक्षसात् ।
रक्षन्ति श्रोत्रियाः पङ्क्तिं यतिभिर्भुक्तमक्षयम् ॥
तिल पिशाचोंसे श्राद्धकी रक्षा करते हैं, कुश राक्षसोंसे बचाते हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण पंक्तिकी रक्षा करते हैं और यदि यतिगण श्राद्धमें भोजन कर लें तो वह अक्षय हो जाता है।
लब्ध्वा पात्रं तु विद्वांसं श्रोत्रियं सुव्रतं शुचिम् ।
स कालः कालतो दत्तं नान्यथा काल इष्यते ॥
उत्तम व्रतका आचरण करनेवाला पवित्र श्रोत्रिय ब्राह्मण श्राद्धका उत्तम पात्र है। वह जब प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल समझना चाहिये। उसको दिया हुआ दान उत्तम कालका दान है। इसके सिवा और कोई उपयुक्त काल नहीं है।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ययातिस्तु पुनः प्रोवाच बुद्धिमान् ।
सर्वे ह्यवभृथस्नातास्त्वरध्वं कार्यगौरवात् ॥)

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**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! बुद्धिमान् ययाति उपर्युक्त बात कहकर पुनः अपने दौहित्रोंसे बोले—‘तुम सब लोग अवभृथस्नान कर चुके हो। अब महत्त्वपूर्ण कार्यकी सिद्धिके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ’।

अष्टक उवाच

आतिष्ठस्व रथान् राजन् विक्रमस्व विहायसम् ।
वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति ॥ १४ ॥
**अष्टक बोले—**राजन्! आप इन रथोंमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये। जब समय होगा, तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे ॥ १४ ॥

ययातिरुवाच

सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गजितो वयम् ।
एष नो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्मनः ॥ १५ ॥
**ययाति बोले—**हम सब लोगोंने साथ-साथ स्वर्गपर विजय पायी है, इसलिये इस समय सबको वहाँ चलना चाहिये। देवलोकका यह रजोहीन सात्त्विक मार्ग हमें स्पष्ट दिखायी दे रहा है ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तेऽधिरुह्य रथान् सर्वे प्रयाता नृपसत्तमाः ।
आक्रमन्तो दिवं भाभिर्धर्मेणावृत्य रोदसी ॥ १६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वे सभी नृपश्रेष्ठ उन दिव्य रथोंपर आरूढ़ हो धर्मके बलसे स्वर्गमें पहुँचनेके लिये चल दिये। उस समय पृथ्वी और आकाशमें उनकी प्रभा व्याप्त हो रही थी ॥ १६ ॥
(अष्टकश्च शिबिश्चैव काशिराजः प्रतर्दनः ।
ऐक्ष्वाकवो वसुमनाश्चत्वारो भूमिपाश्च ह ॥
सर्वे ह्यवभृथस्नाताः स्वर्गताः साधवः सह ।)
अष्टक, शिबि, काशिराज प्रतर्दन तथा इक्ष्वाकुवंशी वसुमना—ये चारों साधु नरेश यज्ञान्त-स्नान करके एक साथ स्वर्गमें गये।

अष्टक उवाच

अहं मन्ये पूर्वमेकोऽस्मि गन्ता
सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा ।
कस्मादेवं शिबिरौशीनरोऽय-
मेकोऽत्यगात् सर्ववेगेन वाहान् ॥ १७ ॥

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**अष्टक बोले—**राजन्! महात्मा इन्द्र मेरे बड़े मित्र हैं, अतः मैं तो समझता था कि अकेला मैं ही सबसे पहले उनके पास पहुँचूँगा। परंतु ये उशीनरपुत्र शिबि अकेले सम्पूर्ण वेगसे हम सबके वाहनोंको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं, ऐसा कैसे हुआ? ।। १७ ।।

