महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1030, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंइहस्थश्च कुरुश्रेष्ठ न निवेद्योऽस्मि कर्हिचित् । धनदस्यालयाच्चापि विसृष्टानां महाबल ।। ५ ।। देशकाल इहायातुं देवगन्धर्वयोषिताम् । ममापि सफलं चक्षुः स्मारितश्चास्मि राघवम् ।। ६ ।। रामाभिधानं विष्णुं हि जगद्धृदयनन्दनम् । सीतावक्त्रारविन्दार्कं दशास्यध्वान्तभास्करम् ।। ७ ।। मानुषं गात्रसंस्पर्शं गत्वा भीम त्वया सह । तदस्मद्दर्शनं वीर कौन्तेयामोघमस्तु ते ।। ८ ।।
‘कुरुश्रेष्ठ! मैं इस स्थानपर रहता हूँ, यह बात कभी किसीसे न कहना। महाबली वीर! अब कुबेरके भवनसे भेजी हुई देवांगनाओं तथा गन्धर्व-सुन्दरीयोंके यहाँ आनेका समय हो गया है। भीम! तुम्हें देखकर मेरी भी आँखें सफल हो गयीं। तुम्हारे साथ मिलकर तुम्हारे मानवशरीरका स्पर्श करके मुझे उन भगवान् रामचन्द्रजीका स्मरण हो आया है, जो श्रीराम-नामसे प्रसिद्ध साक्षात् विष्णु हैं। जगत्के हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले, मिथिलेशनन्दिनी सीताके मुखारविन्दको विकसित करनेके लिये सूर्यके समान तेजस्वी तथा दशमुख रावणरूपी अन्धकारराशिको नष्ट करनेके लिये साक्षात् भुवन-भास्कररूप हैं। वीर कुन्तीकुमार! तुमने जो मेरा दर्शन किया है, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये ।। ५—८ ।।