भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

श्रीहनुमान्‌जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना

वैशम्पायन उवाच

ततः संहृत्य विपुलं तद् वपुः कामतः कृतम् ।
भीमसेनं पुनर्दोर्भ्यां पर्यष्वजत वानरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर अपनी इच्छासे बढ़ाये हुए उस विशाल शरीरका उपसंहार कर वानरराज हनुमान्‌जीने अपनी दोनों भुजाओं‌द्वारा भीमसेनको हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥

परिष्वक्तस्य तस्याशु भ्रात्रा भीमस्य भारत ।
श्रमो नाशमुपागच्छत् सर्वं चासीत् प्रदक्षिणम् ॥ २ ॥
भारत! भाईका आलिंगन प्राप्त होनेपर भीमसेनकी सारी थकावट तत्काल नष्ट हो गयी और सब कुछ उन्हें अनुकूल प्रतीत होने लगा ॥ २ ॥

बलं चातिबलो मेने न मेऽस्ति सदृशो महान् ।
ततः पुनरथोवाच पर्यश्रुनयनो हरिः ॥ ३ ॥
भीममाभाष्य सौहार्दाद् बाष्पगद्गदया गिरा ।
गच्छ वीर स्वमावासं स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे ॥ ४ ॥
अत्यन्त बलशाली भीमसेनको यह अनुभव हुआ कि मेरा बल बहुत बढ़ गया। अब मेरे समान दूसरा कोई महान् नहीं है। फिर हनुमान्‌जीने अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर सौहार्दसे गद्गदवाणीद्वारा भीमसेनको सम्बोधित करके कहा—‘वीर! अब तुम अपने निवास-स्थानपर जाओ। बातचीतके प्रसंगमें कभी मेरा भी स्मरण करते रहना ॥ ३-४ ॥