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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages
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तब वसुमनाने अपनी तपस्विनी मातासे प्रश्न करते हुए कहा।

वसुमना उवाच

भवत्या यत् कृतमिदं वन्दनं वरवर्णिनि ।
कोऽयं देवोऽथवा राजा यदि जानासि मे वद ॥
**वसुमना बोले—**माँ! तुम श्रेष्ठ वर्णकी देवी हो। तुमने इन महापुरुषको प्रणाम किया है। ये कौन हैं? कोई देवता हैं या राजा? यदि जानती हो तो मुझे बताओ।

माधव्युवाच

शृणुध्वं सहिताः पुत्रा नाहुषोऽयं पिता मम ।
ययातिर्मम पुत्राणां मातामह इति श्रुतः ॥
पूरुं मे भ्रातरं राज्ये समावेश्य दिवं गतः ।
केन वा कारणेनैव इह प्राप्तो महायशाः ॥
**माधवीने कहा—**पुत्रो! तुम सब लोग एक साथ सुन लो—'ये मेरे पिता नहुषनन्दन महाराज ययाति हैं। मेरे पुत्रोंके सुविख्यात मातामह (नाना) ये ही हैं। इन्होंने मेरे भाई पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोककी यात्रा की थी; परंतु न जाने किस कारणसे ये महायशस्वी महाराज पुनः यहाँ आये हैं'।

वैशम्पायन उवाच

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा स्थानभ्रष्टेति चाब्रवीत् ।
सा पुत्रस्य वचः श्रुत्वा सम्भ्रमाविष्टचेतना ॥
माधवी पितरं प्राह दौहित्रपरिवारितम् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! माताकी यह बात सुनकर वसुमनाने कहा—माँ! ये अपने स्थानसे भ्रष्ट हो गये हैं। पुत्रका यह वचन सुनकर माधवी भ्रान्तचित्त हो उठी और दौहित्रोंसे घिरे हुए अपने पितासे इस प्रकार बोली।

माधव्युवाच

तपसा निर्जिताँल्लोकान् प्रतिगृह्णीष्व मामकान् ।
पुत्राणामिव पौत्राणां धर्मादधिगतं धनम् ॥
स्वार्थमेव वदन्तीह ऋषयो वेदपारगाः ।
तस्माद् दानेन तपसा अस्माकं दिवमाव्रज ॥
**माधवीने कहा—**पिताजी! मैंने तपस्याद्वारा जिन लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है, उन्हें आप ग्रहण करें। पुत्रों और पौत्रोंकी भाँति पुत्री और दौहित्रोंका धर्माचरणसे प्राप्त किया हुआ धन भी अपने ही लिये है, यह वेदवेत्ता ऋषि कहते हैं; अतः आप हमलोगोंके दान एवं तपस्याजनित पुण्यसे स्वर्गलोकमें जाइये।

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ययातिरुवाच

यदि धर्मफलं ह्येतच्छोभनं भविता तथा ।
दुहित्रा चैव दौहित्रैस्तारितोऽहं महात्मभिः ॥
**ययाति बोले—**यदि यह धर्मजनित फल है, तब तो इसका शुभ परिणाम अवश्यम्भावी है। आज मुझे मेरी पुत्री तथा महात्मा दौहित्रोंने तारा है।
तस्मात् पवित्रं दौहित्रमद्यप्रभृति पैतृके ।
भविष्यति न संदेहः पितॄणां प्रीतिवर्धनम् ॥
इसलिये आजसे पितृ-कर्म (श्राद्ध)-में दौहित्र परम पवित्र समझा जायगा। इसमें संशय नहीं कि वह पितरोंका हर्ष बढ़ानेवाला होगा।
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः ।
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥
भोक्तारः परिवेष्टारः श्रावितारः पवित्रकाः ।
श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र मानी जायँगी—दौहित्र, कुतप और तिल। साथ ही इसमें तीन गुण भी प्रशंसित होंगे—पवित्रता, अक्रोध और अत्वरा (उतावलेपनका अभाव)। तथा श्राद्धमें भोजन करनेवाले, परोसनेवाले और (वैदिक या पौराणिक मन्त्रोंका पाठ) सुनानेवाले—ये तीन प्रकारके मनुष्य भी पवित्र माने जायँगे।
दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभवति भास्करे ।
स कालः कुतपो नाम पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥
दिनके आठवें भागमें जब सूर्यका ताप घटने लगता है, उस समयका नाम कुतप है। उसमें पितरोंके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है।
तिलाः पिशाचाद् रक्षन्ति दर्भा रक्षन्ति राक्षसात् ।
रक्षन्ति श्रोत्रियाः पङ्क्तिं यतिभिर्भुक्तमक्षयम् ॥
तिल पिशाचोंसे श्राद्धकी रक्षा करते हैं, कुश राक्षसोंसे बचाते हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण पंक्तिकी रक्षा करते हैं और यदि यतिगण श्राद्धमें भोजन कर लें तो वह अक्षय हो जाता है।
लब्ध्वा पात्रं तु विद्वांसं श्रोत्रियं सुव्रतं शुचिम् ।
स कालः कालतो दत्तं नान्यथा काल इष्यते ॥
उत्तम व्रतका आचरण करनेवाला पवित्र श्रोत्रिय ब्राह्मण श्राद्धका उत्तम पात्र है। वह जब प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल समझना चाहिये। उसको दिया हुआ दान उत्तम कालका दान है। इसके सिवा और कोई उपयुक्त काल नहीं है।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ययातिस्तु पुनः प्रोवाच बुद्धिमान् ।
सर्वे ह्यवभृथस्नातास्त्वरध्वं कार्यगौरवात् ॥)

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**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! बुद्धिमान् ययाति उपर्युक्त बात कहकर पुनः अपने दौहित्रोंसे बोले—‘तुम सब लोग अवभृथस्नान कर चुके हो। अब महत्त्वपूर्ण कार्यकी सिद्धिके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ’।

अष्टक उवाच

आतिष्ठस्व रथान् राजन् विक्रमस्व विहायसम् ।
वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति ॥ १४ ॥
**अष्टक बोले—**राजन्! आप इन रथोंमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये। जब समय होगा, तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे ॥ १४ ॥

ययातिरुवाच

सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गजितो वयम् ।
एष नो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्मनः ॥ १५ ॥
**ययाति बोले—**हम सब लोगोंने साथ-साथ स्वर्गपर विजय पायी है, इसलिये इस समय सबको वहाँ चलना चाहिये। देवलोकका यह रजोहीन सात्त्विक मार्ग हमें स्पष्ट दिखायी दे रहा है ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तेऽधिरुह्य रथान् सर्वे प्रयाता नृपसत्तमाः ।
आक्रमन्तो दिवं भाभिर्धर्मेणावृत्य रोदसी ॥ १६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वे सभी नृपश्रेष्ठ उन दिव्य रथोंपर आरूढ़ हो धर्मके बलसे स्वर्गमें पहुँचनेके लिये चल दिये। उस समय पृथ्वी और आकाशमें उनकी प्रभा व्याप्त हो रही थी ॥ १६ ॥
(अष्टकश्च शिबिश्चैव काशिराजः प्रतर्दनः ।
ऐक्ष्वाकवो वसुमनाश्चत्वारो भूमिपाश्च ह ॥
सर्वे ह्यवभृथस्नाताः स्वर्गताः साधवः सह ।)
अष्टक, शिबि, काशिराज प्रतर्दन तथा इक्ष्वाकुवंशी वसुमना—ये चारों साधु नरेश यज्ञान्त-स्नान करके एक साथ स्वर्गमें गये।