ययातिरुवाच

अददद् देवयानाय यावद् वित्तमविन्दत ।
उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेष्ठो हि वः शिबिः ।। १८ ।।
**ययातिने कहा—**राजन्! उशीनरके पुत्र शिबिने ब्रह्मलोकके मार्गकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दान कर दिया था, इसीलिये ये तुम सब लोगोंमें श्रेष्ठ हैं ।। १८ ।।
दानं तपः सत्यमथापि धर्मो
ह्रीः श्रीः क्षमा सौम्यमथो विधित्सा ।
राज्ञन्नेतान्यप्रमेयाणि राज्ञः
शिबेः स्थितान्यप्रतिमस्य बुद्ध्या ।। १९ ।।
नरेश्वर! दान, तपस्या, सत्य, धर्म, ह्री, श्री, क्षमा, सौम्यभाव और व्रत-पालनकी अभिलाषा—राजा शिबिमें ये सभी गुण अनुपम हैं तथा बुद्धिमें भी उनकी समता करनेवाला कोई नहीं है ।। १९ ।।
एवंवृत्तो ह्रीनिषेवश्च यस्मात्
तस्माच्छिबिरत्यगाद् वै रथेन ।
राजा शिबि ऐसे सदाचारसम्पन्न और लज्जाशील हैं! (इनमें अभिमानकी मात्रा छू भी नहीं गयी है।) इसीलिये शिबि हम सबसे आगे बढ़ गये हैं।

वैशम्पायन उवाच

अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ-
न्मातामहं कौतुकेनेन्द्रकल्पम् ।। २० ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर अष्टकने कौतूहलवश इन्द्रके तुल्य अपने नाना राजा ययातिसे पुनः प्रश्न किया ।। २० ।।
पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं
कुतश्च कश्चासि सुतश्च कस्य ।
कृतं त्वया यद्धि न तस्य कर्ता
लोके त्वदन्यः क्षत्रियो ब्राह्मणो वा ।। २१ ।।
महाराज! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। आप उसे सच-सच बताइये। आप कहाँसे आये हैं, कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने जो कुछ किया है, उसे करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण इस संसारमें नहीं है ।। २१ ।।

ययातिरुवाच

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ययातिरस्मि नहुषस्य पुत्रः पूरोः पिता सार्वभौमस्त्विहासम् । गुह्यं चार्थं मामकेभ्यो ब्रवीमि मातामहोऽहं भवतां प्रकाशम् ॥ २२ ॥ ययातिने कहा—मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता राजा ययाति हूँ। इस लोकमें मैं चक्रवर्ती नरेश था। आप सब लोग मेरे अपने हैं; अतः आपसे गुप्त बात भी खोलकर बतलाये देता हूँ। मैं आपलोगोंका नाना हूँ। (यद्यपि पहले भी यह बात बता चुका हूँ, तथापि पुनः स्पष्ट कर देता हूँ) ॥ २२ ॥

सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिगाय प्रादामहं छादनं ब्राह्मणेभ्यः । मेध्यान्श्वानेकशतान् सुरूपां- स्तदा देवाः पुण्यभाजो भवन्ति ॥ २३ ॥ मैंने इस सारी पृथिवीको जीत लिया था। मैं ब्राह्मणोंको अन्न-वस्त्र दिया करता था। मनुष्य जब एक सौ सुन्दर पवित्र अश्वोंका दान करते हैं, तब वे पुण्यात्मा देवता होते हैं ॥ २३ ॥

अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः पूर्णांमिमामखिलां वाहनेन । गोभिः सुवर्णेन धनैश्च मुख्यै- स्तदाददं गाः शतमर्बुदानि ॥ २४ ॥ मैंने तो सवारी, गौ, सुवर्ण तथा उत्तम धनसे परिपूर्ण यह सारी पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी एवं सौ अर्बुद (दस अरब) गौओंका दान भी किया था ॥ २४ ॥

सत्येन वै द्यौश्च वसुन्धरा च तथैवाग्निर्ज्वलते मानुषेषु । न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति ॥ २५ ॥ सत्यसे ही पृथ्वी और आकाश टिके हुए हैं। इसी प्रकार सत्यसे ही मनुष्य-लोकमें अग्नि प्रज्वलित होती है। मैंने कभी व्यर्थ बात मुँहसे नहीं निकाली है; क्योंकि साधु पुरुष सदा सत्यका ही आदर करते हैं ॥ २५ ॥

यदष्टक प्रब्रवीमीह सत्यं प्रतर्दनं चौषदशिवं तथैव । सर्वे च लोका मुनयश्च देवाः सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम् ॥ २६ ॥

