महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभीमसेन कुपित हो उठे और जटासुरसे बोले—'ओ पापी! पहले जब तू शस्त्रोंकी परीक्षा कर रहा था, तभी मैंने तुझे पहचान लिया था॥ ३८—४०॥ आस्था तु त्वयि मे नास्ति यतोऽसि न हतस्तदा। ब्रह्मरूपप्रतिच्छन्नो न नो वदसि चाप्रियम्॥ ४१॥ 'तुझपर मेरा विश्वास नहीं रह गया था, तो भी तू ब्राह्मणके रूपमें अपने असली स्वरूपको छिपाये हुए था और हमलोगोंसे कोई अप्रिय बात नहीं कहता था। इसीलिये मैंने तुम्हें तत्काल नहीं मार डाला॥ ४१॥ प्रियेषु रममाणं त्वां न चैवाप्रियकारिणम्। अतिथिं ब्रह्मरूपं च कथं हन्यामनागसम्॥ ४२॥ राक्षसं जानमानोऽपि यो हन्यान्नरकं व्रजेत्। अपक्वस्य च कालेन वधस्तव न विद्यते॥ ४३॥ 'तू हमारे प्रिय कार्योंमें मन लगाता था। जो हमें प्रिय न लगे, ऐसा काम नहीं करता था। ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आया था और कभी कोई अपराध नहीं किया था। ऐसी दशामें मैं तुझे कैसे मारता? जो राक्षसको राक्षस जानते हुए भी बिना किसी अपराधके उसका वध करता है, वह नरकमें जाता है। अभी तेरा समय पूरा नहीं हुआ था, इसलिये भी आजसे पहले तेरा वध नहीं किया जा सकता था॥ ४२-४३॥ नूनमद्यासि सम्पक्वो यथा ते मतिरीदृशी। दत्ता कृष्णापहरणे कालेनाद्भुतकर्मणा॥ ४४॥ 'आज निश्चय ही तेरी आयु पूरी हो चुकी है, तभी तो अद्भुत कर्म करनेवाले कालने तुझे इस प्रकार द्रौपदीके अपहरणकी बुद्धि दी है॥ ४४॥ बडिशोऽयं त्वया ग्रस्तः कालसूत्रेण लम्बितः। मत्स्योऽम्भसीव स्यूतास्यः कथमद्य भविष्यसि॥ ४५॥ 'कालरूपी डोरेसे लटकाया हुआ बंसीका काँटा तूने निगल लिया है। तेरा मुँह जलकी मछलीके समान उस काँटेमें गुँथ गया है, अतः अब तू कैसे जीवन धारण करेगा? ॥ ४५॥ यं चासि प्रस्थितो देशं मनः पूर्वं गतं च ते। न तं गन्तासि गन्तासि मार्गं बकहिडिम्बयोः॥ ४६॥ 'जिस देशकी ओर तू प्रस्थित हुआ है और जहाँ तेरा मन पहलेसे ही जा पहुँचा है, वहाँ अब तू न जा सकेगा। तुझे तो बक और हिडिम्बके मार्गपर जाना है,॥ ४६॥ एवमुक्तस्तु भीमेन राक्षसः कालचोदितः। भीत उत्सृज्य तान् सर्वान् युद्धाय समुपस्थितः॥ ४७॥ भीमसेनके ऐसा कहनेपर वह राक्षस भयभीत हो उन सबको छोड़कर कालकी प्रेरणासे युद्धके लिये उद्यत हो गया॥ ४७॥ अब्रवीच्च पुनर्भीमं रोषात् प्रस्फुरिताधरः।