अष्टक उवाच

अहं मन्ये पूर्वमेकोऽस्मि गन्ता
सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा ।
कस्मादेवं शिबिरौशीनरोऽय-
मेकोऽत्यगात् सर्ववेगेन वाहान् ॥ १७ ॥

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**अष्टक बोले—**राजन्! महात्मा इन्द्र मेरे बड़े मित्र हैं, अतः मैं तो समझता था कि अकेला मैं ही सबसे पहले उनके पास पहुँचूँगा। परंतु ये उशीनरपुत्र शिबि अकेले सम्पूर्ण वेगसे हम सबके वाहनोंको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं, ऐसा कैसे हुआ? ।। १७ ।।

ययातिरुवाच

अददद् देवयानाय यावद् वित्तमविन्दत ।
उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेष्ठो हि वः शिबिः ।। १८ ।।
**ययातिने कहा—**राजन्! उशीनरके पुत्र शिबिने ब्रह्मलोकके मार्गकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दान कर दिया था, इसीलिये ये तुम सब लोगोंमें श्रेष्ठ हैं ।। १८ ।।
दानं तपः सत्यमथापि धर्मो
ह्रीः श्रीः क्षमा सौम्यमथो विधित्सा ।
राज्ञन्नेतान्यप्रमेयाणि राज्ञः
शिबेः स्थितान्यप्रतिमस्य बुद्ध्या ।। १९ ।।
नरेश्वर! दान, तपस्या, सत्य, धर्म, ह्री, श्री, क्षमा, सौम्यभाव और व्रत-पालनकी अभिलाषा—राजा शिबिमें ये सभी गुण अनुपम हैं तथा बुद्धिमें भी उनकी समता करनेवाला कोई नहीं है ।। १९ ।।
एवंवृत्तो ह्रीनिषेवश्च यस्मात्
तस्माच्छिबिरत्यगाद् वै रथेन ।
राजा शिबि ऐसे सदाचारसम्पन्न और लज्जाशील हैं! (इनमें अभिमानकी मात्रा छू भी नहीं गयी है।) इसीलिये शिबि हम सबसे आगे बढ़ गये हैं।

वैशम्पायन उवाच

अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ-
न्मातामहं कौतुकेनेन्द्रकल्पम् ।। २० ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर अष्टकने कौतूहलवश इन्द्रके तुल्य अपने नाना राजा ययातिसे पुनः प्रश्न किया ।। २० ।।
पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं
कुतश्च कश्चासि सुतश्च कस्य ।
कृतं त्वया यद्धि न तस्य कर्ता
लोके त्वदन्यः क्षत्रियो ब्राह्मणो वा ।। २१ ।।
महाराज! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। आप उसे सच-सच बताइये। आप कहाँसे आये हैं, कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने जो कुछ किया है, उसे करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण इस संसारमें नहीं है ।। २१ ।।

ययातिरुवाच

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ययातिरस्मि नहुषस्य पुत्रः पूरोः पिता सार्वभौमस्त्विहासम् । गुह्यं चार्थं मामकेभ्यो ब्रवीमि मातामहोऽहं भवतां प्रकाशम् ॥ २२ ॥ ययातिने कहा—मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता राजा ययाति हूँ। इस लोकमें मैं चक्रवर्ती नरेश था। आप सब लोग मेरे अपने हैं; अतः आपसे गुप्त बात भी खोलकर बतलाये देता हूँ। मैं आपलोगोंका नाना हूँ। (यद्यपि पहले भी यह बात बता चुका हूँ, तथापि पुनः स्पष्ट कर देता हूँ) ॥ २२ ॥

सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिगाय प्रादामहं छादनं ब्राह्मणेभ्यः । मेध्यान्श्वानेकशतान् सुरूपां- स्तदा देवाः पुण्यभाजो भवन्ति ॥ २३ ॥ मैंने इस सारी पृथिवीको जीत लिया था। मैं ब्राह्मणोंको अन्न-वस्त्र दिया करता था। मनुष्य जब एक सौ सुन्दर पवित्र अश्वोंका दान करते हैं, तब वे पुण्यात्मा देवता होते हैं ॥ २३ ॥

अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः पूर्णांमिमामखिलां वाहनेन । गोभिः सुवर्णेन धनैश्च मुख्यै- स्तदाददं गाः शतमर्बुदानि ॥ २४ ॥ मैंने तो सवारी, गौ, सुवर्ण तथा उत्तम धनसे परिपूर्ण यह सारी पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी एवं सौ अर्बुद (दस अरब) गौओंका दान भी किया था ॥ २४ ॥

सत्येन वै द्यौश्च वसुन्धरा च तथैवाग्निर्ज्वलते मानुषेषु । न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति ॥ २५ ॥ सत्यसे ही पृथ्वी और आकाश टिके हुए हैं। इसी प्रकार सत्यसे ही मनुष्य-लोकमें अग्नि प्रज्वलित होती है। मैंने कभी व्यर्थ बात मुँहसे नहीं निकाली है; क्योंकि साधु पुरुष सदा सत्यका ही आदर करते हैं ॥ २५ ॥

यदष्टक प्रब्रवीमीह सत्यं प्रतर्दनं चौषदशिवं तथैव । सर्वे च लोका मुनयश्च देवाः सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम् ॥ २६ ॥

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अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे और उषदश्वके पुत्र वसुमान्‌से भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ; वह सब सत्य ही है। मेरे मनका यह विश्वास है कि समस्त लोक, मुनि और देवता सत्यसे ही पूजनीय होते हैं ॥ २६ ॥ यो नः स्वर्गजितः सर्वान् यथा वृत्तं निवेदयेत् ।
अनसूयुर्द्विजाग्र्येभ्यः स लभेन्नः सलोकताम् ॥ २७ ॥
जो मनुष्य हृदयमें ईर्ष्या न रखकर स्वर्गपर अधिकार करनेवाले हम सब लोगोंके इस वृत्तान्तको यथार्थरूपसे श्रेष्ठ द्विजोंके सामने सुनायेगा, वह हमारे ही समान पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेगा ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं राजा स महात्मा ह्यतीव
स्वैर्दौहित्रैस्तारितोऽमित्रसाहः ।
त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा
स्वर्गं गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा ययाति बड़े महात्मा थे। शत्रुओंके लिये अजेय और उनके कर्म अत्यन्त उदार थे। उनके दौहित्रोंने उनका उद्धार किया और वे अपने सत्कर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको व्याप्त करके पृथ्वी छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायातसमाप्तौ
त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातसमाप्तिविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २० १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/३ श्लोक हैं)