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अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे और उषदश्वके पुत्र वसुमान्‌से भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ; वह सब सत्य ही है। मेरे मनका यह विश्वास है कि समस्त लोक, मुनि और देवता सत्यसे ही पूजनीय होते हैं ॥ २६ ॥ यो नः स्वर्गजितः सर्वान् यथा वृत्तं निवेदयेत् ।
अनसूयुर्द्विजाग्र्येभ्यः स लभेन्नः सलोकताम् ॥ २७ ॥
जो मनुष्य हृदयमें ईर्ष्या न रखकर स्वर्गपर अधिकार करनेवाले हम सब लोगोंके इस वृत्तान्तको यथार्थरूपसे श्रेष्ठ द्विजोंके सामने सुनायेगा, वह हमारे ही समान पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेगा ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं राजा स महात्मा ह्यतीव
स्वैर्दौहित्रैस्तारितोऽमित्रसाहः ।
त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा
स्वर्गं गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा ययाति बड़े महात्मा थे। शत्रुओंके लिये अजेय और उनके कर्म अत्यन्त उदार थे। उनके दौहित्रोंने उनका उद्धार किया और वे अपने सत्कर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको व्याप्त करके पृथ्वी छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायातसमाप्तौ
त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातसमाप्तिविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २० १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/३ श्लोक हैं)


* ये वसुमान् नामसे भी प्रसिद्ध थे।

पूरुवंशका वर्णन

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चतुर्नवतितमोऽध्यायः

पूरुवंशका वर्णन

जनमेजय उवाच

भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पूरोर्वंशकरान् नृपान् ।
यद्वीर्यान् यादृशांश्चापि यावतो यत्पराक्रमान् ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**भगवन! अब मैं पूरुके वंशका विस्तार करनेवाले राजाओंका परिचय सुनना चाहता हूँ। उनका बल और पराक्रम कैसा था? वे कैसे और कितने थे? ॥ १ ॥

न ह्यस्मिन् शीलहीनो वा निर्वीर्यो वा नराधिपः ।
प्रजाविरहितो वापि भूतपूर्वः कथंचन ॥ २ ॥
मेरा विश्वास है कि इस वंशमें पहले कभी किसी प्रकार भी कोई ऐसा राजा नहीं हुआ है, जो शीलरहित, बल-पराक्रमसे शून्य अथवा संतानहीन रहा हो ॥ २ ॥

तेषां प्रथितवृत्तानां राज्ञां विज्ञानशालिनाम् ।
चरितं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन ॥ ३ ॥
तपोधन! जो अपने सदाचारके लिये प्रसिद्ध और विवेकसम्पन्न थे, उन सभी पूरुवंशी राजाओंके चरित्रको मुझे विस्तारपूर्वक सुननेकी इच्छा है ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
पूरोर्वंशधरान् वीराञ्छक्रप्रतिमतेजसः ।
भूरिद्रविणविक्रान्तान् सर्वलक्षणपूजितान् ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा। पूरुके वंशमें उत्पन्न हुए वीर नरेश इन्द्रके समान तेजस्वी, अत्यन्त धनवान्, परम पराक्रमी तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित थे (उन सबका परिचय देता हूँ) ॥ ४ ॥

प्रवीरेश्वररौद्राश्वास्त्रयः पुत्रा महारथाः ।
पूरोः पौष्ट्यामजायन्त प्रवीरो वंशकृत् ततः ॥ ५ ॥
पूरुके पौष्टी नामक पत्नीके गर्भसे प्रवीर, ईश्वर तथा रौद्राश्व नामक तीन महारथी पुत्र हुए। इनमेंसे प्रवीर अपनी वंश-परम्पराको आगे बढ़ानेवाले हुए ॥ ५ ॥

मनस्युरभवत् तस्माच्छूरसेनीसुतः प्रभुः ।
पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता राजीवलोचनः ॥ ६ ॥

