भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1067

अष्टमेऽहनि सम्प्राप्ते तमृषिं लोकविश्रुतम् । आमन्त्र्य वृषपर्वाणं प्रस्थानं प्रत्यरोचयन् ।। २३ ।। आठवें दिन उन विश्वविख्यात राजर्षि वृषपर्वाकी आज्ञा ले उन्होंने वहाँसे प्रस्थान करनेका विचार किया ।। २३ ।।

एकैकशश्च तान् विप्रान् निवेद्य वृषपर्वणि । न्यासभूतान् यथाकालं बन्धूनिव सुसत्कृतान् ।। २४ ।। पारिबर्हं च तं शेषं परिदाय महात्मने । ततस्ते यज्ञपात्राणि रत्नान्याभरणानि च ।। २५ ।। न्यदधुः पाण्डवा राजन्नाश्रमे वृषपर्वणः । अपने साथ आये हुए ब्राह्मणोंको उन्होंने एक-एक करके वृषपर्वाके यहाँ धरोहरकी भाँति सौंपा। उन सबका पाण्डवोंने समय-समयपर सगे बन्धुकी भाँति सत्कार किया था। ब्राह्मणोंको सौंपनेके पश्चात् पाण्डवोंने अपनी शेष सामग्री भी उन्हीं महामनाको दे दी। तदनन्तर पाण्डुपुत्रोंने वृषपर्वाके ही आश्रममें अपने यज्ञपात्र तथा रत्नमय आभूषण भी रख दिये ।। २४-२५ १/२ ।।

अतीतानागते विद्वान् कुशलः सर्वधर्मवित् ।। २६ ।। अन्वशासत् स धर्मज्ञः पुत्रवद् भरतर्षभान् ।