* ये वसुमान् नामसे भी प्रसिद्ध थे।

पूरुवंशका वर्णन

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⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्नवतितमोऽध्यायः

पूरुवंशका वर्णन

जनमेजय उवाच

भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पूरोर्वंशकरान् नृपान् ।
यद्वीर्यान् यादृशांश्चापि यावतो यत्पराक्रमान् ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**भगवन! अब मैं पूरुके वंशका विस्तार करनेवाले राजाओंका परिचय सुनना चाहता हूँ। उनका बल और पराक्रम कैसा था? वे कैसे और कितने थे? ॥ १ ॥

न ह्यस्मिन् शीलहीनो वा निर्वीर्यो वा नराधिपः ।
प्रजाविरहितो वापि भूतपूर्वः कथंचन ॥ २ ॥
मेरा विश्वास है कि इस वंशमें पहले कभी किसी प्रकार भी कोई ऐसा राजा नहीं हुआ है, जो शीलरहित, बल-पराक्रमसे शून्य अथवा संतानहीन रहा हो ॥ २ ॥

तेषां प्रथितवृत्तानां राज्ञां विज्ञानशालिनाम् ।
चरितं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन ॥ ३ ॥
तपोधन! जो अपने सदाचारके लिये प्रसिद्ध और विवेकसम्पन्न थे, उन सभी पूरुवंशी राजाओंके चरित्रको मुझे विस्तारपूर्वक सुननेकी इच्छा है ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
पूरोर्वंशधरान् वीराञ्छक्रप्रतिमतेजसः ।
भूरिद्रविणविक्रान्तान् सर्वलक्षणपूजितान् ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा। पूरुके वंशमें उत्पन्न हुए वीर नरेश इन्द्रके समान तेजस्वी, अत्यन्त धनवान्, परम पराक्रमी तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित थे (उन सबका परिचय देता हूँ) ॥ ४ ॥

प्रवीरेश्वररौद्राश्वास्त्रयः पुत्रा महारथाः ।
पूरोः पौष्ट्यामजायन्त प्रवीरो वंशकृत् ततः ॥ ५ ॥
पूरुके पौष्टी नामक पत्नीके गर्भसे प्रवीर, ईश्वर तथा रौद्राश्व नामक तीन महारथी पुत्र हुए। इनमेंसे प्रवीर अपनी वंश-परम्पराको आगे बढ़ानेवाले हुए ॥ ५ ॥

मनस्युरभवत् तस्माच्छूरसेनीसुतः प्रभुः ।
पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता राजीवलोचनः ॥ ६ ॥

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प्रवीरके पुत्रका नाम मनस्यु था, जो शूरसेनीके पुत्र और शक्तिशाली थे। कमलके समान नेत्रवाले मनस्युने चारों समुद्रोंसे घिरी हुई समस्त पृथ्वीका पालन किया॥ ६॥
शक्तः संहननो वाग्मी सौवीरीतनयास्त्रयः।
मनस्योरभवन् पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः॥ ७॥
मनस्युके सौवीरीके गर्भसे तीन पुत्र हुए—शक्त, संहनन और वाग्मी। वे सभी शूरवीर और महारथी थे॥ ७॥
अन्वग्भानुप्रभृतयो मिश्रकेश्यां मनस्विनः।
रौद्राश्वस्य महेष्वासा दशाप्सरसि सूनवः॥ ८॥
यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावन्तो बहुश्रुताः।
सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः॥ ९॥
पूरुके तीसरे पुत्र मनस्वी रौद्राश्वके मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे अन्वग्भानु आदि दस महाधनुर्धर पुत्र हुए, जो सभी यज्ञकर्ता, शूरवीर, संतानवान्, अनेक शास्त्रोंके विद्वान, सम्पूर्ण अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा धर्मपरायण थे॥ ८-९॥
ऋचेयुरथ कक्षेयुः कृकणेयुश्च वीर्यवान्।
स्थण्डिलेयुर्वनेयुश्च जलेयुश्च महायशाः॥ १०॥
तेजेयुर्बलवान् धीमान् सत्येयुश्चेन्द्रविक्रमः।
धर्मेयुः संनतेयुश्च दशमो देवविक्रमः॥ ११॥
(उन सबके नाम इस प्रकार हैं—) ऋचेयु*, कक्षेयु, पराक्रमी कृकणेयु, स्थण्डिलेयु, वनेयु, महायशस्वी जलेयु, बलवान् और बुद्धिमान् तेजेयु, इन्द्रके समान पराक्रमी सत्येयु, धर्मेयु तथा दसवें देवतुल्य पराक्रमी संनतेयु॥ १०-११॥
अनाधृष्टिरभूत् तेषां विद्वान् भुवि तथैकराट्।
ऋचेयुरथ विक्रान्तो देवानामिव वासवः॥ १२॥
ऋचेयु जिनका एक नाम अनाधृष्टि भी है, अपने सब भाइयोंमें वैसे ही विद्वान् और पराक्रमी हुए, जैसे देवताओंमें इन्द्र। वे भूमण्डलके चक्रवर्ती राजा थे॥ १२॥
अनाधृष्टिसुतस्त्वासीद् राजसूयाश्वमेधकृत्।
मतिनार इति ख्यातो राजा परमधार्मिकः॥ १३॥
अनाधृष्टिके पुत्रका नाम मतिनार था। राजा मतिनार राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ करनेवाले एवं परम धर्मात्मा थे॥ १३॥
मतिनारसुता राजंश्चत्वारोऽमितविक्रमाः।
तंसुर्महानतिरथो द्रुह्युश्चाप्रतिमद्युतिः॥ १४॥
राजन्! मतिनारके चार पुत्र हुए, जो अत्यन्त पराक्रमी थे। उनके नाम ये हैं—तंसु, महान्, अतिरथ और अनुपम तेजस्वी द्रुह्यु॥ १४॥
तेषां तंसुर्महावीर्यः पौरवं वंशमुद्वहन्।

