महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1051, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'रमणीय पर्वतों और समस्त सरोवरोंमें विशेषतः परम पुण्यमय समुद्रके जलमें इन महात्माओंके साथ भलीभाँति स्नान एवं आचमन किया है ।। ७ ।। इला सरस्वती सिन्धुर्यमुना नर्मदा तथा । नानातीर्थेषु रम्येषु सूपस्पृष्टं सह द्विजैः ॥ ८ ॥ 'इला, सरस्वती, सिंधु, यमुना तथा नर्मदा आदि नाना रमणीय तीर्थोंमें भी ब्राह्मणोंके साथ विधिवत् स्नान और आचमन किया है ।। ८ ।। गङ्गाद्वारमतिक्रम्य बहवः पर्वताः शुभाः । हिमवान् पर्वतश्चैव नानाद्विजगणायुतः ॥ ९ ॥ 'गंगाद्वार (हरिद्वार)-को लाँघकर बहुत-से मंगलमय पर्वत देखे तथा बहुसंख्यक ब्राह्मणोंसे युक्त हिमालय पर्वतका भी दर्शन किया ।। ९ ।। विशाला बदरी दृष्टा नरनारायणाश्रमः । दिव्या पुष्करिणी दृष्टा सिद्धदेवर्षिपूजिता ॥ १० ॥ 'विशाल बदरीतीर्थ, भगवान् नर-नारायणके आश्रम तथा सिद्धों और देवर्षियोंसे पूजित इस दिव्य सरोवरका भी दर्शन किया ।। १० ।। यथाक्रमविशेषेण सर्वाण्यायतनानि च । दर्शितानि द्विजश्रेष्ठा लोमशेन महात्मना ॥ ११ ॥ 'विप्रवरो! महात्मा लोमशजीने हमें सभी पुण्य-स्थानोंके क्रमशः दर्शन कराये हैं ।। ११ ।। इमं वैश्रवणावासं पुण्यं सिद्धनिषेवितम् । कथं भीम गमिष्यामो गतिरन्तरधीयताम् ॥ १२ ॥ 'भीमसेन! यह सिद्धसेवित पुण्यप्रदेश कुबेरका निवासस्थान है। अब हम कुबेरके भवनमें कैसे प्रवेश करेंगे? इसका उपाय सोचो' ।। १२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवति राजेन्द्रे वागुवाचाशरीरिणी । न शक्यो दुर्गमो गन्तुमितो वैश्रवणाश्रमात् ॥ १३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज युधिष्ठिरके ऐसा कहते ही आकाशवाणी बोल उठी—'कुबेरके इस आश्रमसे आगे जाना सम्भव नहीं है। यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है ।। १३ ।। अनेनैव पथा राजन् प्रतिगच्छ यथागतम् । नरनारायणस्थानं बदरीत्यभिविश्रुतम् ॥ १४ ॥ 'राजन्! जिससे तुम आये हो, उसी मार्गसे विशाला बदरीके नामसे विख्यात भगवान् नर-नारायणके स्थानको लौट जाओ ।। १४ ।। तस्माद् यास्यसि कौन्तेय सिद्धचारणसेवितम् ।