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प्रवीरके पुत्रका नाम मनस्यु था, जो शूरसेनीके पुत्र और शक्तिशाली थे। कमलके समान नेत्रवाले मनस्युने चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समस्त पृथ्वीका पालन किया॥ ६॥
शक्तः संहननो वाग्मी सौवीरीतनयास्त्रयः।
मनस्योरभवन् पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः॥ ७॥
मनस्युके सौवीरीके गर्भसे तीन पुत्र हुए—शक्त, संहनन और वाग्मी। वे सभी शूरवीर और महारथी थे॥ ७॥
अन्वग्भानुप्रभृतयो मिश्रकेश्यां मनस्विनः।
रौद्राश्वस्य महेष्वासा दशाप्सरसि सूनवः॥ ८॥
यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावन्तो बहुश्रुताः।
सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः॥ ९॥
पूरुके तीसरे पुत्र मनस्वी रौद्राश्वके मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे अन्वग्भानु आदि दस महाधनुर्धर पुत्र हुए, जो सभी यज्ञकर्ता, शूरवीर, संतानवान्, अनेक शास्त्रोंके विद्वान, सम्पूर्ण अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा धर्मपरायण थे॥ ८-९॥
ऋचेयुरथ कक्षेयुः कृकणेयुश्च वीर्यवान्।
स्थण्डिलेयुर्वनेयुश्च जलेयुश्च महायशाः॥ १०॥
तेजेयुर्बलवान् धीमान् सत्येयुश्चेन्द्रविक्रमः।
धर्मेयुः संनतेयुश्च दशमो देवविक्रमः॥ ११॥
(उन सबके नाम इस प्रकार हैं—) ऋचेयु*, कक्षेयु, पराक्रमी कृकणेयु, स्थण्डिलेयु, वनेयु, महायशस्वी जलेयु, बलवान् और बुद्धिमान् तेजेयु, इन्द्रके समान पराक्रमी सत्येयु, धर्मेयु तथा दसवें देवतुल्य पराक्रमी संनतेयु॥ १०-११॥
अनाधृष्टिरभूत् तेषां विद्वान् भुवि तथैकराट्।
ऋचेयुरथ विक्रान्तो देवानामिव वासवः॥ १२॥
ऋचेयु जिनका एक नाम अनाधृष्टि भी है, अपने सब भाइयोंमें वैसे ही विद्वान् और पराक्रमी हुए, जैसे देवताओंमें इन्द्र। वे भूमण्डलके चक्रवर्ती राजा थे॥ १२॥
अनाधृष्टिसुतस्त्वासीद् राजसूयाश्वमेधकृत्।
मतिनार इति ख्यातो राजा परमधार्मिकः॥ १३॥
अनाधृष्टिके पुत्रका नाम मतिनार था। राजा मतिनार राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ करनेवाले एवं परम धर्मात्मा थे॥ १३॥
मतिनारसुता राजंश्चत्वारोऽमितविक्रमाः।
तंसुर्महानतिरथो द्रुह्युश्चाप्रतिमद्युतिः॥ १४॥
राजन्! मतिनारके चार पुत्र हुए, जो अत्यन्त पराक्रमी थे। उनके नाम ये हैं—तंसु, महान्, अतिरथ और अनुपम तेजस्वी द्रुह्यु॥ १४॥
तेषां तंसुर्महावीर्यः पौरवं वंशमुद्वहन्।