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आजहार यशो दीप्तं जिगाय च वसुन्धराम् ॥ १५ ॥ इनमें महापराक्रमी तंसुने पौरव वंशका भार वहन करते हुए उज्ज्वल यशका उपार्जन किया और सारी पृथ्वीको जीत लिया ॥ १५ ॥ ईलिनं तु सुतं तंसुर्जनयामास वीर्यवान् । सोऽपि कृत्स्नामिमां भूमिं विजिग्ये जयतां वरः ॥ १६ ॥ पराक्रमी तंसुने ईलिन नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ था। उसने भी सारी पृथ्वी जीत ली थी ॥ १६ ॥ रथन्त्यां सुतान् पञ्च पञ्चभूतोपमांस्ततः । ईलिनो जनयामास दुष्मन्तप्रभृतीन् नृपान् ॥ १७ ॥ ईलिनने रथन्तरी नामवाली अपनी पत्नीके गर्भसे पंच महाभूतोंके समान दुष्मन्त आदि पाँच राजपुत्रोंको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया ॥ १७ ॥ दुष्मन्तं शूरभीमौ च प्रवसुं वसुमेव च । तेषां श्रेष्ठोऽभवद् राजा दुष्मन्तो जनमेजय ॥ १८ ॥ (उनके नाम ये हैं—) दुष्मन्त, शूर, भीम, प्रवसु तथा वसु। जनमेजय! इनमें सबसे बड़े होनेके कारण दुष्मन्त राजा हुए ॥ १८ ॥ दुष्मन्ताद् भरतो जज्ञे विद्वाञ्छाकुन्तलो नृपः । तस्माद् भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद् यशः ॥ १९ ॥ दुष्मन्तसे विद्वान् राजा भरतका जन्म हुआ, जो शकुन्तलाके पुत्र थे। उन्हींसे भरतवंशका महान् यश फैला ॥ १९ ॥ भरतस्तिसृषु स्त्रीषु नव पुत्रानजीजनत् । नाभ्यनन्दत तान् राजा नानुरूपा ममेत्युत ॥ २० ॥ भरतने अपनी तीन रानियोंसे नौ पुत्र उत्पन्न किये। किंतु ‘ये मेरे अनुरूप नहीं हैं’ ऐसा कहकर राजाने उन शिशुओंका अभिनन्दन नहीं किया ॥ २० ॥ ततस्तान् मातरः क्रुद्धाः पुत्रान् निन्युर्यमक्षयम् । ततस्तस्य नरेन्द्रस्य वितथं पुत्रजन्म तत् ॥ २१ ॥ तब उन शिशुओंकी माताओंने कुपित होकर उनको मार डाला। इससे महाराज भरतका वह पुत्रोत्पादन व्यर्थ हो गया ॥ २१ ॥ ततो महद्भिः क्रतुभिरीजानो भरतस्तदा । लेभे पुत्रं भरद्वाजाद् भुमन्युं नाम भारत ॥ २२ ॥ भारत! तब महाराज भरतने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया और महर्षि भरद्वाजकी कृपासे एक पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम भुमन्यु था ॥ २२ ॥ ततः पुत्रिणमात्मानं ज्ञात्वा पौरवनन्दनः । भुमन्युं भरतश्रेष्ठ यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥ २३ ॥

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भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर पौरवकुलका आनन्द बढ़ानेवाले भरतने अपनेको पुत्रवान् समझकर भुमन्युको युवराजके पदपर अभिषिक्त किया ।। २३ ।।

ततो दिविरथो नाम भुमन्योरभवत् सुतः । सुहोत्रश्च सुहोता च सुहविः सुयजुस्तथा ।। २४ ।। पुष्करिण्यामृचीकश्च भुमन्योरभवन् सुताः । तेषां ज्येष्ठः सुहोत्रस्तु राज्यमाप महीक्षिताम् ।। २५ ।।

भुमन्युके दिविरथ नामक पुत्र हुआ। उसके सिवा सुहोत्र, सुहोता, सुहवि, सुयजु तथा ऋचीक भी भुमन्युके ही पुत्र थे। ये सब पुष्करिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। इन सब क्षत्रियोंमें सुहोत्र ही ज्येष्ठ थे। अतः उन्हींको राज्य मिला ।। २४-२५ ।।

राजसूयाश्वमेधाद्यैः सोऽयजद् बहुभिः सवैः । सुहोत्रः पृथिवीं कृत्स्नां बुभुजे सागराम्बराम् ।। २६ ।। पूर्णां हस्तिगजाश्वैश्च बहुरत्नसमाकुलाम् । ममज्जेव मही तस्य भूरिभारावपीडिता ।। २७ ।। हस्त्यश्वरथसम्पूर्णा मनुष्यकलिला भृशम् । सुहोत्रे राजनि तदा धर्मतः शासति प्रजाः ।। २८ ।।

राजा सुहोत्रने राजसूय तथा अश्वमेध आदि अनेक यज्ञोंद्वारा यजन किया और समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्विका, जो हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न थी, उपभोग किया। जब राजा सुहोत्र धर्मपूर्वक प्रजाका शासन कर रहे थे, उस समय सारी पृथ्वी हाथी, घोड़ों, रथ और मनुष्योंसे खचाखच भरी थी। उन पशु आदिके भारी भारसे पीड़ित होकर राजा सुहोत्रके शासनकालकी पृथ्वी मानो नीचे धँसी जाती थी ।। २६—२८ ।।

चैत्ययूपाङ्किता चासीद् भूमिः शतसहस्रशः । प्रवृद्धजनसस्या च सर्वदैव व्यरोचत ।। २९ ।।

उनके राज्यकी भूमि लाखों चैत्यों (देव-मन्दिरों) और यज्ञयूपोंसे चिह्नित दिखायी देती थी। सब लोग हृष्ट-पुष्ट होते थे। खेतीकी उपज अधिक हुआ करती थी। इस प्रकार उस राज्यकी पृथ्वी सदा ही अपने वैभवसे सुशोभित होती थी ।। २९ ।।

ऐक्ष्वाकी जनयामास सुहोत्रात् पृथिवीपतेः । अजमीढं सुमीढं च पुरुमीढं च भारत ।। ३० ।।

भारत! राजा सुहोत्रसे ऐक्ष्वाकीने अजमीढ, सुमीढ तथा पुरुमीढ नामक तीन पुत्रोंको जन्म दिया ।। ३० ।।

अजमीढो वरस्तेषां तस्मिन् वंशः प्रतिष्ठितः । षट् पुत्रान् सोऽप्यजनयत् तिसृषु स्त्रीषु भारत ।। ३१ ।।

