भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1065

भ्रमरोंके गुंजारव तथा मोर और पपीहोंकी मीठी वाणीसे नित्य उत्सव-सा होता रहता है, जो उस पर्वतकी शोभाको बढ़ा देता है। वहाँ व्याघ्र, वराह, महिष, गवय, हरिण, हिंसक जन्तु, सर्प तथा रुरुमृग निवास करते हैं। खिले हुए सहस्रदल, शतदल, उत्पल, प्रफुल्ल कमल तथा नीलोत्पल आदिसे उस पर्वतकी रमणीयता और भी बढ़ गयी है। वह परम पुण्यमय और पवित्र है। देवता और असुर दोनों ही उसका सेवन करते हैं ।। ४—७ ।।

तत्रापि च कृतोद्देशः समागमदिदृक्षुभिः । कृतश्च समयस्तेन पार्थेनामिततेजसा ।। ८ ।। पञ्चवर्षाणि वत्स्यामि विद्यार्थीति पुरा मयि ।

'अमिततेजस्वी अर्जुनने वहाँ भी अपना आगमन देखनेके लिये उत्सुक हुए हमलोगोंके साथ संकेतपूर्वक यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अस्त्रविद्याका अध्ययन करनेके लिये पाँच वर्षोंतक देवलोकमें निवास करूँगा ।।

अत्र गाण्डीवधन्वानमवाप्तास्त्रमरिन्दमम् ।। ९ ।। देवलोकादिमं लोकं द्रक्ष्यामः पुनरागतम् । इत्युक्त्वा ब्राह्मणान् सर्वानामन्त्रयत पाण्डवः ।। १० ।।

'शत्रुओंका दमन करनेवाले गाण्डीवधारी अर्जुन अस्त्रविद्या प्राप्त करके पुनः देवलोकसे इस मनुष्यलोकमें आनेवाले हैं। हमलोग शीघ्र ही उनसे मिलेंगे' ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको आमन्त्रित किया ।। ९-१० ।।

कारणं चैव तत् तेषामाचचक्षे तपस्विनाम् । तानुग्रतपसः प्रीतान् कृत्वा पार्थाः प्रदक्षिणाम् ।। ११ ।।

और उन तपस्वियोंके सामने उन्हें बुला भेजनेका कारण बताया। उन कठोर तपस्वियोंको प्रसन्न करके कुन्तीकुमारोंने उनकी परिक्रमा की ।। ११ ।।

ब्राह्मणास्तेऽन्वमोदन्त शिवेन कुशलेन च । सुखोदर्कमिमं क्लेशमचिराद् भरतर्षभ ।। १२ ।।

तब उन ब्राह्मणोंने कुशल-मंगलके साथ उन सबके अभीष्ट मनोरथकी पूर्तिको अनुमोदन किया और कहा—'भरतश्रेष्ठ! आजका यह क्लेश शीघ्र ही सुखद भविष्यके रूपमें परिणत हो जायगा ।। १२ ।।

क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ तीर्त्वा गां पालयिष्यसि । तत् तु राजा वचस्तेषां प्रतिगृह्य तपस्विनाम् ।। १३ ।। प्रतस्थे सह विप्रैस्तैर्भ्रातृभिश्च परन्तपः । राक्षसैरनुयातो वै लोमशेनाभिरक्षितः ।। १४ ।।

'धर्मज्ञ! तुम क्षत्रियधर्मके अनुसार इस संकटसे पार होकर सारी पृथ्वीका पालन करोगे।' राजा युधिष्ठिरने उन तपस्वी ब्राह्मणोंका यह आशीर्वाद शिरोधार्य किया और वे परंतप नरेश उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए। घटोत्कच आदि राक्षस

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