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आजहार यशो दीप्तं जिगाय च वसुन्धराम् ॥ १५ ॥ इनमें महापराक्रमी तंसुने पौरव वंशका भार वहन करते हुए उज्ज्वल यशका उपार्जन किया और सारी पृथ्वीको जीत लिया ॥ १५ ॥ ईलिनं तु सुतं तंसुर्जनयामास वीर्यवान् । सोऽपि कृत्स्नामिमां भूमिं विजिग्ये जयतां वरः ॥ १६ ॥ पराक्रमी तंसुने ईलिन नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ था। उसने भी सारी पृथ्वी जीत ली थी ॥ १६ ॥ रथन्त्यां सुतान् पञ्च पञ्चभूतोपमांस्ततः । ईलिनो जनयामास दुष्मन्तप्रभृतीन् नृपान् ॥ १७ ॥ ईलिनने रथन्तरी नामवाली अपनी पत्नीके गर्भसे पंच महाभूतोंके समान दुष्मन्त आदि पाँच राजपुत्रोंको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया ॥ १७ ॥ दुष्मन्तं शूरभीमौ च प्रवसुं वसुमेव च । तेषां श्रेष्ठोऽभवद् राजा दुष्मन्तो जनमेजय ॥ १८ ॥ (उनके नाम ये हैं—) दुष्मन्त, शूर, भीम, प्रवसु तथा वसु। जनमेजय! इनमें सबसे बड़े होनेके कारण दुष्मन्त राजा हुए ॥ १८ ॥ दुष्मन्ताद् भरतो जज्ञे विद्वाञ्छाकुन्तलो नृपः । तस्माद् भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद् यशः ॥ १९ ॥ दुष्मन्तसे विद्वान् राजा भरतका जन्म हुआ, जो शकुन्तलाके पुत्र थे। उन्हींसे भरतवंशका महान् यश फैला ॥ १९ ॥ भरतस्तिसृषु स्त्रीषु नव पुत्रानजीजनत् । नाभ्यनन्दत तान् राजा नानुरूपा ममेत्युत ॥ २० ॥ भरतने अपनी तीन रानियोंसे नौ पुत्र उत्पन्न किये। किंतु ‘ये मेरे अनुरूप नहीं हैं’ ऐसा कहकर राजाने उन शिशुओंका अभिनन्दन नहीं किया ॥ २० ॥ ततस्तान् मातरः क्रुद्धाः पुत्रान् निन्युर्यमक्षयम् । ततस्तस्य नरेन्द्रस्य वितथं पुत्रजन्म तत् ॥ २१ ॥ तब उन शिशुओंकी माताओंने कुपित होकर उनको मार डाला। इससे महाराज भरतका वह पुत्रोत्पादन व्यर्थ हो गया ॥ २१ ॥ ततो महद्भिः क्रतुभिरीजानो भरतस्तदा । लेभे पुत्रं भरद्वाजाद् भुमन्युं नाम भारत ॥ २२ ॥ भारत! तब महाराज भरतने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया और महर्षि भरद्वाजकी कृपासे एक पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम भुमन्यु था ॥ २२ ॥ ततः पुत्रिणमात्मानं ज्ञात्वा पौरवनन्दनः । भुमन्युं भरतश्रेष्ठ यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥ २३ ॥

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भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर पौरवकुलका आनन्द बढ़ानेवाले भरतने अपनेको पुत्रवान् समझकर भुमन्युको युवराजके पदपर अभिषिक्त किया ।। २३ ।।

ततो दिविरथो नाम भुमन्योरभवत् सुतः । सुहोत्रश्च सुहोता च सुहविः सुयजुस्तथा ।। २४ ।। पुष्करिण्यामृचीकश्च भुमन्योरभवन् सुताः । तेषां ज्येष्ठः सुहोत्रस्तु राज्यमाप महीक्षिताम् ।। २५ ।।

भुमन्युके दिविरथ नामक पुत्र हुआ। उसके सिवा सुहोत्र, सुहोता, सुहवि, सुयजु तथा ऋचीक भी भुमन्युके ही पुत्र थे। ये सब पुष्करिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। इन सब क्षत्रियोंमें सुहोत्र ही ज्येष्ठ थे। अतः उन्हींको राज्य मिला ।। २४-२५ ।।

राजसूयाश्वमेधाद्यैः सोऽयजद् बहुभिः सवैः । सुहोत्रः पृथिवीं कृत्स्नां बुभुजे सागराम्बराम् ।। २६ ।। पूर्णां हस्तिगजाश्वैश्च बहुरत्नसमाकुलाम् । ममज्जेव मही तस्य भूरिभारावपीडिता ।। २७ ।। हस्त्यश्वरथसम्पूर्णा मनुष्यकलिला भृशम् । सुहोत्रे राजनि तदा धर्मतः शासति प्रजाः ।। २८ ।।

राजा सुहोत्रने राजसूय तथा अश्वमेध आदि अनेक यज्ञोंद्वारा यजन किया और समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्विका, जो हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न थी, उपभोग किया। जब राजा सुहोत्र धर्मपूर्वक प्रजाका शासन कर रहे थे, उस समय सारी पृथ्वी हाथी, घोड़ों, रथ और मनुष्योंसे खचाखच भरी थी। उन पशु आदिके भारी भारसे पीड़ित होकर राजा सुहोत्रके शासनकालकी पृथ्वी मानो नीचे धँसी जाती थी ।। २६—२८ ।।