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उनमें अजमीढ ज्येष्ठ थे। उन्हींपर वंशकी मर्यादा टिकी हुई थी। जनमेजय! उन्होंने भी तीन स्त्रियोंके गर्भसे छः पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ३१ ॥ ऋक्षं धूमिन्यथो नीली दुष्यन्तपरमेष्ठिनौ । केशिन्यजनयज्जह्नुं सुतौ व्रजनरूपिणौ ॥ ३२ ॥ उनकी धूमिनी नामवाली स्त्रीने ऋक्षको, नीलीने दुष्यन्त और परमेष्ठीको तथा केशिनीने जह्नु, व्रजन तथा रूपिन इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ३२ ॥ तथेमे सर्वपञ्चाला दुष्यन्तपरमेष्ठिनोः । अन्वयाः कुशिका राजन् जह्रोरमिततेजसः ॥ ३३ ॥ इनमें दुष्यन्त और परमेष्ठीके सभी पुत्र पांचाल कहलाये। राजन्! अमिततेजस्वी जह्नुके वंशज कुशिक नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ३३ ॥ व्रजनरूपिणयोर्ज्येष्ठमृक्षमाहुर्जनाधिपम् । ऋक्षात् संवरणो जज्ञे राजन् वंशकरः सुतः ॥ ३४ ॥ व्रजन तथा रूपिणके ज्येष्ठ भाई ऋक्षको राजा कहा गया है। ऋक्षसे संवरणका जन्म हुआ। राजन्! वे वंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्र थे ॥ ३४ ॥ आर्क्षे संवरणे राजन् प्रशासति वसुंधराम् । संक्षयः सुमहानासीत् प्रजानामिति नः श्रुतम् ॥ ३५ ॥ जनमेजय! ऋक्षपुत्र संवरण जब इस पृथ्वीका शासन कर रहे थे, उस समय प्रजाका बहुत बड़ा संहार हुआ था, ऐसा हमने सुना है ॥ ३५ ॥ व्यशीर्यत ततो राष्ट्रं क्षयैर्नानाविधैस्तदा । क्षुन्मृत्युभ्यामनावृष्ट्या व्याधिभिश्च समाहतम् ॥ ३६ ॥ इस तरह नाना प्रकारसे क्षय होनेके कारण वह सारा राज्य नष्ट-सा हो गया। सबको भूख, मृत्यु, अनावृष्टि और व्याधि आदिके कष्ट सताने लगे ॥ ३६ ॥ अभ्यघ्नन् भारतांश्चैव सपत्नानां बलानि च । चालयन् वसुधां चेमां बलेन चतुरङ्गिणा ॥ ३७ ॥ अभ्ययात् तं च पाञ्चाल्यो विजित्य तरसा महीम् । अक्षौहिणीभिर्दशभिः स एनं समरेऽजयत् ॥ ३८ ॥ शत्रुओंकी सेनाएँ भरतवंशी योद्धाओंका नाश करने लगीं। पांचालनरेशने इस पृथ्वीको कम्पित करते हुए चतुरंगिणी सेनाके साथ संवरणपर आक्रमण किया और उनकी सारी भूमि वेगपूर्वक जीतकर दस अक्षौहिणी सेनाओंद्वारा संवरणको भी युद्धमें परास्त कर दिया ॥ ३७-३८ ॥ ततः सदारः सामात्यः सपुत्रः ससुहृज्जनः । राजा संवरणस्तस्मात् पलायत महाभयात् ॥ ३९ ॥

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तदनन्तर स्त्री, पुत्र, सुहृद् और मन्त्रियोंके साथ राजा संवरण महान् भयके कारण वहाँसे भाग चले ।। ३९ ।। सिन्धोर्नदस्य महतो निकुञ्जे न्यवसत् तदा ।
नदीविषयपर्यन्ते पर्वतस्य समीपतः ।। ४० ।।
उस समय उन्होंने सिंधु नामक महानदके तटवर्ती निकुंजमें, जो एक पर्वतके समीपसे लेकर नदीके तटतक फैला हुआ था, निवास किया ।। ४० ।।
तत्रावसन् बहून् कालान् भारता दुर्गमाश्रिताः ।
तेषां निवसतं तत्र सहस्रं परिवत्सरान् ।। ४१ ।।
वहाँ उस दुर्गका आश्रय लेकर भरतवंशी क्षत्रिय बहुत वर्षोंतक टिके रहे। उन सबको वहाँ रहते हुए एक हजार वर्ष बीत गये ।। ४१ ।।
अथाभ्यगच्छद् भारतानू वसिष्ठो भगवानृषिः ।
तमागतं प्रयत्नेन प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ।। ४२ ।।
अर्घ्यमभ्याहरंस्तस्मै ते सर्वे भारतास्तदा ।
निवेद्य सर्वमृषये सत्कारेण सुवर्चसे ।। ४३ ।।
तमासने चोपविष्टं राजा वव्रे स्वयं तदा ।
पुरोहितो भवान् नोऽस्तु राज्याय प्रयतेमहि ।। ४४ ।।
इसी समय उनके पास भगवान् महर्षि वसिष्ठ आये। उन्हें आया देख भरतवंशियोंने प्रयत्नपूर्वक उनकी अगवानी की और प्रणाम करके सबने उनके लिये अर्घ्य अर्पण किया। फिर उन तेजस्वी महर्षिको सत्कारपूर्वक अपना सर्वस्व समर्पण करके उत्तम आसनपर बिठाकर राजाने स्वयं उनका वरण करते हुए कहा—'भगवन्! हम पुनः राज्यके लिये प्रयत्न कर रहे हैं। आप हमारे पुरोहित हो जाइये' ।। ४२—४४ ।।
ओमित्येवं वसिष्ठोऽपि भारतानू प्रत्यपद्यत ।
अथाभ्यषिञ्चत् साम्राज्ये सर्वक्षत्रस्य पौरवम् ।। ४५ ।।
विषाणभूतं सर्वस्यां पृथिव्यामिति नः श्रुतम् ।
भरताध्युषितं पूर्वं सोऽध्यतिष्ठत् पुरोत्तमम् ।। ४६ ।।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर वसिष्ठजीने भी भरतवंशियोंको अपनाया और समस्त भूमण्डलमें उत्कृष्ट पूरुवंशी संवरणको समस्त क्षत्रियोंके सम्राट्-पदपर अभिषिक्त कर दिया, ऐसा हमारे सुननेमें आया है। तत्पश्चात् महाराज संवरण, जहाँ प्राचीन भरतवंशी राजा रहते थे, उस श्रेष्ठ नगरमें निवास करने लगे ।। ४५-४६ ।।
पुनर्बलिभृतश्चैव चक्रे सर्वमहीक्षितः ।
ततः स पृथिवीं प्राप्य पुनरीजे महाबलः ।। ४७ ।।
आजमीढो महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
ततः संवरणात् सौरी तपती सुषुवे कुरुम् ।। ४८ ।।

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फिर उन्होंने सब राजाओंको जीतकर उन्हें करद बना लिया। तदनन्तर वे महाबली नरेश अजमीढवंशी संवरण पुनः पृथ्वीका राज्य पाकर बहुत दक्षिणावाले बहुसंख्यक महायज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन करने लगे। कुछ कालके पश्चात् सूर्यकन्या तपतीने संवरणके वीर्यसे कुरु नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ ४७-४८ ॥

राजत्वे तं प्रजाः सर्वा धर्मज्ञ इति वव्रिरे ।
तस्य नाम्नाभिविख्यातं पृथिव्यां कुरुजाङ्गलम् ॥ ४९ ॥
कुरुको धर्मज्ञ मानकर सम्पूर्ण प्रजावर्गके लोगोंने स्वयं उनका राजाके पदपर वरण किया। उन्हींके नामसे पृथ्वीपर कुरुजांगलदेश प्रसिद्ध हुआ ॥ ४९ ॥

कुरुक्षेत्रं स तपसा पुण्यं चक्रे महातपाः ।
अश्ववन्तमभिष्यन्तं तथा चैत्ररथं मुनिम् ॥ ५० ॥
जनमेजयं च विख्यातं पुत्रांश्चास्याऽनुशुश्रुम ।
पञ्चैतान् वाहिनी पुत्रान् व्यजायत मनस्विनी ॥ ५१ ॥
उन महातपस्वी कुरुने अपनी तपस्याके बलसे कुरुक्षेत्रको पवित्र बना दिया। उनके पाँच पुत्र सुने गये हैं—अश्ववान्, अभिष्यन्त, चैत्ररथ, मुनि तथा सुप्रसिद्ध जनमेजय। इन पाँचों पुत्रोंको उनकी मनस्विनी पत्नी वाहिनीने जन्म दिया था ॥ ५०-५१ ॥

