महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभ्रातृत्वं त्वं पुरस्कृत्य वरं वरय भारत । यदि तावन्मया क्षुद्रा गत्वा वारणसाह्वयम् ॥ ९ ॥ धार्तराष्ट्रा निहन्तव्या यावदेतत् करोम्यहम् । शिलया नगरं वापि मर्दितव्यं मया यदि ॥ १० ॥ बद्ध्वा दुर्योधनं चाद्य आनयामि तवान्तिकम् । यावदेतत् करोम्यद्य कामं तव महाबल ॥ ११ ॥ ‘भारत! तुम मुझे अपना बड़ा भाई समझकर कोई वर माँगो। यदि तुम्हारी इच्छा हो कि मैं हस्तिनापुरमें जाकर तुच्छ धृतराष्ट्र-पुत्रोंको मार डालूँ तो मैं यह भी कर सकता हूँ अथवा यदि तुम चाहो कि मैं पत्थरोंकी वर्षासे सारे नगरको रौंदकर धूलमें मिला दूँ अथवा दुर्योधनको बाँधकर अभी तुम्हारे पास ला दूँ तो यह भी कर सकता हूँ। महाबली वीर! तुम्हारी जो इच्छा हो, वही पूर्ण कर दूँगा’ ।। ९—११ ।।
वैशम्पायन उवाच
भीमसेनस्तु तद् वाक्यं श्रुत्वा तस्य महात्मनः । प्रत्युवाच हनूमन्तं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ १२ ॥ कृतमेव त्वया सर्वं मम वानरपुङ्गव । स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो कामये त्वां प्रसीद मे ॥ १३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महात्मा हनुमान्जीका यह वचन सुनकर भीमसेनने हर्षोल्लासपूर्ण हृदयसे हनुमान्जीको इस प्रकार उत्तर दिया—‘वानरशिरोमणे! आपने मेरा यह सब कार्य कर दिया। आपका कल्याण हो। महाबाहो! अब आपसे मेरी इतनी ही कामना है कि आप मुझपर प्रसन्न रहिये—मुझपर आपकी कृपा बनी रहे ।। १२-१३ ।।
सनाथाः पाण्डवाः सर्वे त्वया नाथेन वीर्यवन् । तवैव तेजसा सर्वान् विजेष्यामो वयं परान् ॥ १४ ॥ ‘शक्तिशाली वीर! आप-जैसे नाथ (संरक्षक) को पाकर सब पाण्डव सनाथ हो गये। आपके ही प्रभावसे हमलोग अपने सब शत्रुओंको जीत लेंगे’ ।। १४ ।।
एवमुक्तस्तु हनुमान् भीमसेनमभाषत । भ्रातृत्वात् सौहृदाच्चैव करिष्यामि प्रियं तव ॥ १५ ॥ भीमसेनके ऐसा कहनेपर हनुमान्जीने उनसे कहा—‘तुम मेरे भाई और सुहृद् हो, इसलिये मैं तुम्हारा प्रिय अवश्य करूँगा’ ।। १५ ।।
चमूं विगाह्य शत्रूणां शरशक्तिसमाकुलाम् । यदा सिंहरवं वीर करिष्यसि महाबल ॥ १६ ॥ तदाहं बृंहयिष्यामि स्वरवेण रवं तव ।