चैत्ययूपाङ्किता चासीद् भूमिः शतसहस्रशः । प्रवृद्धजनसस्या च सर्वदैव व्यरोचत ।। २९ ।।

उनके राज्यकी भूमि लाखों चैत्यों (देव-मन्दिरों) और यज्ञयूपोंसे चिह्नित दिखायी देती थी। सब लोग हृष्ट-पुष्ट होते थे। खेतीकी उपज अधिक हुआ करती थी। इस प्रकार उस राज्यकी पृथ्वी सदा ही अपने वैभवसे सुशोभित होती थी ।। २९ ।।

ऐक्ष्वाकी जनयामास सुहोत्रात् पृथिवीपतेः । अजमीढं सुमीढं च पुरुमीढं च भारत ।। ३० ।।

भारत! राजा सुहोत्रसे ऐक्ष्वाकीने अजमीढ, सुमीढ तथा पुरुमीढ नामक तीन पुत्रोंको जन्म दिया ।। ३० ।।

अजमीढो वरस्तेषां तस्मिन् वंशः प्रतिष्ठितः । षट् पुत्रान् सोऽप्यजनयत् तिसृषु स्त्रीषु भारत ।। ३१ ।।

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उनमें अजमीढ ज्येष्ठ थे। उन्हींपर वंशकी मर्यादा टिकी हुई थी। जनमेजय! उन्होंने भी तीन स्त्रियोंके गर्भसे छः पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ३१ ॥ ऋक्षं धूमिन्यथो नीली दुष्यन्तपरमेष्ठिनौ । केशिन्यजनयज्जह्नुं सुतौ व्रजनरूपिणौ ॥ ३२ ॥ उनकी धूमिनी नामवाली स्त्रीने ऋक्षको, नीलीने दुष्यन्त और परमेष्ठीको तथा केशिनीने जह्नु, व्रजन तथा रूपिन इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ३२ ॥ तथेमे सर्वपञ्चाला दुष्यन्तपरमेष्ठिनोः । अन्वयाः कुशिका राजन् जह्रोरमिततेजसः ॥ ३३ ॥ इनमें दुष्यन्त और परमेष्ठीके सभी पुत्र पांचाल कहलाये। राजन्! अमिततेजस्वी जह्नुके वंशज कुशिक नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ३३ ॥ व्रजनरूपिणयोर्ज्येष्ठमृक्षमाहुर्जनाधिपम् । ऋक्षात् संवरणो जज्ञे राजन् वंशकरः सुतः ॥ ३४ ॥ व्रजन तथा रूपिणके ज्येष्ठ भाई ऋक्षको राजा कहा गया है। ऋक्षसे संवरणका जन्म हुआ। राजन्! वे वंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्र थे ॥ ३४ ॥ आर्क्षे संवरणे राजन् प्रशासति वसुंधराम् । संक्षयः सुमहानासीत् प्रजानामिति नः श्रुतम् ॥ ३५ ॥ जनमेजय! ऋक्षपुत्र संवरण जब इस पृथ्वीका शासन कर रहे थे, उस समय प्रजाका बहुत बड़ा संहार हुआ था, ऐसा हमने सुना है ॥ ३५ ॥ व्यशीर्यत ततो राष्ट्रं क्षयैर्नानाविधैस्तदा । क्षुन्मृत्युभ्यामनावृष्ट्या व्याधिभिश्च समाहतम् ॥ ३६ ॥ इस तरह नाना प्रकारसे क्षय होनेके कारण वह सारा राज्य नष्ट-सा हो गया। सबको भूख, मृत्यु, अनावृष्टि और व्याधि आदिके कष्ट सताने लगे ॥ ३६ ॥ अभ्यघ्नन् भारतांश्चैव सपत्नानां बलानि च । चालयन् वसुधां चेमां बलेन चतुरङ्गिणा ॥ ३७ ॥ अभ्ययात् तं च पाञ्चाल्यो विजित्य तरसा महीम् । अक्षौहिणीभिर्दशभिः स एनं समरेऽजयत् ॥ ३८ ॥ शत्रुओंकी सेनाएँ भरतवंशी योद्धाओंका नाश करने लगीं। पांचालनरेशने इस पृथ्वीको कम्पित करते हुए चतुरंगिणी सेनाके साथ संवरणपर आक्रमण किया और उनकी सारी भूमि वेगपूर्वक जीतकर दस अक्षौहिणी सेनाओंद्वारा संवरणको भी युद्धमें परास्त कर दिया ॥ ३७-३८ ॥ ततः सदारः सामात्यः सपुत्रः ससुहृज्जनः । राजा संवरणस्तस्मात् पलायत महाभयात् ॥ ३९ ॥