अविक्षितः परिक्षित् तु शबलाश्वस्तु वीर्यवान् ।
आदिराजो विराजश्च शाल्मलिश्च महाबलः ॥ ५२ ॥
उच्चैःश्रवा भङ्गकारो जितारिश्चाष्टमः स्मृतः ।
एतेषामन्ववाये तु ख्यातास्ते कर्मजैर्गुणैः ।
जनमेजयादयः सप्त तथैवान्ये महारथाः ॥ ५३ ॥
अश्ववान्‌का दूसरा नाम अविक्षित् था। उसके आठ पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं—परिक्षित्, पराक्रमी शबलाश्व, आदिराज, विराज, महाबली शाल्मलि, उच्चैःश्रवा, भंगकार तथा आठवाँ जितारि। इनके वंशमें जनमेजय आदि अन्य सात महारथी भी हुए, जो अपने कर्मजनित गुणोंसे प्रसिद्ध हैं ॥ ५२-५३ ॥

परिक्षितोऽभवन् पुत्राः सर्वे धर्मार्थकोविदाः ।
कक्षसेनोग्रसेनौ तु चित्रसेनश्च वीर्यवान् ॥ ५४ ॥
इन्द्रसेनः सुषेणश्च भीमसेनश्च नामतः ।
जनमेजयस्य तनया भुवि ख्याता महाबलाः ॥ ५५ ॥
धृतराष्ट्रः प्रथमजः पाण्डुर्बाह्लीक एव च ।
निषधश्च महातेजास्तथा जाम्बूनदो बली ॥ ५६ ॥
कुण्डोदरः पदातिश्च वसातिश्चाष्टमः स्मृतः ।
सर्वे धर्मार्थकुशलाः सर्वभूतहिते रताः ॥ ५७ ॥

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परीक्षित्के सभी पुत्र धर्म और अर्थके ज्ञाता थे; जिनके नाम इस प्रकार हैं—कक्षसेन, उग्रसेन, पराक्रमी, चित्रसेन, इन्द्रसेन, सुषेण और भीमसेन। जनमेजयके महाबली पुत्र भूमण्डलमें विख्यात थे। उनमें प्रथम पुत्रका नाम धृतराष्ट्र था। उनसे छोटे क्रमशः पाण्डु, बाह्लीक, महातेजस्वी निषध, बलवान् जाम्बूनद, कुण्डोदर, पदाति तथा वसाति थे। इनमें वसाति आठवाँ था। ये सभी धर्म और अर्थमें कुशल तथा समस्त प्राणियोंके हितमें संलग्न रहनेवाले थे ।। ५४—५७ ।।

धृतराष्ट्रोऽथ राजाऽऽसीत् तस्य पुत्रोऽथ कुण्डिकः ।
हस्ती वितर्कः क्राथश्च कुण्डिनश्चापि पञ्चमः ।। ५८ ।।
हविःश्रवास्तथेन्द्राभो भुमन्युश्चापराजितः ।
धृतराष्ट्रसुतानां तु त्रीनेतान् प्रथितान् भुवि ।। ५९ ।।
प्रतीपं धर्मनेत्रं च सुनेत्रं चापि भारत ।
प्रतीपः प्रथितस्तेषां बभूवाप्रतिमो भुवि ।। ६० ।।

इनमें धृतराष्ट्र राजा हुए। उनके पुत्र कुण्डिक, हस्ती, वितर्क, क्राथ, कुण्डिन, हविःश्रवा, इन्द्राभ, भुमन्यु और अपराजित थे। भारत! इनके सिवा प्रतीप, धर्मनेत्र और सुनेत्र—ये तीन पुत्र और थे। धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें ये ही तीन इस भूतलपर अधिक विख्यात थे। इनमें भी प्रतीपकी प्रसिद्धि अधिक थी। भूमण्डलमें उनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था ।। ५८—६० ।।

प्रतीपस्य त्रयः पुत्रा जज्ञिरे भरतर्षभ ।
देवापिः शान्तनुश्चैव बाह्लीकश्च महारथः ।। ६१ ।।
देवापिश्च प्रवव्राज तेषां धर्महितेप्सया ।
शान्तनुश्च महीं लेभे बाह्लीकश्च महारथः ।। ६२ ।।

भरतश्रेष्ठ! प्रतीपके तीन पुत्र हुए—देवापि, शान्तनु और महारथी बाह्लीक। इनमेंसे देवापि धर्माचरणद्वारा कल्याण-प्राप्तिकी इच्छासे वनको चले गये, इसलिये शान्तनु एवं महारथी बाह्लीकने इस पृथ्वीका राज्य प्राप्त किया ।। ६१-६२ ।।

भरतस्यान्वये जाताः सत्त्ववन्तो नराधिपाः ।
देवर्षिकल्पा नृपते बहवो राजसत्तमाः ।। ६३ ।।

राजन्! भरतके वंशमें सभी नरेश धैर्यवान् एवं शक्तिशाली थे। उस वंशमें बहुत-से श्रेष्ठ नृपतिगण देवर्षियोंके समान थे ।। ६३ ।।

एवंविधाश्चाप्यपरे देवकल्पा महारथाः ।
जाता मनोरन्ववाये ऐलवंशविवर्धनाः ।। ६४ ।।

ऐसे ही और भी कितने ही देवतुल्य महारथी मनुवंशमें उत्पन्न हुए थे, जो महाराज पुरूरवाके वंशकी वृद्धि करनेवाले थे ।। ६४ ।।

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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पूरुवंशवर्णनविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥


* ऋचेयु, अन्वग्भानु और अनाधृष्टि एक ही व्यक्तिके नाम हैं।

दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन

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पञ्चनवतितमोऽध्यायः

दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन

जनमेजय उवाच

श्रुतस्त्वत्तो मया ब्रह्मन् पूर्वेषां सम्भवो महान् ।
उदाराश्चापि वंशेऽस्मिन् राजानो मे परिश्रुताः ॥ १ ॥
जनमेजय बोले— ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे पूर्ववर्ती राजाओंकी उत्पत्तिका महान् वृत्तान्त सुना। इस पूरुवंशमें उत्पन्न हुए उदार राजाओंके नाम भी मैंने भलीभाँति सुन लिये ॥ १ ॥

किंतु लघ्वर्थसंयुक्तं प्रियाख्यानं न मामति ।
प्रीणात्यतो भवान् भूयो विस्तरेण ब्रवीतु मे ॥ २ ॥
एतामेव कथां दिव्यामाप्रजापतितो मनोः ।
तेषामाजननं पुण्यं कस्य न प्रीतिमावहेत् ॥ ३ ॥
परंतु संक्षेपसे कहा हुआ यह प्रिय आख्यान सुनकर मुझे पूर्णतः तृप्ति नहीं हो रही है। अतः आप पुनः विस्तारपूर्वक मुझसे इसी दिव्य कथाका वर्णन कीजिये। दक्ष प्रजापति और मनुसे लेकर उन सब राजाओंका पवित्र जन्म-प्रसंग किसको प्रसन्न नहीं करेगा? ॥ २-३ ॥