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तदनन्तर स्त्री, पुत्र, सुहृद् और मन्त्रियोंके साथ राजा संवरण महान् भयके कारण वहाँसे भाग चले ।। ३९ ।। सिन्धोर्नदस्य महतो निकुञ्जे न्यवसत् तदा ।
नदीविषयपर्यन्ते पर्वतस्य समीपतः ।। ४० ।।
उस समय उन्होंने सिंधु नामक महानदके तटवर्ती निकुंजमें, जो एक पर्वतके समीपसे लेकर नदीके तटतक फैला हुआ था, निवास किया ।। ४० ।।
तत्रावसन् बहून् कालान् भारता दुर्गमाश्रिताः ।
तेषां निवसतं तत्र सहस्रं परिवत्सरान् ।। ४१ ।।
वहाँ उस दुर्गका आश्रय लेकर भरतवंशी क्षत्रिय बहुत वर्षोंतक टिके रहे। उन सबको वहाँ रहते हुए एक हजार वर्ष बीत गये ।। ४१ ।।
अथाभ्यगच्छद् भारतानू वसिष्ठो भगवानृषिः ।
तमागतं प्रयत्नेन प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ।। ४२ ।।
अर्घ्यमभ्याहरंस्तस्मै ते सर्वे भारतास्तदा ।
निवेद्य सर्वमृषये सत्कारेण सुवर्चसे ।। ४३ ।।
तमासने चोपविष्टं राजा वव्रे स्वयं तदा ।
पुरोहितो भवान् नोऽस्तु राज्याय प्रयतेमहि ।। ४४ ।।
इसी समय उनके पास भगवान् महर्षि वसिष्ठ आये। उन्हें आया देख भरतवंशियोंने प्रयत्नपूर्वक उनकी अगवानी की और प्रणाम करके सबने उनके लिये अर्घ्य अर्पण किया। फिर उन तेजस्वी महर्षिको सत्कारपूर्वक अपना सर्वस्व समर्पण करके उत्तम आसनपर बिठाकर राजाने स्वयं उनका वरण करते हुए कहा—'भगवन्! हम पुनः राज्यके लिये प्रयत्न कर रहे हैं। आप हमारे पुरोहित हो जाइये' ।। ४२—४४ ।।
ओमित्येवं वसिष्ठोऽपि भारतानू प्रत्यपद्यत ।
अथाभ्यषिञ्चत् साम्राज्ये सर्वक्षत्रस्य पौरवम् ।। ४५ ।।
विषाणभूतं सर्वस्यां पृथिव्यामिति नः श्रुतम् ।
भरताध्युषितं पूर्वं सोऽध्यतिष्ठत् पुरोत्तमम् ।। ४६ ।।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर वसिष्ठजीने भी भरतवंशियोंको अपनाया और समस्त भूमण्डलमें उत्कृष्ट पूरुवंशी संवरणको समस्त क्षत्रियोंके सम्राट्-पदपर अभिषिक्त कर दिया, ऐसा हमारे सुननेमें आया है। तत्पश्चात् महाराज संवरण, जहाँ प्राचीन भरतवंशी राजा रहते थे, उस श्रेष्ठ नगरमें निवास करने लगे ।। ४५-४६ ।।
पुनर्बलिभृतश्चैव चक्रे सर्वमहीक्षितः ।
ततः स पृथिवीं प्राप्य पुनरीजे महाबलः ।। ४७ ।।
आजमीढो महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
ततः संवरणात् सौरी तपती सुषुवे कुरुम् ।। ४८ ।।