सद्धर्मगुणमाहात्म्यैरभिवर्धितमुत्तमम् ।
विष्टभ्य लोकांस्त्रीनेषां यशः स्फीतमवस्थितम् ॥ ४ ॥
उत्तम धर्म और गुणोंके माहात्म्यसे अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त हुआ इन राजाओंका श्रेष्ठ और उज्ज्वल यश तीनों लोकोंमें व्याप्त हो रहा है ॥ ४ ॥

गुणप्रभाववीर्यौजःसत्त्वोत्साहवतामहम् ।
न तृप्यामि कथां शृण्वन्नमृतास्वादसम्मिताम् ॥ ५ ॥
ये सभी नरेश उत्तम गुण, प्रभाव, बल-पराक्रम, ओज, सत्त्व (धैर्य) और उत्साहसे सम्पन्न थे। इनकी कथा अमृतके समान मधुर है, उसे सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु राजन् पुरा सम्यङ्मया द्वैपायनाच्छ्रुतम् ।
प्रोच्यमानमिदं कृत्स्नं स्ववंशजननं शुभम् ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! पूर्वकालमें मैंने महर्षि कृष्णद्वैपायनके मुखसे जिसका भलीभाँति श्रवण किया था, वह सम्पूर्ण प्रसंग तुम्हें सुनाता हूँ। अपने वंशकी

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उत्पत्तिका वह शुभ वृत्तान्त सुनो ।। ६ ।।
दक्षाददितिरदितेर्विवस्वान् विवस्वतो मनुर्मनो-रिला इलायाः पुरूरवाः पुरूरवस आयुरायुषो नहुषो नहुषाद् ययातिः; ययातेर्द्वे भार्ये बभूवतुः ।। ७ ।।
उशनसो दुहिता देवयानी; वृषपर्वणश्च दुहिता शर्मिष्ठा नाम ।। ८ ।।
दक्षसे अदिति, अदितिसे विवस्वान् (सूर्य), विवस्वान्‌से मनु, मनुसे इला, इलासे पुरूरवा, पुरूरवासे आयु, आयुसे नहुष और नहुषसे ययातिका जन्म हुआ। ययातिकी दो पत्नियाँ थीं पहली शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा दूसरी वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा ।। ८ ।।
अत्रानुवंशश्लोको भवति—
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।
द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।। ९ ।।
यहाँ उनके वंशका परिचय देनेवाला यह श्लोक कहा जाता है—
देवयानीने यदु और तुर्वसु नामवाले दो पुत्रोंको जन्म दिया और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु तथा पूरु—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये ।। ९ ।।
तत्र यदोर्यादवाः; पूरोः पौरवाः ।। १० ।।
इनमें यदुसे यादव और पूरुसे पौरव हुए ।। १० ।।
पूरोस्तु भार्या कौसल्या नाम । तस्यामस्य जज्ञे जनमेजयो नाम; यस्त्रीनश्वमेधानाजहार, विश्वजिता चेष्ट्वा वनं विवेश ।। ११ ।।
पूरुकी पत्नीका नाम कौसल्या था (उसीको पौष्टी भी कहते हैं)। उसके गर्भसे पूरुके जनमेजय नामक पुत्र हुआ (इसीका दूसरा नाम प्रवीर है); जिसने तीन अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था और विश्वजित् यज्ञ करके वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया था ।। ११ ।।
जनमेजयः खल्वनन्तां नामोपयेमे माधवीम् । तस्यामस्य जज्ञे प्राचिन्वान्; यः प्राचीं दिशं जिगाय यावत् सूर्योदयात्, ततस्तस्य प्राचिन्वत्त्वम् ।। १२ ।।
जनमेजयने मधुवंशकी कन्या अनन्ताके साथ विवाह किया था। उसके गर्भसे उनके प्राचिन्वान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने उदयाचलसे लेकर सारी प्राची दिशाको एक ही दिनमें जीत लिया था; इसीलिये उसका नाम प्राचिन्वान् हुआ ।। १२ ।।
प्राचिन्वान् खल्वश्मकीमुपयेमे यादवीम् । तस्यामस्य जज्ञे संयातिः ।। १३ ।।
प्राचिन्वान्‌ने यदुकुलकी कन्या अश्मकीको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे उन्हें संयाति नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। १३ ।।
संयातिः खलु दृषद्वतो दुहितरं वराङ्गीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे अहंयातिः ।। १४ ।।
संयातिने दृषद्वान्‌की पुत्री वरांगीसे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें अहंयाति नामक पुत्र हुआ ।। १४ ।।

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अहंयातिः खलु कृतवीर्यदुहितरमुपयेमे भानुमतीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे सार्वभौमः ॥ १५ ॥
अहंयातिने कृतवीर्यकुमारी भानुमतीको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे अहंयातिके सार्वभौम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १५ ॥
सार्वभौमः खलु जित्वा जहार कैकेयीं सुनन्दां नाम । तामुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे जयत्सेनो नाम ॥ १६ ॥
सार्वभौमने युद्धमें जीतकर केकयकुमारी सुनन्दाका अपहरण किया और उसीको अपनी पत्नी बनाया। उससे उनको जयत्सेन नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ १६ ॥
जयत्सेनो खलु वैदर्भीमुपयेमे सुश्रवां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अवाचीनः ॥ १७ ॥
जयत्सेनने विदर्भराजकुमारी सुश्रवासे विवाह किया। उसके गर्भसे उनके अवाचीन नामक पुत्र हुआ ॥ १७ ॥
अवाचीनोऽपि वैदर्भीमपरामेवोपयेमे मर्यादां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अरिहः ॥ १८ ॥
अवाचीनने भी विदर्भराजकुमारी मर्यादाके साथ विवाह किया, जो आगे बतायी जानेवाली देवातिथिकी पत्नीसे भिन्न थी। उसके गर्भसे उन्हें 'अरिह' नामक पुत्र हुआ ॥ १८ ॥
अरिहः खल्वाङ्गीमुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे महाभौमः ॥ १९ ॥
अरिहने अंगदेशकी राजकुमारीसे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हें महाभौम नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ १९ ॥
महाभौमः खलु प्रासेनजितीमुपयेमे सुयज्ञा नाम । तस्यामस्य जज्ञे अयुतनायी; यः पुरुषमेधानामयुतमानयत्, तेनास्यायुतनायित्वम् ॥ २० ॥
महाभौमने प्रसेनजित्की पुत्री सुयज्ञासे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें अयुतनायी नामक पुत्र प्राप्त हुआ; जिसने दस हजार पुरुषमेध 'यज्ञ' किये। अयुत यज्ञोंका आनयन (अनुष्ठान) करनेके कारण ही उनका नाम अयुतनायी हुआ ॥ २० ॥
अयुतनायी खलु पृथुश्रवसो दुहितरमुपयेमे कामां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अक्रोधनः ॥ २१ ॥
अयुतनायीने पृथुश्रवाकी पुत्री कामासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अक्रोधनका जन्म हुआ ॥ २१ ॥
स खलु कालिङ्गीं करम्भां नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे देवातिथिः ॥ २२ ॥
अक्रोधनने कलिंगदेशकी राजकुमारी करम्भासे विवाह किया। जिसके गर्भसे उनके देवातिथि नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ २२ ॥
देवातिथिः खलु वैदेहीमुपयेमे मर्यादां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अरिहो नाम ॥ २३ ॥

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देवातिथिने विदेहराजकुमारी मर्यादासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अरिह नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ २३ ॥

अरिहः खल्वाङ्गेयीमुपयेमे सुदेवां नाम । तस्यां पुत्रमजीजनदृक्षम् ॥ २४ ॥ अरिहने अंगराजकुमारी सुदेवाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ २४ ॥

ऋक्षः खलु तक्षकदुहितरमुपयेमे ज्वालां नाम । तस्यां पुत्रं मतिनारं नामोत्पादयामास ॥ २५ ॥ ऋक्षने तक्षककी पुत्री ज्वालाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे मतिनार नामक पुत्रको उत्पन्न किया ॥ २५ ॥

मतिनारः खलु सरस्वत्यां गुणसमन्वितं द्वादशवार्षिकं सत्रमाहरत् । समाप्ते च सत्रे सरस्वत्य-भिगम्य तं भर्तारं वरयामास । तस्यां पुत्रमजीजनत् तंसुं नाम ॥ २६ ॥ मतिनारने सरस्वतीके तटपर उत्तम गुणोंसे युक्त द्वादशवार्षिक यज्ञका अनुष्ठान किया। उसके समाप्त होनेपर सरस्वतीने उनके पास आकर उन्हें पतिरूपमें वरण किया। मतिनारने उसके गर्भसे तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ २६ ॥

अत्रानुवंशश्लोको भवति— तंसुं सरस्वती पुत्रं मतिनारादजीजनत् । ईलिनं जनयामास कालिंग्यां तंसुरात्मजम् ॥ २७ ॥ यहाँ वंशपरम्पराका सूचक श्लोक इस प्रकार है— सरस्वतीने मतिनारसे तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया और तंसुने कलिंगराजकुमारीके गर्भसे ईलिन नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ २७ ॥

ईलिनस्तु रथन्तर्यां दुष्यन्ताद्यान् पञ्च पुत्रानजीजनत् ॥ २८ ॥ ईलिनने रथन्तरीके गर्भसे दुष्यन्त आदि पाँच पुत्र उत्पन्न किये ॥ २८ ॥

दुष्यन्तः खलु विश्वामित्रदुहितरं शकुन्तलां नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे भरतः ॥ २९ ॥ दुष्यन्तने विश्वामित्रकी पुत्री शकुन्तलाके साथ विवाह किया; जिसके गर्भसे उनके पुत्र भरतका जन्म हुआ ॥ २९ ॥

अत्रानुवंशश्लोकौ भवतः— भस्त्रा माता पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः । भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ॥ ३० ॥ यहाँ वंशपरम्पराके सूचक दो श्लोक हैं— ‘माता तो भाथी (धौंकनी)-के समान है। वास्तवमें पुत्र पिताका ही होता है; जिससे उसका जन्म होता है, वही उस बालकके रूपमें प्रकट होता है। दुष्यन्त! तुम अपने पुत्रका भरण-पोषण करो; शकुन्तलाका अपमान न करो ॥ ३० ॥

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रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात् । त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ ३१ ॥ ‘गर्भाधान करनेवाला पिता ही पुत्ररूपमें उत्पन्न होता है। नरदेव! पुत्र यमलोकसे पिताका उद्धार कर देता है। तुम्हीं इस गर्भके आधान करनेवाले हो। शकुन्तलाका कथन सत्य है' ॥ ३१ ॥

ततोऽस्य भरतत्वम् । भरतः खलु काशेयीमुपयेमे सार्वसेनीं सुनन्दां नाम । तस्यामस्य जज्ञे भुमन्युः ॥ ३२ ॥ आकाशवाणीने भरण-पोषणके लिये कहा था, इसलिये उस बालकका नाम भरत हुआ। भरतने राजा सर्वसेनकी पुत्री सुनन्दासे विवाह किया। वह काशीकी राजकुमारी थी। उसके गर्भसे भरतके भुमन्यु नामक पुत्र हुआ ॥ ३२ ॥

भुमन्युः खलु दाशार्हीमुपयेमे विजयां नाम । तस्यामस्य जज्ञे सुहोत्रः ॥ ३३ ॥ भुमन्युने दशार्हकन्या विजयासे विवाह किया; जिसके गर्भसे सुहोत्रका जन्म हुआ ॥ ३३ ॥

सुहोत्रः खल्विक्ष्वाकुकन्यामुपयेमे सुवर्णां नाम । तस्यामस्य जज्ञे हस्ती; य इदं हास्तिनपुरं स्थापयामास । एतदस्य हास्तिनपुरत्वम् ॥ ३४ ॥ सुहोत्रने इक्ष्वाकुकुलकी कन्या सुवर्णासे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें हस्ती नामक पुत्र हुआ; जिसने यह हस्तिनापुर नामक नगर बसाया था। हस्तीके बसानेसे ही यह नगर ‘हास्तिनपुर’ कहलाया ॥ ३४ ॥

हस्ती खलु त्रैगर्तीमुपयेमे यशोधरां नाम । तस्यामस्य जज्ञे विकुण्ठनो नाम ॥ ३५ ॥ हस्तीने त्रिगर्तराजकी पुत्री यशोधराके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे विकुण्ठन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ३५ ॥

विकुण्ठनः खलु दाशार्हीमुपयेमे सुदेवां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अजमीढो नाम ॥ ३६ ॥ विकुण्ठनने दशार्हकुलकी कन्या सुदेवासे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हें अजमीढ नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ ३६ ॥

अजमीढस्य चतुर्विंशं पुत्रशतं बभूव कैकेय्यां गान्धार्यां विशालायामृक्षायां चेति । पृथक् पृथग् वंशधरा नृपतयः । तत्र वंशकरः संवरणः ॥ ३७ ॥ अजमीढके कैकेयी, गान्धारी, विशाला तथा ऋक्षासे एक सौ चौबीस पुत्र हुए। वे सब पृथक्-पृथक् वंशप्रवर्तक राजा हुए। इनमें राजा संवरण कुरुवंशके प्रवर्तक हुए ॥ ३७ ॥

संवरणः खलु वैवस्वतीं तपतीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे कुरुः ॥ ३८ ॥ संवरणने सूर्यकन्या तपतीसे विवाह किया; जिसके गर्भसे कुरुका जन्म हुआ ॥ ३८ ॥

कुरुः खलु दाशार्हीमुपयेमे शुभाङ्गीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे विदूरः ॥ ३९ ॥